केरल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार को करारी हार का सामना करना पड़ है। ऐसे में वह 'लाल रंग' जो कभी भारत के राजनीतिक नक्शे पर हावी था, अब बस टुकड़ों में ही बचा है। वामपंथी पार्टियां भले ही अपनी संगठनात्मक मौजूदगी बनाए हुए हैं। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। इन पार्टियों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई(एम) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यानी सीपीआई (एमएल) लिबरेशन शामिल हैं।
सत्ता के शिखर से सिमटते आधार तक
1980 के दशक में वामपंथी पार्टियां अपनी सबसे मजबूत स्थिति में थीं।
उनका नेतृत्व सीपीआई (एम) कर रही थी।
उस समय वे केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में एक साथ सत्ता में थीं।
लोकसभा में उनका सबसे अच्‍छा वक्‍त 2004 में आया।
तब उन्होंने 60 से ज्‍यादा सीटें जीती थीं।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को 'फ्लोर टेस्ट' का सामना करना पड़ा था। ऐसा तब हुआ, जब वाम मोर्चा ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। उसके लोकसभा में करीब 60 सांसद थे। 
वामपंथी गुट पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक सत्ता में रहा। त्रिपुरा में उसने 1993 से 2018 तक शासन किया। केरल में वह हर पांच साल बाद सत्ता में वापसी करता रहा। 2021 में उसने इस क्रम को मजबूती से जारी रखते हुए एक नया इतिहास रच दिया।
बंगाल में सबसे लंबा शासन
1977 में सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई। इसके साथ ही, भारत के किसी भी राज्य में किसी एक पार्टी की ओर से लगातार सबसे लंबे समय तक शासन करने का सिलसिला शुरू हो गया। ज्योति बसु ने 23 साल से भी ज्‍यादा समय तक मुख्यमंत्री के तौर पर काम किया। इसके बाद साल 2000 में उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य को सत्ता सौंप दी। इसके बाद भी वामपंथी पार्टियों ने बंगाल में 11 साल और शासन किया। 
त्रिपुरा में बीजेपी ने खत्‍म किया राज
वामपंथी पार्टियों का त्रिपुरा में 1993 से 2018 तक शासन रहा। 1993 में वामपंथी पार्टियों ने राज्य में जबरदस्त जीत हासिल की। विधानसभा की कुल 60 सीटों में से अकेले सीपीआई (एम) ने ही 44 सीटें जीत ली थीं। दशरथ देब 1998 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद माणिक सरकार ने यह जिम्मेदारी संभाली। अगले 20 सालों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे। त्रिपुरा में 25 साल से चला आ रहा लेफ्ट फ्रंट का शासन 2018 में खत्म हो गया। तब‍ बीजेपी ने उसे चौंकाते हुए बुरी तरह हरा दिया। बीजेपी ने 2023 में भी यही कमाल दोहराया। 
केरल में सफाया, बना इतिहास
केरल विधानसभा चुनाव 2026 में सीपीआई (एम) के खराब प्रदर्शन के साथ ही लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया है। वोटों की गिनती के मौजूदा रुझानों के मुताबिक कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने इस दक्षिणी राज्य में अच्छी-खासी बढ़त बना ली है।
केरल में पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार कम्युनिस्टों का आखिरी गढ़ थी जो आज ढह गया। यह 2016 में सत्ता में आई थी। 1977 के बाद पहली बार भारत में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा। 
भारत में लेफ्ट का राजनीतिक इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। जब 1951-52 में देश में पहली बार चुनाव हुए थे, तब लोकसभा में विपक्षी पार्टियों में सबसे ज्‍यादा सीटें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के पास ही थीं।
ठीक पांच साल बाद 1957 में भारत की लेफ्ट पार्टियों ने केरल में चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। किसी भी बड़े देश में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार बनाई।
केरल में लेफ्ट की सत्ता आती-जाती रही। लेकिन, एक और राज्य जहां उसे लंबे समय तक लगातार सफलता मिली, वह त्रिपुरा था। यह 2018 में बीजेपी के हाथों चला गया। 
-Legend News

मिलती जुलती खबरें

Recent Comments

Leave A Comment

Don’t worry ! Your Phone will not be published. Required fields are marked (*).