नई द‍िल्ली। इजरायल और लंदन में मौजूद ‘इंस्टीट्यूट फॉर मॉनिटरिंग पीस एंड कल्चरल टोलरेंस इन स्कूल एजुकेशन’ (IMPACT-se) ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अरब की स्कूली किताबों में लैंगिक भूमिकाओं से लेकर शांति और सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाले चैप्टर्स बढ़ रहे हैं. यहूदियों, ईसाइयों और इजरायल-फलस्तीन विवाद से जुड़े चैप्टर्स में भी बदलाव किया गया है, जिसने सभी का ध्यान इस ओर खींचा है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के सालों में जिन किताबों में यहूदियों और ईसाइयों की छवि खलनायक के रूप में गढ़ी गई थी, वो अब बदल रही हैं. उन सभी उदाहरणों को किताबों से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जिनमें यहूदियों और ईसाइयों को इस्लाम का दुश्मन बताया गया था. तोराह और गॉस्पेल (जिन्हें अरबी में तोरात और इंजील कहा जाता है) में बदलाव के लिए यहूदियों और ईसाइयों की आलोचना वाले चैप्टर्स भी हटा लिए गए हैं.

सऊदी अरब ये जान चुका है कि अगर उसे तरक्की की नई इबारत लिखनी है, तो अपने कट्टर और रूढ़िवादी विचारों की कुर्बानी देनी होगी. सऊदी अरब ने अपने पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में हुए विकास को देखा है, जहां हर मजहब के लोग साथ मिलकर काम कर रहे हैं. यही वजह है कि खाड़ी का ये मुल्क अब अपने को बदलने लगा है और उदारता के रास्ते की ओर बढ़ चल रहा है.

स्कूली किताबों में इजरायल और फलस्तीन को लेकर भी बदलाव किए गए हैं. IMPACT-se की रिपोर्ट में बताया गया है कि किताबों में भले ही इजरायल को पूरी तरह से स्वीकार्ता ना मिली हो, मगर कुछ खास चीजें जरूरी बदली हैं. मसलन जहां ‘इजरायली दुश्मन’ या ‘जायोनी दुश्मन’ का जिक्र होता था, वहां अब ‘इजरायली कब्जे’ या ‘इजरायल की कब्जे वाली सेना’ लिखा गया है. देशभक्ति से जुड़ी कविता पर एक चैप्टर में ‘फलस्तीन की यहूदी बस्ती का विरोध’ वाले उदाहरण को हटाया गया है.

एक किताब में फि‍लि‍स्तीन मुद्दे से जुड़ा पूरा एक चैप्टर ही हटा दिया गया है. जिन किताबों में पहले इंतिफादा के फायदे बताए गए थे, अब उसे भी हटाया गया है. हालांकि, कुछ चीजें अभी भी ऐसी हैं, जिन्हें बरकरार रखा गया है. जैसे अभी भी इजरायल के नक्शे को विवादित बताया गया है और किताबों में होलोकास्ट का जिक्र ही नहीं किया गया है.

Compiled: Legend News
 

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