रिपोर्ट : LegendNews
गुरुपूर्णिमा आज, जानिए कि प्राचीन गुरुकुल में पढ़ाई के क्या थे नियम, ये हैं 5 बड़े गुरु आश्रम
आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जा रहा है. शिष्य और गुरु के प्रति इस पर्व को बेहद खास माना जाता है. गुरु और शिष्य की परंपरा का इतिहास प्राचीन काल से ही बेहद गौरवशाली रहा है. राम, कृष्ण आदि सभी प्राचीन गुरु परंपरा में रहे हैं. गुरु आश्रम में रहकर उन्होंने प्राचीन गुरुकुल के नियमों का पालन किया.
आज जानते हैं उस गुरुकुल पद्धति के बारे में
प्राचीन काल में 12 से 25 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत धारण करने के बाद गुरु आश्रम में एक समय अंतराल के लिए रहना पड़ता था. इस दौरान राजाओं के बालकों के साथ ही सामान्य बालक भी रहते थे. गुरु आश्रम में सभी सामान रूप से गुरु दीक्षा लेते थे. इस दौरान उन्हें कई नियमों का पालन करना पड़ता था. जब बालक गुरु आश्रम की शिक्षाओं में पारंगत हो जाता था तो उन्हें घरों को वापस भेज दिया जाता था.
गुरु आश्रम के नियम व खासियतें
गुरु के आदेश का हर हाल में पालन, आश्रम के हर कार्य में सहभागिता.
भिक्षा मांगकर भोजन जुटाना, जंगल से लकड़ी आदि लाने के कार्य.
वेदों-उपनिषदों समेत शास्त्रों का ज्ञान जुटाना
शास्त्रार्थ के लिए खुद को तैयार करना
देश और प्राण रक्षा के लिए शस्त्र सीखना
संन्यासी के समान धर्म के मार्ग पर चलना
गुरु से राज्य के संचालन के लिए धर्म नीति की दीक्षा लेना
भेदभाव से परे होकर सामान्य रूप में जीवन जीना
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, और ध्यान सीखना
आध्यात्मिक और मानसिक रूप से खुद को मजबूत करना
काशी में आज भी कई आश्रम
काशी में आज भी कई आश्रम प्राचीन गुरुकुल परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. इनमें कैलाश मठ, श्री विद्या मठ, कैलाश पुरी आश्रम, सतुआ बाबा आश्रम समेत करीब 12 से अधिक आश्रम में प्राचीन सनातन पद्धति से दीक्षा दी जा रही है.
कला के लिए अलग व्यवस्था
काशी में ऐसे संगीत घराने अभी भी हैं. ये घराने शिष्य की निपुणता के आधार पर उन्हें चयनित करते हैं. यहां कोई जातीय या फिर अन्य कोई बंधन नहीं होता है. यहां सिर्फ शिष्य की निपुणता के आधार पर उन्हें इन घरानों में स्थान मिलता है. यहां की गुरु परंपरा भी बेहद पुरानी है. काशी ने दुनिया को कई बड़े वादक, शास्त्रीय संगीतकार और गीतकार दिए हैं जिन्होंने अपनी कला से दुनिया में लोहा मनवाया है.
ये हैं 5 बड़े गुरु आश्रम
वशिष्ठ मुनि आश्रम
वशिष्ठ मुनि का दीक्षा स्थान अयोध्या में है, कहा जाता है गुरु वशिष्ठ ने इसी आश्रम में राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को दीक्षा दी थी. इसके अलावा एक आश्रम बस्ती जिले के कप्तानगंज ब्लॉक में बताया जाता है. इसे वशिष्ठ नगर या वशिष्ठी के नाम से भी जाना जाता है.
भारद्वाज मुनि का आश्रम
भारद्वाज मुनि का आश्रम प्रयागराज के बालसन चौराहे के पास कर्नलगंज में स्थित है. कहते हैं वनवास के दौरान भगवान राम इस आश्रम में आए थे और उन्होंने गुरु भारद्वाज का आशीर्वाद लिया था. हर वर्ष यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन को पहुंचते हैं.यहां एक शिवलिंग भी स्थापित है, इन्हें भारद्वाजेश्वर महादेव कहा जाता है.
बाल्मीकि आश्रम
अयोध्या से 18 किलोमीटर की दूरी पर श्रवणाश्रम के निकट तमसा नदी के किनारे बाल्मीकि आश्रम है. यहां प्राचीन काल में कई शिष्य दीक्षा ग्रहण करते थे. अयोध्या छोड़ने के बाद सीताजी इसी आश्रम में रहीं थीं. लव कुश को भी यहीं दीक्षा दी गई थी. हालांकि एक बाल्मीकि आश्रम बिठूर में गंगा किनारे भी बताया जाता है. यहां सीता रसोई भी स्थापित है. यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे हैं.
महर्षि सांदीपनि का आश्रम
महर्षि सांदीपनि भगवान कृष्ण के गुरु थे. उनका आश्रम मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित है. इस आश्रम में भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा ने दीक्षा ग्रहण की थी. यह आश्रम प्राचीन काल में बड़ा गुरुकुल था.यहां गोमती कुंड में भगवान कृष्ण ने पवित्र नदियों का जल एकत्रित किया था. इसी स्थान पर भगवान कृष्ण ने 64 कलाओं का ज्ञान हासिल किया था.
श्रीहरिदास आश्रम
ऐसा माना जाता है कि स्वामी हरिदास जी का वृंदावन स्थित आश्रम 543 वर्ष पुराना है. यहीं पर उन्होंने भगवान बांकेबिहारी को प्रकट किया था. श्रीहरिदास के प्रमुख शिष्यों में तानसेन और विट्ठल विपुल देव आदि शामिल थे. स्वामी हरिदास के कुछ अन्य शिष्यों में कृष्ण दास और सनातन गोस्वामी भी शामिल थे. उन्होंने श्री हरिदास की परंपरा को आगे बढ़ाया.श्रीहरिदास के आश्रम ने संगीत के क्षेत्र में एक से बढ़कर एक शिष्य दिए.
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