अमेरिका ने वर्षों से दर्जनों प्रतिबंधों में जकड़कर ईरान की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य नौसैनिक नाकेबंदी और बैंकिंग प्रतिबंधों के जरिए ईरान की आर्थिक कमर तोड़ रखी है। इसके जवाब में ईरान ने ब्रिक्र में एक नया प्लान पेश किया है। ईरान ने ब्रिक्स देशों के बीच 'फाइनेंशियल कॉरिडोर' और पेमेंट नेटवर्क जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। ईरान का मकसद अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को सीधी चुनौती देना है लेकिन गेंद भारत के पाले में है क्योंकि इस बार की ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है।
अमेरिका ने ईरान को वैश्विक बैंकिंग संदेश प्रणाली (SWIFT) से पूरी तरह बाहर कर रखा है जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर में कोई लेनदेन नहीं कर सकता। इसीलिए ईरान के सेन्ट्रल बैंक ने ये प्रस्ताव रखा है। लेकिन दिक्कत ये है कि ट्रंप ने साफ चेतावनी दे रखी है कि जो भी देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईरान से व्यापार करेगा, अमेरिका उस देश से आने वाले सामान पर 25% का भारी टैरिफ लगा देगा। 
जानिए क्या है ईरान का 'BRICS पेमेंट नेटवर्क'
दरअसल ईरान के सेंट्रल बैंक ने भारत में हुई वाली ब्रिक्स (BRICS) की फाइनेंशियल मीटिंग्स में एक अहम प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव में ब्रिक्स सदस्यों के पेमेंट नेटवर्क को जोड़ने और इंटीग्रेट करने के लिए एक खास फाइनेंशियल कॉरिडोर बनाना और सीमा-पार फाइनेंशियल सेटलमेंट के लिए एक स्वतंत्र इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है। ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी मेहर ने कहा है कि यह प्रस्ताव उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक ज्यादा स्वतंत्र फाइनेंशियल सिस्टम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
एक ऐसा सिस्टम जिसमें ब्रिक्स सदस्यों के बीच व्यापार मुख्य रूप से राष्ट्रीय मुद्राओं, घरेलू पेमेंट सिस्टम और खास सेटलमेंट मैकेनिज्म पर निर्भर हो और इस ब्लॉक के बाहर नियंत्रित या संचालित फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता कम हो। ईरानी एजेंसी का कहना है कि अगर ऐसा कोई सिस्टम लागू किया जाता है तो सदस्य देश अपने द्विपक्षीय व्यापार का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय मुद्राओं का उपयोग करके कर सकते हैं जिससे ब्रिक्स समूह के बाहर के फाइनेंशियल नेटवर्क के माध्यम से लेनदेन करने की जरूरत कम हो जाएगी। 
ईरान के प्रस्तान को लागू किया गया तो क्या असर होगा?
ईरान के प्रस्ताव को अगर लागू किया जाता है तो इस सिस्टम के तहत ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं जैसे रुपया, युआन, रूबल में सीधे व्यापार कर सकेंगे। इससे ट्रंप की तरफ से लगाए गए वित्तीय प्रतिबंध बेअसर हो जाएंगे। ये ईरान के लिए लाइफलाइन की तरह होगा। प्रतिबंधों के कारण ईरान की मुद्रा लगातार गिर रही है और महंगाई चरम पर है। यदि यह कॉरिडोर बनता है तो ईरान अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन और अन्य देशों को बिना किसी अमेरिकी डर के तेल बेच सकेगा। 
इसके अलावा यह कदम दुनिया को पश्चिमी देशों के नियंत्रण वाली SWIFT प्रणाली से मुक्ति दिलाने की दिशा में बड़ा बुनियादी ढांचा तैयार करेगा। जैसे ईरान ने पहले ही रूस के 'मीर' (MIR) नेटवर्क के साथ अपने 'शेताब' (Shetab) पेमेंट सिस्टम को जोड़ा है वैसे ही यह पूरे ब्रिक्स ब्लॉक में फैल सकता है।
हालांकि यह प्रस्ताव असरदार है लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा। सभी देशों के बैंकिंग नियम, तकनीकी आर्किटेक्चर और करेंसी को बदलने का तरीका अलग-अलग है। साथ ही भारत जैसे देश जो अमेरिका के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध रखते हैं वे ट्रंप के 25% टैरिफ वाले डर के कारण इस पर फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ाएंगे। 
-Legend news

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