अहं को छोड़, ममकार के ज्वर से मुक्त होकर युद्ध कर: कपिल शर्मा

मयि सवीणिकर्माणि संन्यास्याध्यात्मचेतमा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:

श्री कृष्ण कहते हैं कि अपनी चेतना (चित्त) को आत्मा के साथ युक्त करके, समस्त कर्मों को मुझ में अर्पण करके, व्यक्तिगत आशा एवं कामना को और अहं के भाव को छोड़कर, अपने ममकार के ज्वर से मुक्त होकर युद्ध कर।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं मुझमें समर्पित कर अर्थात् परमात्मा का आश्रय ले। श्री कृष्ण तो पूर्णब्रह्म हैं अतः बिना उनका आश्रय लिए गति ही नहीं है। आश्रय भी कौन सा? सब मुझे अर्पण कर निश्चिंत हो जा! सम्पूर्ण कर्म, कर्मफल, कर्म की प्रेरणा और कर्म का परिणाम भी।

सहज है क्या ऐसा, पूर्ण शरणागति भाव पूर्ण समर्पण? यह तो भक्ति और विश्वास की पराकाष्ठा है। युद्ध भूमि में बन्धु-बांधवों के साथ युद्ध से भाग रहे अर्जुन के लिए तो शरणागति भाव सहज नहीं था। श्री कृष्ण कहते हैं विगत ज्वर अथवा ममकार के ज्वर से मुक्त होकर। कौन से बुख़ारों से पीड़ित हैं अर्जुन? कौन से ज्वर की बात हो रही है, जिनको छोड़े बिना परमात्मा की शरण प्राप्ति में बाधा है। इस शरीर में तो अनेकानेक ज्वर भरे पड़े हैं। क्रोध का ज्वर, काम का ज्वर, लोभ का ज्वर और ईर्ष्या का ज्वर तो मनुष्य के अंदर निरन्तर ताप उत्पन्न कर रहे हैं।

ज्वर कहते किसको हैं? जब शरीर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाए, तो कहते हैं बुख़ार चढ़ गया, ध्यान से देखोगे तो समझ जाओगे कि बुख़ार उतरा ही कब था। यदि बुख़ार उतर गया होता तो श्री कृष्ण क्यों कहते कि विरत ज्वर हो जाओ। इतनी सहज नहीं है ज्वर से मुक्ति। कभी किसी को क्रोध की अग्नि में तपते देखा है? ध्यान से देखोगे या अनुभव करोगे तो समझ जाओगे, सारा तन-मन , तप रहा होगा, नेत्र से अग्नि प्रकट हो रही होगी, रक्तचाप उच्च होगा, हृदय ज़ोर ज़ोर से धड़केगा, शरीर पसीना पसीना हो रहा होगा। सत्य है यदि क्रोध चरम पर पहुँच जाए तो क्रोधाग्नि शरीर को भी जला सकती है। इंद्रियाँ ज्ञान करा देती हैं कि अब बस, और क्रोध चरम तक पहुँचता ही नहीं। लेकिन ऐसा नहीं है की काम-क्रोध के ताप से मर नहीं रहे हैं, चूँकि क्रोध किस्तों में कर रहे हैं, थोड़ा-थोड़ा करके कर रहे हैं, इसलिए मर भी थोड़ा-थोड़ा कर रहे हैं। कीटाणु जनित ज्वर तो शरीर की हानि करेंगे परंतु जो ज्वर हमारे अंदर से ही उत्पन्न हो रहे हैं, वह तो शरीर के साथ साथ आत्मा को तो मलिन करते ही हैं, पुण्य कर्मों- यश आदि का भी क्षय कर रहे हैं, आंतरिक ज्वर में तो मृत्यु और जीवन के बीच कोई दूरी ही नहीं बचती।
आवश्यक नहीं आक्रमण बाहर से ही होगा, हमारे शरीर में भी ऐसे शत्रु छिपे बैठे हैं, जो निरन्तर आक्रमण कर रहे हैं और हम निरन्तर कष्ट – संताप ग्रस्त रहते हैं। क्रोध प्राण ले या न ले किंतु जीवन में रस, उमंग – तरंग सब नष्ट कर नीरसता पैदा कर देगा, जीवन के आनंद प्रवाह को अवरुद्ध कर देगा।

कामवासना का ज्वर भी क्रोध के ज्वर से कम घातक नहीं है। यह शरीर को ही नहीं आत्मा को भी तपा देगा और यहाँ भी शरीर को तो पसीना पसीना होगा ही और यदि नियंत्रण नहीं रहा तो प्राण तक छूट जाएँगे।

ईर्ष्या कि अग्नि की जो ताप है , वह तो तप को भी जला देती है , शरीर तो तृण मात्र है। यह तो आंतरिक ज्वर हैं , यह तो पाप के भी मूल हैं। ये ज्वर ज्ञान-विवेक-मर्यादा सभी तो भुला देते है। जब होश में ही नहीं रहे तो पाप-पुण्य और सद मार्ग और कुमार्ग का भेद ही कौन बताएगा।
सच्चा आनंद का मार्ग तो विरत ज्वर को ही मिल सकता है, अन्यथा असंतोष और संताप का मार्ग पर तो चल ही रहे हो।

