भारतीय राजधानी दिल्ली नगर केवल प्रशासनिक केन्द्र ना होकर सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक वैभव का अद्वितीय प्रतीक है। राष्ट्रपति भवन, राजपथ, संसद भवन, विविध कलादलों की परंपरा, उद्योगविश्व एवं देश के कोने-कोने से आई लोकसंस्कृति- इन सभी ने मिलकर दिल्ली का बहुआयामी स्वभाव गढ़ा है । यही दिल्ली प्राचीन काल में ‘इन्द्रप्रस्थ’ के रूप में जानी जाती थी- महाभारतकालीन पाण्डवों की भव्य राजधानी एवं सांस्कृतिक वैभव की मूल जननी। कालांतर में आक्रमणों की शृंखला में इस नगर की मूल पहचान धूमिल हो गई; इसके नाम, संस्कृति एवं जीवनदृष्टि पर परकीय छटा छा गई। आज सम्पूर्ण देश भर से दिल्ली को उसका प्राचीन, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक नाम ‘इन्द्रप्रस्थ’ वापस मिले, ऐसी सशक्त मांग हो रही है। इस राष्ट्रीय आंदोलन में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। 
दिल्ली का इतिहास एवं ऐतिहासिक प्रमाण 
इन्द्रप्रस्थ महाभारतकालीन नगर है एवं पाण्डवों की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है। यमुना के तट पर बसा यह नगर उस काल में कला, शौर्य, प्रशासन एवं वैभव का केन्द्र माना जाता था। ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व अनुसंधान के प्रमाणों को देखने पर, मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त, राजपूत, सुलतान एवं मुगल काल के विविध अवशेष दिल्ली में पाए गए हैं। विशेषत: पुराने किले में 1955 एवं 2013-14 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) ने किए गए उत्खनन में ‘पेन्टेड ग्रे वेअर’ (Painted Grey Ware) संस्कृति के अवशेष मिले हैं। इस संस्कृति का सम्बन्ध महाभारतकाल से माना जाता है। अनेक प्राचीन ग्रन्थ, प्रवासी एवं इतिहासकार दिल्ली क्षेत्र को ‘इन्द्रपत्त’ अथवा ‘इन्द्रप्रस्थ’ इसी नाम से जानते हैं। यह सांस्कृतिक स्मृति आज भी आधुनिक दिल्ली के परिचय में संजोई गई है। 
नाम-परिवर्तन का सांस्कृतिक अर्थ 
इन्द्रप्रस्थ यह नाम केवल ऐतिहासिक नहीं है, अपितु यह आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी प्रतीक है। महाभारत की कथा के अनुसार पाण्डवों ने यमुना के तट पर स्थित खाण्डववन से (खाण्डवप्रस्थ) नया भव्य नगर बनवाया एवं देवाधिदेव इन्द्र के सम्मानार्थ उस नगर को ‘इन्द्रप्रस्थ’ यह नाम दिया । इसलिए यह नाम दैवी परंपरा, सांस्कृतिक अस्मिता एवं राजसत्ता – इन तीनों घटकों का प्रतिनिधित्व करता है। नई पीढ़ी को उनके इतिहास से जोडनेवाला, स्वाभिमान की भावना जगानेवाला यह नाम दिल्ली के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। दिल्ली को ‘इन्द्रप्रस्थ’ यह नाम दिए जाने से पर्यटन, स्थानीय उद्योग, हॉटेल्स (होटल) एवं हस्तकला क्षेत्र को भी बडा लाभ हो सकता है। राजनीतिक अथवा प्रशासनिक स्तर से परे यह परिवर्तन राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक बडा चरण सिद्ध हो सकता है। 
‘इन्द्रप्रस्थ’ का अनुसरण, अनुसंधान एवं मांग 
‘द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट’ की नीरा मिश्रा जी ने इन्द्रप्रस्थ के इतिहास पर उल्लेखनीय अनुसंधान करके इस संकल्पना को शास्त्रशुद्ध आधार दिया है। पुराने किले में उत्खनन, महाभारत एवं पौराणिक संहिताओं का उल्लेख, चीन–ग्रीस के यात्रियों का अभिलेख, भौगोलिक प्रतिपादन एवं ऐतिहासिक साहित्य का गहन अध्ययन करके उन्होंने ‘इन्द्रप्रस्थ रीविसिटेड’ (Indraprastha Revisited) यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की है। भाजप सांसद प्रवीण खंडेलवाल जी ने केन्द्रीय गृहमंत्री मा. अमित शाह जी को दिल्ली का नाम ‘इन्द्रप्रस्थ’ करने के लिए पत्र द्वारा विनती की है। उन्होंने पुरानी दिल्ली स्थित रेल स्थानक का नाम ‘इन्द्रप्रस्थ जंक्शन’ एवं दिल्ली हवाई अड्डेका का नाम ‘इन्द्रप्रस्थ अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा’ करने की साथ ही पाण्डवों की प्रतिमाओं की स्थापना करने की भी मांग की है। 
शंखनाद महोत्सव में भूमिका का महत्त्व 
‘सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन’ प्रस्तुत एवं ‘सनातन संस्था’ आयोजित ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ यह राष्ट्रीय स्तर का भव्य कार्यक्रम 13–14 दिसम्बर 2025 को ‘भारत मण्डपम’ (इन्द्रप्रस्थ) में आयोजित हो रहा है। इस महोत्सव में शिवकालीन शस्त्र-प्रदर्शन, प्राचीन भारतीय सुरक्षा व्यवस्था, शौर्य का स्मरण एवं सांस्कृतिक विरासत/धरोहर की जागृति की जाएगी। यह महोत्सव केवल सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन की चिंगारी जगानेवाला कार्यक्रम ना होकर ‘दिल्ली से इन्द्रप्रस्थ’ इस परिवर्तन की प्रक्रिया को समाज के एकत्रित सहभाग से गति देनेवाला ऐतिहासिक क्षण सिद्ध होनेवाला है। तो फिर चलिए, इन्द्रप्रस्थ का शंखनाद करने के लिए आगे बढें! 
चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था, सम्पर्क : 7775858387
-Legend News

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