योगीराज भगवान कृष्ण की क्रीड़ास्थली वृंदावन में कल 11 जानें अकाल मृत्यु का शिकार हो गईं। पलक झपकते ही पंजाब के 11 तीर्थयात्री काल के गाल में समा गए, लेकिन घटना के 24 घंटे बाद तक जिला प्रशासन यह तक बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर इस हृदय विदारक मोटर बोट हादसे का जिम्मेदार है कौन, किसके नकारापन ने एक साथ 11 लोगों की जिंदगियां छीन लीं। 
चूंकि वृंदावन सहित समूचे मथुरा जनपद में प्रतिदिन लाखों तीर्थयात्री आते हैं इसलिए लोगों का यह जान लेना जरूरी है कि यदि आप यहां आ रहे हैं तो आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। 
कहने को इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पर यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए अनेक सरकारी इंतजामात का ढिंढोरा पीटा जाता है, हर आयोजन-प्रायोजन तथा तीज-त्यौहार एवं विशेष पर्वों पर अधिकारियों का लाव-लश्कर भी नजर आता है किंतु चलता सब रामभरोसे ही है क्योंकि धर्म की आड़ में अधर्म का जैसा नंगा नाच मथुरा में होता है, वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले।

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दुख और अफसोस की बात यह है कि इस धार्मिक जनपद में पर्यटन की तरह पोस्टिंग पर आने वाले उच्च अधिकारी भी किसी प्रश्न का जवाब देने को तैयार नहीं हैं। यहां तैनात अधिकारी शायद इसलिए बेलगाम हैं क्यों कि दर्जनों बार मथुरा के विभिन्न स्थानों का अलग-अलग मौकों पर दौरा कर चुके सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक बार भी न तो मीडिया से मुलाकात करना जरूरी समझा और न किसी अन्य सूत्रों से यह जानने की कोशिश की कि यहां तैनात अधिकारियों को लेकर आमजन क्या विचार रखता है। 
इसीलिए अब सीधा सवाल सूबे के सीएम योगी से क्योंकि एक झटके में 11 जिंदगियां जाने के बावजूद मथुरा में तैनात अधिकारी, लापरवाही का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने में व्यस्त हैं। 
इन फैक्‍ट, वो यमुना में सैकड़ों मोटर बोट... चप्पू नाव तथा स्‍टीमर के अवैध संचालन तक की जिम्मेदारी शासन की कार्यप्रणाली पर डाल रहे हैं जबकि यमुना में इनका अवैध संचालन उनकी तिजोरियां भर रहा है। 
कल जब इस बारे में मीडिया ने नगर निगम के अधिकारियों से बात की तो उनकी बेशर्मी का आलम यह था कि वो इनके अवैध संचालन को स्वीकार करते हुए भी ढाई महीने पहले प्रयागराज भेजे गए उस गजट का हवाला दे रहे थे जो नावों के संचालन हेतु लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। 
क्या सीएम योगी यह बताएंगे कि बिना लाइसेंस यमुना में चल रही सैकड़ों नावों के खिलाफ जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी कोई एक्शन क्यों नहीं लिया? 
विभिन्न मौकों पर अधिकारी इन्हीं अवैध मोटर बोटों में खुद कैसे भ्रमण करते रहे हैं, और क्यों किसी आमजन के लिए लाइफ जैकेट जरूरी नहीं की गई, क्या उसके लिए भी किसी गजट की दरकार है या आम आदमी की जिंदगी का अधिकारियों की दृष्टि में कोई मोल है ही नहीं? 
किसी को भी यह जानकार आश्‍चर्य हो सकता है कि मथुरा-वृंदावन में अवैध रुप से चल रही इन नावों पर उनके संचालकों ने लोगों को आकर्षित करने के लिए बाकायदा सेल्फी प्‍वाइंट तक बना रखे हैं और उनका उपयोग ऊट-पटांग हरकतों के साथ बिना लाइफ जैकेट पहने बेखौफ किया जाता है क्योंकि न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। 
कृष्‍ण की नगरी में आने वाले अधिकांश अधिकारी कहने को अपनी तैनाती के पहले दिन से तो धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं, किंतु उनकी गिद्ध दृष्टि हर समय अधिक से अधिक अतिरिक्त कमाई के स्‍त्रोत ढूंढने में लगी रहती है। अवैध रुप से संचालित नावें भी उनमें से एक हैं। 
यह भी मान सकते हैं उत्तर प्रदेश में मथुरा जनपद की तैनाती किसी भी अधिकारी के लिए उसकी सर्विस का स्‍वर्णिम काल साबित होता है। यही कारण है कि कार्यकाल के दौरान ही नहीं, रिटायरमेंट के बाद भी कोई अधिकारी मथुरा को छोड़ना नहीं चाहता। वह किसी न किसी रूप में यहीं बने रहना चाहता है। आज भी कई अधिकारी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। चाहे बांके बिहारी मंदिर की भीड़ में कोई दबकर मरे, या नाव दुर्घटना में किसी का पूरा परिवार समाप्त हो जाए, अधिकारियों को फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता तो इतनी दर्दनाक दुर्घटना के जवाब ऐसे बेदर्द नहीं होते। 
योगी जी, मथुरा बेशक एक विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी है लेकिन किसी भी अधर्म के लिए धर्म एक बड़ी आड़ का काम करता है इसलिए कृपया करके यहां हो रहे अधर्म तथा उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों की करतूतों पर भी गौर कीजिए ताकि फिर किसी की नाव इस तरह न डूबे और इस तरह इतने लोग अकाल मृत्यु का शिकार न बनें। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी  

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