रुड़की। हिमालय की गोद में समुद्र तल से 12 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर विराजमान भगवान शिव के विश्व प्रसिद्ध तुंगनाथ मंदिर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल शुरू कर दी गई है. तुंगनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में है. ये दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर है.

लगभग एक हजार वर्ष पुरानी इस प्राचीन धरोहर में सामने आए संरचनात्मक झुकाव के संकेतों के बाद अब इसके संरक्षण की जिम्मेदारी देश के अग्रणी अनुसंधान संस्थान केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) रुड़की ने संभाल ली है. आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के जरिए मंदिर का उपचार किया जाएगा, ताकि इसकी मजबूती बरकरार रहे और आने वाली कई पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक धरोहर के दर्शन कर सकें.

सीबीआरआई रुड़की ने संभाली तुंगनाथ मंदिर के संरक्षण की कमान

विश्व के सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित शिव मंदिरों में शामिल उत्तराखंड में मौजूद तुंगनाथ मंदिर के संरक्षण को लेकर बड़ी पहल की गई है. विशेषज्ञों के मुताबिक समय, मौसम, भारी बर्फबारी, भूकंपीय गतिविधियों और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण मंदिर की संरचना में हल्के बदलाव और झुकाव के संकेत मिले थे. इसके बाद सीबीआरआई रुड़की के विशेषज्ञों ने मंदिर का विस्तृत तकनीकी सर्वेक्षण, संरचनात्मक विश्लेषण और वैज्ञानिक परीक्षण किया.

हजार साल पुरानी धरोहर को मिलेगा वैज्ञानिक कवच

अध्ययन के आधार पर अब एक विशेष संरक्षण योजना तैयार की गई है, जिसमें मंदिर की मूल वास्तुकला को बिना किसी नुकसान के उसकी मजबूती बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जाएगा. इस वैज्ञानिक संरक्षण अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि मंदिर के मूल स्वरूप, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक पहचान से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा. इंजीनियर मंदिर की नींव, पत्थरों की स्थिति, भार संतुलन और झुकाव का गहन विश्लेषण कर अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से संरचना को स्थिर करेंगे. पूरी प्रक्रिया के दौरान डिजिटल मॉनिटरिंग, तकनीकी परीक्षण और विशेषज्ञों की लगातार निगरानी रहेगी, ताकि संरक्षण कार्य पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी ढंग से पूरा हो सके.

अन्य प्राचीन मंदिरों के लिए खुलेगी राह

सीबीआरआई के विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक मंदिर का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और सनातन आस्था की रक्षा का अभियान है. तुंगनाथ मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला, धार्मिक महत्ता और ऐतिहासिक विरासत के कारण विश्वभर के श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र रहा है.

ऐसे में इसका वैज्ञानिक संरक्षण देश की विरासत संरक्षण यात्रा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण कार्य का प्रत्येक चरण वैज्ञानिक अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप किया जाएगा. यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में देश के अन्य प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए भी यह मॉडल बेहद उपयोगी साबित हो सकता है.

सीबीआरआई की पांच वैज्ञानिकों की टीम कर रही काम

 आस्था और आधुनिक विज्ञान के इस अद्भुत संगम से उम्मीद की जा रही है कि तुंगनाथ मंदिर आने वाले सैकड़ों वर्षों तक अपनी भव्यता, ऐतिहासिक पहचान और आध्यात्मिक गरिमा के साथ सुरक्षित खड़ा रहेगा. यह पहल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक अध्याय लिखने जा रही है.

अगस्त 2025 में हमें मंदिर के लिए कॉन्टेक्ट किया गया था. हमारे पांच वैज्ञानिक इसमें काम कर रहे हैं. डॉ मनोजीत सामंता टीम का नेतृत्व कर रहे हैं. उनके साथ डॉ देवदत्ता घोष, डॉ हिना गुप्ता, शशांक और श्रीनिवास शामिल हैं. हमें बताया गया कि तुंगनाथ मंदिर ढाई डिग्री टिल्ट हुआ है.

C.B.R.I रुड़की के निदेशक प्रोफेसर आर प्रदीप कुमार ने बताया क‍ि पहले इस मंदिर को स्टोन बाई स्टोन अनलोडिंग करके एल्गी के ग्रोथ को निकालते हैं. इस दौरान एक कोडिंग होती है कि कहां से कौन सा पत्थर निकाला गया है. इसके बाद पत्थर का ग्राउंड स्टेबिलिटी एनालिसिस करके वो कितना स्टेबल रह सकते हैं, इसका अधययन किया जाएगा. फिर जहां से स्टोन निकाले गए उसे वहीं लगाया जाएगा. इस दौरान हर चीज को ध्यान में रखा जाएगा.

क्यों पड़ी संरक्षण की जरूरत

दरअसल उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 12,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित विश्व के सबसे ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर, तुंगनाथ मंदिर में लगभग 5 से 6 डिग्री का झुकाव आ गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि मंदिर परिसर की छोटी संरचनाओं में 10 डिग्री तक का झुकाव देखा गया है. समुद्र तल से अत्यधिक ऊंचाई, चट्टानों के खिसकने और भूकंपीय गतिविधियों के कारण इस प्राचीन मंदिर को यह नुकसान पहुंचना बताया गया. इस ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को बचाने के लिए एएसआई (ASI) और केंद्र सरकार इसे 'राष्ट्रीय महत्व के स्मारक' का दर्जा देकर इसके संरक्षण की प्रक्रिया शुरू की.

कहां है तुंगनाथ मंदिर

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित तुंगनाथ मंदिर 12,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित है. नागार्जुन शैली में बना हुआ ये मंदिर पांच केदारों में से एक है. ये 1000 साल पुराना मंदिर है. कहा जाता है कि पांडवों ने इसका निर्माण किया था और भगवान शिव की यहां पूजा की थी. साथ ही रावण ने भगवान श‍िव को प्रसन्‍न करने के ल‍िए इसी जगह पर तपस्या की थी. इसके अलावा भगवान राम ने रावण के वध के बाद खुद को ब्राह्मण हत्या के श्राप से मुक्त करने के लिए इस जगह पर श‍िवजी की तपस्या की थी. यह मंदिर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अंतर्गत आता है. अब सीबीआरआई रुड़की इसका संरक्षण कर रहा है.

कैसे पहुंचें तुंगनाथ मंदिर

तुंगनाथ मंदिर पहुंचने के लिए आपको नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और नजदीकी हवाई अड्डा जौलीग्रांट पड़ेगा. इन दोनों स्थानों से आप बस, टैक्सी या अपने निजी वाहन से उखीमठ होते हुए चोपता पहुंच सकते हैं. यहां से करीब 4 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़कर तुंगनाथ मंदिर पहुंच सकते हैं. कुमाऊं की तरफ से भी आप तुंगनाथ पहुंच सकते हैं. इसके लिए आपके नजदीकी रेलवे स्टेशन रामनगर, हल्द्वानी और काठगोदाम होंगे. रामनगर से आप जेएमओयू की बस, टैक्सी बुक करके या फिर अपने वाहन से गैरसैंण और कर्णप्रयाग होते हुए चोपता पहुंच जाएंगे. हल्द्वानी और काठगोदाम से आपको रोडवेज की बसें मिलेंगी. इसके साथ ही वहां से टैक्सी बुक करके या फिर अपने वाहन से भी आप पहुंच सकते हैं. तुंगनाथ दर्शन के लिए मई से अक्टूबर तक का समय सही है. बाकी समय यहां बर्फ से ढका रहता है.
- Legend News

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