निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने कहा कि बांग्लादेश में मदरसों की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वहां गैर-मुस्लिमों के खिलाफ नफरत सिखाई जाती है. उन्होंने बताया कि तारिक रहमान और मोहम्मद यूनुस के दौर में कोई अंतर नहीं है. यूनुस राज में हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ा है. तसलीमा ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की पुरजोर मांग की. 
जिस मुल्क में मदरसों की चारदीवारी के भीतर नफरत का जहर घोला जाता हो और जहां की सरकारें धार्मिक कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक चुकी हों, वहां हिन्दुओं का लहू बहना कोई इत्तेफाक नहीं. बांग्‍लादेश की प्रसिद्ध और निर्वासित राइटर तसलीमा नसरीन ने खुद अपने देश के हुक्‍मरानों को बुरी तरह लपेट दिया. भारत आई नसरीन ने समाचार एजेंसी ANI को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे बर्बर हमलों का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया. तसलीमा ने सीधे तौर पर कहा कि बांग्लादेश में सत्ता के चेहरे भले बदल गए हों लेकिन अल्पसंख्यकों की बदहाली की दास्तान आज भी वही है. चाहे तारिक रहमान का मौजूदा दौर रहा हो या फिर पहले मोहम्मद यूनुस का शासन, अल्‍पसंख्‍यकों की स्थिति में ज्‍यादा बदलाव नहीं आया है.
मदरसों में नफरत का पाठ और सरकार की चुप्पी
तसलीमा नसरीन ने देश में बढ़ते धार्मिक कट्टरवाद पर हमला बोलते हुए कहा कि बांग्लादेश में बड़ी संख्या में खुल रहे मदरसे इस नफरत की मुख्य वजह हैं. उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि किसी भी मदरसे की कोई आवश्यकता नहीं है. बांग्लादेश के कई मदरसों में अन्य धर्मों और गैर-मुस्लिमों के खिलाफ नफरत सिखाई जाती है. जब स्वतंत्र विचार रखने वालों या अल्पसंख्यकों की हत्या कर दी जाती है, तब भी अपराधियों को सजा दिलाने की कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती.” उन्होंने कहा कि देश को नए मंदिरों या मदरसों की नहीं बल्कि आधुनिक शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है. शिक्षा ही लोगों को जागरूक बना सकती है और सभी को शांति से जीने का अधिकार दे सकती है. 
40 सालों से लड़ रही हूं UCC की लड़ाई
उपमहाद्वीप में महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की वकालत करते हुए तसलीमा नसरीन ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की पुरजोर मांग की. उन्होंने कहा, “मैं पिछले 40 वर्षों से समान नागरिक संहिता के लिए संघर्ष कर रही हूं. इस उपमहाद्वीप को UCC की सख्त जरूरत है. किसी भी महिला को धर्म आधारित पर्सनल लॉ के तहत नहीं चलाया जाना चाहिए.” उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में धार्मिक कानूनों के कारण बेटियों को पिता की संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिलता, हिंदू पुरुषों द्वारा एक से ज्‍यादा शादी करने पर महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं मिलता. जो धर्म महिलाओं को सेक्‍चूअल स्‍लेव बनाकर रखता है, उसे पीछे छोड़ देना चाहिए. 
धर्म की आलोचना करने पर मिली मौत की सजा
तसलीमा नसरीन ने अपने व्यक्तिगत दर्द को साझा करते हुए कहा कि केवल धर्म और कट्टरपंथ की आलोचना करने की वजह से उन्हें अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए और मौत की सजा घोषित की गई. हालांकि, इन तमाम मुश्किलों और निर्वासन के बावजूद उन्होंने उम्मीद नहीं खोई है और महिलाओं व अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाना जारी रखा. 
-Legend News

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