उत्तर प्रदेश में जिन सरकारी विभागों को 'भ्रष्टाचार का पर्याय' माना जाता है, उनमें विकास प्राधिकरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। संभवत: इसीलिए आम आदमी की भाषा में इसे 'विनाश प्राधिकरण' कहते हैं। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अख्तियार करने का एलान किया गया। 2017 में पहली बार सीएम की कुर्सी पर काबिज हुए योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अब 2027 की पहली तिमाही में फिर से यूपी के विधानसभा चुनाव होने हैं।  
इस दौरान गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यानाथ ने उत्तर प्रदेश को 'उत्तम प्रदेश' बनाने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की उनकी नीति विकास प्राधिकरण जैसे विभाग में कतई प्रभावी दिखाई नहीं देती। 
रिस्क अधिक तो रिश्वत भी अधिक
सच्चाई तो यह है कि तमाम सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारियों ने योगीराज की इस नीति को बड़ी चालाकी से अपने पक्ष में करके रिश्वत के रेट बढ़ा दिए हैं। इन विभागों में साफ-साफ कहा जाता है कि अब रिस्क अधिक है इसलिए काम कराने के पैसे भी अधिक देने होंगे। विकास प्राधिकरण इन विभागों में सबसे ऊपर आता है। 
वैसे तो कहीं भी और किसी भी अवैध निर्माण को पहले चुपचाप होते देखना, फिर मौका मिलते ही उसे भुना लेना विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की पुरानी फितरत है, लेकिन अब स्थिति यहां तक जा पहुंच चुकी है कि 'वैध कॉलोनियों' में किए जा रहे 'अवैध निर्माण' को भी विभाग ने 'दुधारू गाय' बना लिया है। 
भरपूर भ्रष्टाचार के लिए अपनाई गई विकास प्राधिकरण की इस नई नीति का ही नतीजा है कि आज अप्रूव्ड  और स्थापित पॉश कॉलोनियों में भी लोग बेखौफ होकर अवैध निर्माण कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ इन कॉलोनियों की सुंदरता नष्ट  हो रही है बल्कि सड़कें संकरी और पार्क आदि नष्ट-भ्रष्ट हो चुके हैं। अधिकांश ग्रीन बेल्ट पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर लिया है। शर्मनाक बात यह है कि अवैध निर्माण करने वालों और ग्रीन बेल्‍ट कब्‍जाने वालों में सत्ता से जुड़े लोग, डॉक्‍टर, इंजीनियर, बड़े-बड़े उद्योगपति, कारोबारी, व्यापारी और यहां तक कि खुद को समाजसेवी कहने वाले भी शामिल हैं। 
श्री राधापुरम एस्टेट बना सबसे बड़ा उदाहरण
खबर के साथ दिखाए गए चित्र भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में स्थित पॉश कॉलोनी 'श्री राधापुरम एस्टेट' के हैं। नेशनल हाईवे नंबर-19 के किनारे बसी इस कॉलोनी में दो कमरे के एक मकान की कीमत आज ढाई करोड़ रुपए से अधिक है, जिसे खरीद पाना सामान्य जन के लिए आसान नहीं है। 
मशहूर रियल स्टेट कारोबारी 'श्री ग्रुप' द्वारा 50 एकड़ से अधिक जमीन पर विकसित की गई यह कॉलोनी शुरूआत में इसलिए चर्चा का विषय थी कि यहां बनाए गए सभी मकान रूप-रंग में समान थे और चारों ओर दर्जनों बेहतरीन पार्कों के अलावा ग्रीन बेल्ट के तौर पर काफी हिस्सा छोड़ा गया था। 
करीब 750 मकानों वाली इस कॉलोनी में आज की स्थिति यह है कि 25 प्रतिशत मकान ही अपने मूल स्वरूप में बचे हैं। 75 प्रतिशत मकानों का पूरा नक्शा ही बदल दिया गया है। कुछ मकान तो पूरी तरह ध्वस्त करके दोबारा खड़े किए जा चुके हैं, और यह सिलसिला लगातार जारी है। लेकिन न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। नक्शा पास कराए बिना अधिकांश मकानों का निर्माण दो और तीन मंजिल तक जा पहुंचा है क्योंकि सबकी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA से सेटिंग हो जाती है। 
