वृन्दावन। बहुचर्चित श्रीबाँकेबिहारी मंदिर प्रकरण पर नजरें गड़ाए बैठे लोगों में अब सर्वाधिक उत्सुकता इस बात को लेकर है कि यदि तोषाखाने की तरह इस विश्वविख्यात मंदिर का रिकार्ड रूम भी खाली मिला तो फिर भगवान श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज की सेवाओं का वितरण आखिर किस आधार पर होगा। इस संदर्भ में सरकारी सूत्रों का कथन है कि अभी तक बिहारीजी मंदिर में सेवा बंटवारे से संबंधित कोई प्राचीन प्रमाणित अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ है, जिसमें क़ानूनी तरीके से सेवाओं का बंटबारा हुआ हो। 

इस संदर्भ में ठाकुरजी के वरिष्ठ सेवायत इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी कहते हैं कि गोस्वामी समाज के पास सेवाओं के विधिवत वितरण के प्रमाणित साक्ष्य मौजूद हैं, जिन्हें समय आने पर सरकार को सौंप दिया जाएगा।

इस बेहद चर्चित मुद्दे पर कानून के जानकार कहते हैं कि प्राचीन साक्ष्य की अनुपस्थिति में अदालत द्वारा सभी सेवायतों को समानता के कानून के अंतर्गत एक समान सेवा देने हेतु सरकार को आदेश - सलाह दिया जा सकता है। इसके चलते मंदिर के समस्त करीब 400 पुरुष सेवायतों को हर साल मात्र एक दिन की सम्पूर्ण सेवा मिलने की ही संभावना है। लड़ाई झगड़े ना हों इसके लिये एक ही व्यक्ति को सुबह से शाम तक तीनों आरती अवधियों की सेवा मिलना ठीक भी रहेगा।

कानून के इन जानकारों का मानना है कि प्रबंध कमेटी के नियमानुसार अभी तक सेवायत परिवार की बहू, बहिन, बेटी को मंदिर की ओर से सेवाधिकार व मताधिकार सहित पारस प्रसाद तक प्रदान नहीं किया जाता। देश की आधी आबादी के साथ हो रहे इस दोयम दर्जे के व्यवहार पर भी कोर्ट स्वयं संज्ञान लेकर मातृशक्ति को मूलभूत अधिकार प्रदान कराये जाने हेतु आदेश पारित कर सकती है। पूर्व के सालों में कई बार इस मूद्दे पर सेवायत परिवार के महिला-पुरुषों सहित समाज के विभिन्न तबकों ने भी एक राय जाहिर की थी और मीडिया में भी व्यापक चर्चा हुई थी।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में वृन्दावन गलियारा निर्माण व मंदिर न्यास गठन प्रकरण के चलते श्रीबाँकेबिहारी मंदिर से जुड़ी हर छोटी बड़ी खबर देश दुनियाँ में सुर्खियाँ बटोर रही है। बिहारीजी मंदिर के माननीय उच्चतम न्यायालय में लंब‍ित विवाद का मुख्य विषय सेवायतों के अधिकार एवं मंदिर सम्पत्तियों के संरक्षण पर अटका हुआ है। सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सेवा वितरण की उचित व पारदर्शिता पूर्ण प्रक्रिया के तहत अब सरकार बिहारीजी मंदिर में सेवा वितरण से संबंधित पुरातन रिकार्ड तलब करना चाहेगी, ताकि किसी भी पक्ष को शिकायत का मौका ना मिले।

हालांकि शासन-प्रशासन का रिकार्ड के आधार पर एक समान सेवा वितरण करने का ये कदम दूरदृष्टि पूर्ण है, लेकिन इससे सेवायत समाज की पेशानी पर गहरे बल पड़ गये हैं। क्यों कि उनके पास सिवाय मंदिर भड़ारी (कर्मचारी) द्वारा हस्ताक्षरित एकमात्र रसीद अथवा निजी घरेलू समझौते ही पुराने साक्ष के रूप में उपलब्ध बताए जाते हैं। इन रसीदों में भी मात्र दैनिक सेवा हेतु कमेटी द्वारा दिये जाने वाले वजनांकित रजत पात्रों के गिनती व देखभाल सहित सेवा उपरांत रोजाना उनकी सकुशल वापसी की जिम्मेदारी का ही उल्लेख होता है, सेवा संबंधित विशेषाधिकार का नहीं। इन दस्तावेजों को अदालत प्रमाणित मानेगी या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है।