पूर्णब्रह्म कृष्ण ही अर्जुन को कह सकते थे कि अपनी समस्त दैविक-दैहिक-भौतिक! रोग, शोक संताप आशायें ममता अपेक्षा सब मुझ पर छोड़ दो

किसी को कहना कि सब मुझ पर छोड़ दो, कोई सरल बात नहीं है। यहाँ मुझ से आशय श्री कृष्ण का विराट ब्रह्म स्वरूप ही होगा। यह तो परम समर्थ कृष्ण ही कह सकते हैं, किसी के सम्पूर्ण भार- उत्तरदायित्व को स्वीकार करना तो परम समर्थ के लिए ही सम्भव है। यह भी विचारणीय है कि ऐसा समर्पण भाव, ऐसा शरणागति भाव भी अर्जुन जैसे विश्वासी के लिए ही सम्भव है। शरणागति भाव तो सबल के अंदर ही जाग्रत हो सकता है, निर्बल के पास तो यह विकल्प ही नहीं होता है।

यह स्वाभाविक भावोतपत्ति है कि एक अबोध बालक अपने पिता का का हाथ पकड़कर निश्चिंत हो जाता है। भले ही पिता चिंतित बना रहे, लेकिन बालक तो हाथ पकड़कर प्रसन्नता से गुनगुनाता हुआ मस्त चल रहा है, अपनी ही धुन में।
अब उसको कोई चिंता तो रही नहीं है, पिता ने हाथ जो पकड़ा है, इस भाव से वह स्वतः चिंता मुक्त हो गया। यही है समर्पण का भाव, शरणागति भाव, परम विश्वास कि अब परमात्मा जानें। अबोध और सबल यह दो ही हैं, जो शरणागति भाव को प्राप्त कर सकते है, अन्य के लिए दुर्लभ ही है।

शरणागति भाव को प्राप्त करने के उपरांत
संदेह एवं अहंकार टिक ही नहीं सकते, एक भाव से यह भी कह सकते हैं की संदेश और अहंकार को पकड़े रह कर शरणागति भाव की प्राप्ति सहज सम्भव नहीं है। जब संदेह और अहंकार से मुक्त हो जाते हो तो जो शक्ति इनके पोषण में व्यर्थ हो रही है, वह भी समर्पण के मार्ग में लगना शुरू हो जाएगी। शक्ति जो विभाजित है और वह जो हृदय में श्रद्धा और समर्पण की सूक्ष्म धारा है, दोनों एकरूप सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त करते ही विशाल नदी का रूप धारण कर लेगी। सत्य ही है कि जब नदी का प्रवाह विभाजित नहीं होता तभी उसके वास्तविक वेग के दर्शन होते हैं। भाव जो भी रखो सम्पूर्ण रखना, खंडित अथवा विभाजित भाव से लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव नहीं है। जिसको भोगना चाहते हो, जिसमें आनंद खोज रहे हो, पूरा भोगो। या तो इस नाव पर या फिर उस नाव पर, जब तक एक नाव की सवारी नहीं करोगे, उसकी क्षमता और अच्छाई-बुराई को समझ नहीं सकते। कूदते रहोगे इस नाव से उस नाव और उस नाव से इस नाव पर और सारा जीवन दुविधा में ही निकल जाएगा।

स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है कि
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:

सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है।

युद्ध क्षेत्र में यहाँ कौन से धर्म की चर्चा हो रही है? आध्यात्मिक विश्वास, योद्धा के धर्म, मनुष्य धर्म, पुत्र धर्म, पति धर्म की आदि आदि? यदि विचार करें सभी धर्म, कर्तव्य पालन और सत्य निष्ठा पर ही तो टिके हैं। इनके पालन के लिए मार्ग तो निश्चित करना ही होगा कि दृढ़ संकल्प अथवा सम्पूर्ण समर्पण और तर्क अथवा प्रेम। यहाँ अगर तुमने निर्णय ले लिया और फिर तुम उस निर्णय के अनुसार चल पड़े, बिना झुके, बिना वापिस मुड़े, तो भी लक्ष्य की प्राप्ति निश्चित है।
एक प्रचलित कहानी है, जिसकी सत्यता को प्रमाणित करना कठिन है किंतु कहानी का भाव बहुत ही प्रामाणिक है।

