वेनिस। दिव्या दत्ता अभिनीत और इंदिरा धर निर्देशित 'इकोज ऑफ वैलोर' ने वेनिस फिल्म फेस्टिवल 2025 के दर्शकों को पूरी तरह से इमोशनल कर दिया. दूसरी तरह से कहें तो 'इकोज ऑफ वैलोर' ने वेनिस फिल्म फेस्टिवल के दर्शकों को पूरी तरह खामोश कर दिया. ये फिल्म अपनी गहरी मानवीय कहानी से दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ गई.

भारतीय सिनेमा ने इस साल वेनिस फिल्म फेस्टिवल में बंद दरवाजों के पीछे 'इकोज ऑफ वैलोर' की स्क्रीनिंग के साथ अपनी एक प्रभावशाली और अमिट छाप छोड़ी. इंदिरा धर द्वारा निर्देशित, यह उनकी हिंदी डेब्यू फिल्म है और इसमें राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री दिव्या दत्ता और नीरज काबी ने शानदार अभिनय किया है.

बताते चलें कि यह शुक्ला बंदोपाध्याय की एक बेहद भावुक बॉयोपिक है, जो एक ऐसी मां की कहानी है, जिन्होंने कश्मीर सीमा पर संघर्ष में अपने जिगर के टुकड़े को खो दिया था. इस फिल्म का अनावरण फिल्म निर्माता शेखर कपूर ने पहले कॉन्स में किया था. ये फिल्म युद्ध की छाया में रहने वाली महिलाओं के दुःख, लचीलेपन और शांत शक्ति की एक बेजोड़ कहानी है.

मार्गरेट जाम्बोनीनी और आईकेए स्टूडियो द्वारा निर्मित, 'इकोज ऑफ वैलोर' को बनने में 4 साल से ज़्यादा का समय लगा. फिल्म डायरेक्टर इंदिरा धर इसे अपनी सबसे निजी परियोजना कहती हैं. इस फिल्म में कहानी प्यार, क्षति और उपचार की जरूरत की पड़ताल करती है. इटली के वेनिस में इसके अंतरंग प्रदर्शन ने दर्शकों को भावुक कर दिया. दर्शक खो से गए. ऐसा लगा मानों सन्नाटा छा गया. इस फिल्म ने सीमाओं से परे एक मां की कहानी की सार्वभौमिक प्रतिध्वनि को दुनिया के सामने उकेर कर रख दिया.

शुक्ला बंदोपाध्याय के दुःख को झेलने पर दिव्या दत्ता

'इकोज ऑफ वैलोर' में मुख्य भूमिका निभाने वाली दिव्या दत्ता ने शुक्ला बंदोपाध्याय का किरदार निभाने को अपने करियर के सबसे कठिन प्रोजेक्ट माना. साथ ही ये भी कहाकि इस रोल को निभाने में उन्हें बहुत ही संतुष्टि मिली. दत्ता यहीं नहीं रुकती हैं, वो कहती हैं कि यह किरदार डॉयलॉग बोलने और किरदार निभाने तक ही सीमित नहीं था. बल्कि यह दुःख से उबरने और एक ऐसी महिला की ताकत को अपनाने के बारे में था, जो हमेशा प्रेरणा देती रहती है.

दत्ता ने किरदार में खोते हुए कहा, "शुक्ला बंदोपाध्याय होने की सबसे चुनौतीपूर्ण बात यह थी कि यह जीवन जीना आसान नहीं है. वह ताकत, धैर्य और शालीनता की प्रतिमूर्ति रही हैं." शुक्ला, जो अक्सर सेट पर आती थीं, उनसे बात करने मात्र से ही मुझे जिम्मेदारी का एक गहरा एहसास हुआ. उन्होंने कहाकि जिस महिला का किरदार वह निभा रही थीं, उसी के सामने अभिनय करने का अवास्तविक एहसास इस काम को और भी भारी और इमोशनल बना देता था.

उन्होंने स्वीकार किया कि कैमरे बंद होने के बाद भी यह भूमिका लंबे समय तक मेरे मन में रही. दत्ता ने कहाकि, "मैं घर लौटी तो मुझे खुशी हुई कि मैं एक जिम्मेदार अभिनेत्री थी. लेकिन मुझे इस भूमिका का बहुत ज़्यादा नशा था. यह एहसास दो महीने से ज़्यादा समय तक मेरे साथ रहा."