इस संदर्भ में श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज की सेवा परम्परा के गहन जानकार इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि समाज के बड़े-बुजुर्गों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर माना जाता है कि आरम्भिक दौर में श्रीस्वामीहरिदासजी महाराज के अनुज गोस्वामी श्रीजगन्नाथजी महाराज ने गोपीनाथ, मेघश्याम एवं मुरारीदास नामक अपने तीनों सुपुत्रों को क्रमशः श्रंगार, राजभोग व शयनभोग आरती अवधि की सेवाएं सौंपी थीं और शुरुआती लगभग सौ वर्ष तक आराध्य की सेवार्थ उक्त तीनों हिस्सेदारों के परिवार समर्पित रहे थे। किन्तु श्रंगार-आरती सेवायत गोस्वामी गोपीनाथ के पौत्र रासदास व कृष्णदास के बाद उनका वंश शेष हो गया, जिसके चलते श्रंगारआरती अवधि की सेवा एक-एक साल के लिए राजभोग व शयनभोग सेवायतों ने बाँट ली।

उन्होंने बताया कि उसी बंटवारे के आधार पर आज तक सेवाओं का संचालन होता चला आ रहा है। सेवा वितरण के संबंध में बड़े-बुजुर्ग बताते थे कि सामाजिक बन्धुओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर हुए सेवाओं के बंटवारे से संबंधित प्रमाण मंदिर के रिकार्ड रूम एवं तोषाखाना (तहखाना) में साक्ष रूप में मौजूद हैं। सरकार द्वारा मांगे जाने पर उन प्राचीन प्रमाणों को सौंपकर सुविधानुसार सेवा वितरण सम्पन्न हो सकता है। किन्तु चिंता इस बात की है कि यदि तोषाखाने की तरह मंदिर के रिकार्ड रूम में भी पुरातन प्रमाण नहीं मिले, तो फिर सेवा के चले आ रहे बंटबारे को मान्यता किस आधार पर मिलेगी। हो सकता है उच्चाधिकार कमेटी विधि सम्मत तरीके से नया बंटवारा कर दे।

इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी के मुताबिक इन रिकार्डों में श्रीबाँकेबिहारीजी की सेवार्थ मुग़ल सम्राट अकबर, आमेर-जयपुर नरेश सवाई मानसिंह, सवाई ईस्वरीसिंह, सवाई जयसिंह, करौली की रानी नवलकुंवर, भरतपुर के राजा रतनसिंह, रसिकसंत किशोरदास, बिहारिनदेव इत्यादि अनेक भक्तों द्वारा दान की गईँ जमीनों के कागजात-दानपत्र, पुरातन वंशावली, संतति जन्म-निधन सूचिका, सम्पत्तियों-जेवरातों की सूची, कई पट्टे व देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पत्र सहित सभी कमेटियों के कार्यकालों का लेखाजोखा भी शामिल हैं। अतः जरूरत पड़ने पर रिकार्ड रूम में मौजूद पुराने कागजात सरकार को सौंप दिये जाने चाहिए।

खंगाले जाएंगे तीन पाठशालाओं एवं पुस्तकालय के रिकार्ड

मंदिर प्रबंधकमेटी द्वारा स्थापित श्रीकुँजबिहारी संस्कृत, संगीत व साहित्य पाठशाला नामक तीन पाठशालाओं सहित प्राचीन पुस्तकालय के रिकार्ड भी खंगाले जाएंगे। इस संबंध में अनेक प्रबुद्ध जनों द्वारा विगत कई वर्षों से मीडिया के जरिये माँग की जाती रही है और सीएम के पोर्टल तक पहुंच चुकीं इन शिकायतों पर शासन स्तर से जाँच भी की जा चुकीं हैं। प्रबंध कमेटी द्वारा करीबन सात दशक पूर्व स्थापित किए गए श्रीकुँजबिहारी संस्कृत पाठशाला, संगीत विद्यालय, दैनिक शिक्षा साहित्य केंद्र व पुस्तकालय से संबंधित दस्तावेज भी निश्चित खंगाले जाएंगे।

मंदिर के अधिकार क्षेत्र से लगभग लापता हो चुकीं इन प्राचीन धरोहर, पाठशालाओं व पुस्तकालय को खोजकर व्यवस्थित स्वरूप में संचालित करने के संबंध में ठाकुरजी के सेवायत एवं इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी द्वारा बीते लम्बे समय से माँग उठाई जाती रही है। इस लोकहितैषी माँग पर वर्ष 2022 में प्रदेश शासन के सचिवालय स्तर से गहनता पूर्वक जाँच भी की जा चुकी है। अब नवीन कमेटी के निर्णय के बाद प्रायः ठंडे बस्ते में पड़े हुए ऐसे अनेक गर्म मुद्दे बाहर आने को बेताब दिखाई दे रहें हैं, इसके चलते स्थानीय समाज में भी उक्त आदेश चर्चाओं के केंद्र में आ चुके हैं।

- Legend News 
 

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