महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े अहम मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने सबरीमाला विवाद में याचिका दायर करने वाले इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने 2006 में दायर जनहित याचिका को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए तीखा सवाल किया आपने यह याचिका क्यों दायर की, क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं? 
यह टिप्पणी नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं। पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। 
अदालत की सख्त टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन की मंशा और अधिकार पर गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोई भी जूरिस्टिक बॉडी यानी कानूनी संस्था व्यक्तिगत आस्था का दावा नहीं कर सकती। उन्होंने टिप्पणी की, विश्वास व्यक्ति का होता है, संस्था का नहीं। आपके पास कोई कांशियंस (अंतरात्मा) नहीं है। जस्टिस अरविंद कुमार ने भी संगठन से पूछा कि क्या याचिका दाखिल करने के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया था और क्या संगठन के अध्यक्ष ने इसे मंजूरी दी थी।
सीजेआई सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं दाखिल करने के बजाय संगठन को बार और युवा वकीलों के हित में काम करना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले प्रतिभाशाली युवा वकीलों को सहयोग देने और उनके लिए अवसर पैदा करने की दिशा में काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने अदालत को बताया कि 2006 में प्रकाशित चार समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह PIL दायर की गई थी। उन्होंने कहा कि संगठन का उद्देश्य भगवान अयप्पा के भक्तों की आस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि उसे बनाए रखना है।
वकील ने यह भी कहा कि मंदिर के तंत्री (मुख्य पुजारी) ने पहले यह मत व्यक्त किया था कि कम उम्र की महिलाओं का प्रवेश देवता की इच्छा के विरुद्ध है। साथ ही, उन्होंने नौ-न्यायाधीशों की पीठ के संदर्भ में कुछ न्यायाधीशों की टिप्पणियों पर आपत्ति भी जताई।
मामला क्या है?
केरल के सबरीमाला विवाद में लंबे समय से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक रही है। यह परंपरा भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी मानने से जुड़ी रही है। इस प्रथा को चुनौती देते हुए 2006 में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
2018 का ऐतिहासिक फैसला
इस मामले में सबरीमाला मंदिर प्रवेश संबंधी फैसला 2018 के तहत पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सितंबर 2018 में 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अदालत ने कहा था कि यह प्रथा महिलाओं के मौलिक अधिकारों विशेष रूप से समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।
हालांकि, इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध-प्रदर्शन हुए। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें धार्मिक परंपराओं और संविधान के अधिकारों के बीच संतुलन पर सवाल उठाए गए। 
-Legend News

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