भारत में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान ने एक ऐसा मुद्दा छेड़ दिया है, जो अमेरिका और खासकर उसके मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मागा (MAGA Politics) राजनीति को बहुत ही ज्यादा चुभ सकता है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ वहां के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी दिल्ली आए हैं और उन्होंने 'सिंगल करेंसी' पर विचार की बात करके ट्रंप की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
'सिंगल करेंसी का मुद्दा अभी भी विचाराधीन'
दरअसल ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है 'ब्रिक्स के सभी सदस्यों की राय अलग-अलग है, लेकिन सभी सदस्य मानते हैं कि राष्ट्रीय मुद्राओं को मजबूत किया जाना चाहिए और सदस्य राष्ट्रों के बीच व्यापार राष्ट्रीय मुद्राओं के माध्यम से ही होना चाहिए।' यहां तक तो फिर भी ठीक है, लेकिन इसके आगे की एक लाइन सीधे ट्रंप के मंसूबे को झटका देने वाली है। 
राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी व्यापार पर मंथन
पहले अराघची की दोनों बातों में फर्क समझना जरूरी है। पहले में ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्रों के बीच आपसी व्यापार अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जाने की बात है। जैसे- रुपये और रूबल में, रुपये और युआन में या रुपये और रियाल में। इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी। इस मुद्दे पर ब्रिक्स राष्ट्रों के बीच गंभीरता से मंथन चल रहा है।
सदस्यों ने कॉमन करेंसी पर विचार से रखी है दूरी
जहां तक ब्रिक्स देशों की अपनी एक सिंगल करेंसी की बात है, तो इसका जिक्र करके ईरान ने यूरोपियन यूनियन की यूरो की तरह एक समान मुद्रा की ओर इशारा किया है। जबकि, भारत और ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों ने फिलहाल इस तरह की किसी भी कॉमन करेंसी वाली नीति का खंडन किया है। 
डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स को मानते हैं डॉलर के लिए खतरा
डोनाल्ड ट्रंप ने जब से दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला है, वह लगातार दावा करते आ रहे हैं कि ब्रिक्स या ग्लोबल साउथ वाले देश अमेरिकी डॉलर के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं।
2025 में जब ब्राजील के रियो डी जनेरियो में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम पर विचार के लिए ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स बनाया गया तो ट्रंप को मानो मिर्ची लग गई।
ब्राजील और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ थोपी
उन्हें लगा कि यह तो उनके 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन वाले' मंसूबे की मिट्टी पलीद कर देगा। यही वजह है कि उन्होंने सबसे पहले ब्राजील और भारत पर 50 फीसदी वाला टैरिफ बम फोड़ दिया। उन्होंने अमेरिका और उसके पीछे चलने वाले देशों को यही समझाया कि यह तो डॉलर को कमजोर करने की साजिश है। 
डी-डॉलराइजेशन क्या है
वैसे डी-डॉलराइजेशन अपने आप में अर्थशास्त्रियों के द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द है। इसका इस्तेमाल सबसे पहले 1960 के दशक में रॉबर्ट ट्रिफिन नाम के एक अर्थशास्त्री ने किया था। उन्होंने व्यापार और बचत के लिए अमेरिकी डॉलर पर दुनिया की अत्यधिक निर्भरता को कम करने की वकालत शुरू की थी। 
-Legend News

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