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का श्री राधापुरम एस्टेट में किस कदर मजाक उड़ाया जा रहा है इसका अंदाज बड़े पैमाने पर हुए अवैध निर्माण तथा ग्रीन बेल्ड के बड़े हिस्से पर कब्जे से लगाया जा सकता है। कुछ मकान मालिकों की मनमानी का आलम तो यह है कि उन्होंने बेखौफ होकर ग्रीन बेल्ट में अपने दरवाजे निकाल लिए हैं। किसी ने पूरा प्लेटफॉर्म बना लिया है तो किसी ने टिन शेड डालकर कब्जा कर लिया है। ये लोग उसे पूरी तरह अपने मकान का हिस्सा मानकर उस पर काबिज हो चुके हैं। 
हालांकि कॉलोनी का संचालन करने वाली सोसायटी के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने पहली बार ऐसे कुछ तत्वों को नोटिस देकर उनसे जवाब-तलब किया है, किंतु लगता नहीं कि उसका कोई बड़ा असर होगा। उसकी वजह यह बताई जाती है कि अवैध निर्माण करने वाले तथा ग्रीन बेल्ट कब्जाने वालों में वो सफेदपोश माफिया भी शामिल हैं, जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। 
रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब शिकायत किए जाने पर MVDA नोटिस-नोटिस खेलकर ''बड़ा खेल'' कर देता है और शिकायत की आड़ में सुविधा शुल्कर बढ़ाकर आंखें मूंद कर बैठ जाता है। दरअसल, करोड़ों की जमीन पर काबिज होने की कीमत का लाखों में सौदा करके रिश्वत लेने वाले और देने वाले, दोनों ही खुश रहते हैं।
पूर्व में कॉलोनी का संचालन कर रहे पदाधिकारियों ने इस ओर कभी ध्यान तक देना जरूरी नहीं समझा। फिर चाहे कोई मकान का नक्शा बदल ले, बहु मंजिला निर्माण करा ले, पार्कों पर कब्जा कर ले या उन्हें बर्बाद कर दे, सोसायटी के पदाधिकारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं था। 
यही कारण रहा कि शहर की सर्वाधिक पॉश कॉलोनियों में शुमार 'श्री राधापुरम एस्टेट' के अधिकांश निवासी अवैध कब्जे को अपना अधिकार समझ बैठे। जिसका नतीजा आज सामने है।   
ये बात अलग है कि इस उनकी इस मनमानी का पूरा लाभ विकास प्राधिकरण लगातार उठा रहा है। नवधनाढ्यों की यह कॉलोनी आज MVDA के अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए मोटी रिश्वत का माध्यम बन चुकी है। 
बात चाहे मकान का नक्शा बदलने की हो या फिर उसे रीसेल करने की। हर हाल में विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की बन आती है। वो मौका मुआयना करने के बाद खुद ही बता देते हैं कि गैर कानूनी कार्य को किस तरह 'कानूनी जामा' पहनाना है और उसकी कीमत कितनी होगी। 
इस पूरी प्रक्रिया में सरकार को लगने वाले चूने का लेखा-जोखा आंक कर सौदेबाजी की जाती है ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से खुद को विजेता समझ सकें। 
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर अपनाई गई 'जीरो टॉलरेंस' नीति को भुनाने में अपनाई जा रही यह ट्रिक सिर्फ एक कॉलोनी तक सीमित नहीं है। ब्रज की दूसरी दर्जनों कॉलोनियों में भी इसी ट्रिक से अवैध निर्माण कराया जा रहा है और इससे अपनी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी तथा कर्मचारी तिजोरियां भर रहे हैं। यदि योगी सरकार अब भी इस तरफ ध्यान दे तो एक ओर जहां अच्छी-खासी वेल डेवलप कॉलोनियां बदसूरत होने से बच सकती हैं वहीं दूसरी ओर वैध व व्यवस्थित तरीके से निर्माण कराकर सरकारी खजाना भी भरा जा सकता है। अन्यथा भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी जीरो टॉलरेंस नीति इसी तरह सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के लिए वरदान साबित होती रहेगी, साथ ही विकास की बजाय विनाश का कारण भी बनेगी। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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