शुक्ला बंदोपाध्याय का सफर उन्हें पाकिस्तान तक ले गया, जहां उन्होंने पाया कि एक मां का दुःख कोई सीमा कोई बाउंड्री नहीं जानता. आज के ध्रुवीकृत माहौल में, साझा मानवता का ऐसा संदेश दुर्लभ लगता है.

दत्ता ने कहा, "हम बहुत कठिन समय में जी रहे हैं, जहां हर कोई युद्ध की बात कर रहा है." उनके लिए, "इकोज ऑफ वैलोर" सिर्फ देशभक्ति के बारे में नहीं है, बल्कि मानवीय बंधनों और उन परिवारों के बारे में है, जो चुपचाप सहते रहते हैं. यह फिल्म एक सरल लेकिन प्रभावशाली सच्चाई बयां करती है. बच्चों को प्यार सिखाना ही संघर्ष के दर्द को कम करने का एकमात्र तरीका हो सकता है.

वेनिस में जबरदस्त प्रतिक्रिया

वेनिस में 'इकोज ऑफ वैलोर' की स्क्रीनिंग ने टीम की कड़ी मेहनत को प्रमाणित किया. दत्ता ने याद करते हुए कहा, "विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को एक साथ आते, आपकी फिल्म देखते, और सभी की एक ही प्रतिक्रिया देखना अद्भुत है. ये अवाक और निशब्द कर देने वाली है." दिव्या पल भर के कुछ खोते हुए कहती हैं कि स्क्रीनिंग के बाद का सन्नाटा बहुत कुछ कहता है. उनके लिए, यह मौन तालियों का सबसे शुद्ध रूप था.

फिल्म निर्देशक इंदिरा धर ने भी इसी भावना को दोहराया और कहा कि उन्हें "बहुत खुशी" है कि इतने अंतरंग विषय पर आधारित एक भारतीय फिल्म ने विदेशी दर्शकों को प्रभावित किया. इंदिरा ने पहले पुतुल फिल्म का निर्देशन किया था, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि "इकोज ऑफ वैलोर" "घर वापसी" जैसा लगा.

कलाकारों पर भावनात्मक प्रभाव

हैरी रयान की भूमिका निभाने वाले अभिनेता ऋषभ साहनी के लिए भी यह फिल्म उतनी ही प्रभावशाली थी. उनका प्रोफेसर का किरदार, नायक की यात्रा में उत्प्रेरक का काम करता है. हालांकि उन्होंने ज़्यादा कुछ न बताते हुए दर्शकों को एक भावनात्मक अनुभव का वादा किया.

उन्होंने हंसते हुए कहा, "मैं आपको गारंटी दे सकता हूं, एक बार जब आप फिल्म देख लेंगे, अगर आप शुरुआत में नहीं रोए, तो मैं शायद आपको रात के खाने पर ले जाऊंगा." उनके लिए, यह फिल्म उनकी अपनी मां के साथ निकटता के कारण बहुत प्रभावित करती है. वेनिस में, विभिन्न संस्कृतियों के लोगों ने जिस तरह से आंसुओं और मौन के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की, उससे वे भावुक हो गए. उन्होंने गर्व से कहा, "यह मेरा पहला फिल्म समारोह था और वह भी इतना प्रतिष्ठित."

एक ऐसी फिल्म जो जरूर देखनी चाहिए

रचनात्मक कार्यशालाओं में दत्ता के साथ मिलकर काम करने वाली धर ने कहा कि उन्हें पहली ही मुलाकात में यकीन हो गया था कि यह अदाकारा शुक्ला को पर्दे पर जीवंत कर सकती है. निर्देशक ने याद करते हुए कहा, "उन्होंने किरदार को बहुत अच्छी तरह समझा और उसे पर्दे पर उतारा. वह हर बार सेट पर मेरे मन की बात पढ़ लेती थीं."

अब टीम को उम्मीद है कि यह फिल्म आगे भी भारतीय दर्शकों और उससे आगे तक पहुंचेगी. जैसा कि दत्ता ने कहा, "इकोज ऑफ वैलोर सिर्फ एक युद्ध फिल्म नहीं है. यह माता-पिता, नुकसान और दृढ़ता की कहानी है. उन्होंने कहा, "आज जब मैंने यह फिल्म देखी, तो मुझे इस कहानी से जुड़ने पर बहुत गर्व महसूस हुआ है."

- Legend News

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