रिपोर्ट : LegendNews
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाया, वैकल्पिक रास्तों से आयात शुरू
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से होने वाले तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के निर्यात में भारी कमी आई है। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी (S&P Global Energy) के नए विश्लेषण के मुताबिक, इस तनाव ने 17 जून को हुए उस समझौते के असर को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जिसका मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को बढ़ावा देना था।
इस तनाव के कारण सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाया है। एसएंडपी के मुताबिक होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों से बचने के लिए भारत ने अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान के वैकल्पिक रास्तों से कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का आयात करना शुरू कर दिया है।
ईरान ने दी चेतावनी
ईरान ने हाल ही में चेतावनी दी है कि अगर उसके तेल निर्यात को रोका गया, तो वह फुजैराह पाइपलाइन और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसे अन्य वैकल्पिक रास्तों को भी निशाना बना सकता है। इससे भारत सहित दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है।
जहाजों की आवाजाही में बड़ी कमी
एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के डेटा के अनुसार जून के आखिर में इस रास्ते से रोजाना औसतन 0.8 एलएनजी जहाज गुजर रहे थे, जो 15 जुलाई तक घटकर सिर्फ 0.2 जहाज प्रति दिन रह गए हैं।
पिछले एक हफ्ते में फारस की खाड़ी से केवल एक एलएनजी जहाज बाहर आ सका है। दरअसल, 7 जुलाई को कतरएनर्जी के जहाज 'अल रेकय्यात' पर हुए हमले के बाद से जहाज मालिकों में डर का माहौल है।
खाड़ी के अंदर फंसा है भारी स्टॉक
एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के सीनियर प्रिंसिपल एनालिस्ट मेहरून एतेबारी का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से एलएनजी की आवाजाही जून की शुरुआत वाले निचले स्तर पर पहुंच गई है। अब निर्यात में कमी की मुख्य वजह एलएनजी का उत्पादन नहीं, बल्कि जहाजों की आवाजाही पर लगी पाबंदियां हैं।
हैरानी की बात यह है कि कतरएनर्जी और यूएई की एडनॉक (ADNOC) जैसी कंपनियों में एलएनजी का उत्पादन और जहाजों पर लोडिंग का काम सामान्य गति से चल रहा है। लेकिन आगे का रास्ता बंद होने की वजह से फारस की खाड़ी के अंदर ही जहाजों पर एलएनजी का एक बड़ा स्टॉक जमा हो गया है।
अनुमान के मुताबिक जुलाई के मध्य तक कतर के ही सात जहाजों में करीब 5.7 लाख मीट्रिक टन एलएनजी फंसी हुई थी। कुल मिलाकर फारस की खाड़ी के अंदर इस समय लगभग 19 लाख मीट्रिक टन क्षमता के एलएनजी टैंकर खड़े हैं, जो युद्ध से पहले के दिनों में होने वाले करीब 8 दिनों के कुल निर्यात के बराबर है।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी के देशों से ही आयात करता है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य का यह संकट लंबा खिंचता है, तो वैकल्पिक रास्तों (UAE और ओमान) से आयात करने के कारण भारत के लिए लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले हफ्तों में यह रास्ता साफ होता है, तो खाड़ी में फंसा भारी स्टॉक बेहद तेजी से वैश्विक बाजार में आएगा, जिससे भारत को भी बड़ी राहत मिलेगी।
-Legend News

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