रिपोर्ट : LegendNews
पीयूष मिश्रा ने शुभंकर मिश्रा के पॉडकास्ट में बताया कि मेरी वामपंथी सोच कैसे बदली?
पीयूष मिश्रा अपनी जिंदगी के बारे में बेबाकी से बात करते हैं। फिर चाहे वो उनकी शराब पीने की लत हो, वामपंथी सोच हो या ब्राह्मण कहलाने में शरम। उन्होंने जिंदगी में जो किया उस पर खुलकर बोलते हैं। अब एक पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि जिंदगी में कई बेवकूफियां कीं। वह लेफ्टिस्ट थे लेकिन कम्युनिस्ट नहीं। पीयूष ने यह भी बताया कि वह किसी भगवान को नहीं पूजते, हालांकि सामने किसी की मूर्ति या मंदिर पड़ जाए तो सिर झुकाने में गुरेज नहीं।
क्या ब्राह्मण होने पर थी शरम?
पीयूष मिश्रा शुभंकर मिश्रा के पॉडकास्ट में थे। क्या आपको हिंदू पहचान या ब्राह्मण होने पर शरम थी? पीयूष बोले, जब मैं लेफ्टिस्ट था तो शरम थी कि मैं ब्राह्मण हूं। मैं हिंदू हूं, मैं हिंदू क्यों हूं। हिंदुस्तान में रहते हुए हिंदुस्तान को गाली देता था। तमाम बेवकूफियां थीं। निहायत ही बेवकूफियां थीं। लेफ्टिस्ट साथी इस बात की बहुत खुशी मनाते थे कि हमें ऐसा करना चाहिए। अजीब सा था, पता नहीं क्या था।
आज के बच्चों पर क्या है कहना
पीयूष से पूछा गया, जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं या आज के बच्चों को ये करते देखते हैं तो मन में क्या चलता है? वह बोले, इस उम्र में तो सब करते हैं। वो विलन नहीं हैं। उन्हें करने देना चाहिए। इनको अपने आप सद्बुद्धि मिलेगी तो अपने आप से मिलेंगे।
नहीं करते मूर्ति पूजा
क्या पीयूष मिश्रा आद्यात्मिक हैं? मैं भगवान को वैसे नहीं मानता मतलब मूर्ति पूजा नहीं करता। सामने कोई मूर्ति आ जाती है तो नमस्कार करने में कोई हर्ज नहीं है। आध्यात्म ही जीवन है। आप लाख लेफ्टिस्ट हों, लाख कम्युनिस्ट हों, वहीं जाकर जीवन रुक जाना है। इस जन्म में नहीं करेंगे, तो अगले जन्म में करेंगे। मैं तो इस चीज को बहुत मानता हूं कि जिस नोट पर मैं छूट रहा हूं, उस नोट पर मैं जन्म लूंगा।
कैसे बदली लेफ्टिस्ट सोच
पीयूष मिश्रा की वामपंथी सोच कैसे बदली। वह बोले- मैं कम्युनिस्ट कभी नहीं था, लेफ्टिस्ट रहा। पता नहीं क्या दिक्कत आती है लोगों को एक्सेप्ट करने में कि हम लेफ्टिस्ट हैं। मतलब हमारी जनरेशन में बहुत पढ़ाई-लिखाई थी और उस वक्त जो 20 साल की उम्र में 30 साल की उम्र में लेफ्टिस्ट होना आपकी जरूरत थी। एंटी एडमिनिस्ट्रेशन आप होगे ही होगे नहीं चाहोगे तब भी आप होगे, झक मार के होगे। कम्युनिस्ट आइडियोलॉजी अलग होती है, वो थोड़ी गहरी हो जाती है। वो नहीं था मैं, लेकिन हां लेफ्ट तो था... बाकायदा था। लेफ्ट आपको ये तो दिखाएगा नहीं कि आपकी गति क्या होगी, धीरे-धीरे आपको खुद सोचना पड़ता है। फिर धीरे से आध्यात्म प्रवेश करता है और सारी गति बदल जाती है।
-Legend News

Recent Comments