वर्षा ऋतु है, संध्या काल है, सम्राट अशोक खड़े हैं अपने सेवकों और मंत्रियों के साथ पाटलिपुत्र में गंगा तट पर। गंगा प्रचण्ड वेग से बह रहीं हैं, किनारों के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद भाव से। बहे जा रहे हैं असंख्य पशु, गाँव, झोपड़ी। क्या राजा- क्या प्रजा सभी गंगा के प्रचण्ड रूप से भयभीत, असहाय से देख रहे हैं भीषण तबाही को।
पता नहीं अशोक को क्या सूझा, कहने लगा कि क्या यह सम्भव है कि गंगा का प्रवाह अपने स्रोत की तरफ़ पलट जाए? अर्थात् गंगा उल्टी बहने लगे।
सभी ने कहा असम्भव। समीप में खड़ी नगर वधू ( वेश्या) विंदुमति ने कहा सम्भव है। सभी उसको विचित्र दृष्टि से घूरने लगे कि राजा के सामने यह कैसी धृष्टता है और पूछा कैसे सम्भव है? विंदुमति ने कहा मुझे अपनी निजता और सत्य पर पूर्ण भरोसा है। मैं सम्पूर्ण जीवन में अपने सत्य से नहीं डिगी। मैंने अपने विषय में वही जाना और माना, जो मैं हूँ। न कभी कोई भ्रम बनाया और न कभी अहंकार। कभी बनावटी जीवन नहीं जिया और न ही कथनी-करनी में अन्तर रखा।मेरा यह सत्य, अनंत ऊर्जा को समेटे है और यही ऊर्जा गंगा को उल्टा प्रवाहित कर सकती है। कहानी कहती है कि विंदुमति ने नेत्र बंद किए और कुछ क्षणों के लिए गंगा उल्टी बहने लगी। सम्राट अशोक नतमस्तक हो गया। पूछा, देवी मुझे ज्ञात ही नहीं था तुम्हारी शक्तियों के बारे में। जिस सत्य से तुमने गंगा के प्रवाह को उलट दिया उस सत्य के विषय में विस्तार से बताओ। बिंदुमति ने कहा राजन, वेश्या होना मेरी जीविका है- नियति है। मैं समग्र रूप से वेश्या हूँ और कभी मैंने कुछ और बनना चाहा ही नहीं और न कभी अपने धर्म से डिगी।

अशोक ने पूछा तुम्हारा धर्म क्या है? मैं तो समझता था कि तुम्हारा तो कोई धर्म ही नहीं होता है। विंदुमति ने कहा मेरे गुरु ने कहा था कि जीवन में एक सूत्र को कभी मत छोड़ना।

समभाव – सम दृष्टि – सम व्यवहार।

गरीब-अमीर, कमजोर-बलशाली, रोगी-निरोगी सबको समान भाव से देखना। न किसी से प्रेम करना और न किसी से घृणा। न किसी के पैर छूना और न किसी का तिरष्कार। मैंने पूर्ण सत्य निष्ठा से अपना जीवन जिया है। किसी से कोई लगाव, घृणा, प्रेम, आसक्ति नहीं रखी। यही मेरा समत्व है, यही मेरा सत्य और मेरे मोक्ष का मार्ग भी। कितना अडिग विश्वास अपने सत्य पर-अपने धर्म ज्ञान पर था विंदुमति को और जिस मार्ग पर चल रही थी, उसी को ही मोक्ष का मार्ग मान लिया। ऐसा अद्भुत विश्वास और निष्ठा कि यह भी विचार नहीं किया कि कौन विश्वास करेगा कि उसका मार्ग मोक्ष की प्राप्ति करा देगा।।

विचार करें कि कहाँ छोड़ा विंदुमति ने अपना धर्म, कहाँ भटकी अपने मार्ग से? अपने मार्ग पर पूर्ण निष्ठा और विश्वास से चली और किसी अन्य कामना अथवा भाव को भी तो जीवन में प्रवेश नहीं करने दिया। बुद्धिमत्ता-अभय -संयम और न्याय जैसे मानवीय गुण तो बिंदुमति के चरित्र में पूर्णत: द्रष्टव्य हैं ही और इन्हीं गुणों ने बिंदुमति को विशिष्ट बना दिया।

स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है कि “स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:”।

यदि जीवन में संतुष्टि और आनंद की की कामना है तो, आत्म अवलोकन और आत्म चिन्तन करना होगा। कोरोना आदि ज्वर से भयभीत हो उन ज्वर की भी खोज करो जो तुम्हारे ही अंदर छुपे हुए हैं। जो यह क्रोध-लोभ-लिप्सा-काम के ज्वर, निरन्तर तुमको तपा रहे हैं, इनका भी निदान करना आवश्यक है। ध्यान से देखोगे तो ये जो कोरोना आदि ज्वर हैं , इनकी भी उत्पत्ति , जो मनुष्य के अंदर भरे हुए क्रोध- लोभ-लिप्सा-काम के ज्वर हैं, उन्हीं से हो रही है। स्पैनिश फ़्लू , कोरोना आदि महामारियों का सतही निदान और चिकित्सा से इनका अंत नहीं होगा। जब तक इन ज्वर के उत्पत्ति के कारणों क्रोध- लोभ- लिप्सा-काम का मूलाच्छेदन नहीं करोगे, तब तक बाह्य ज्वर और महामारी तो रूप बदल कर पुनः पुनः आते ही रहेंगे।

यदि प्रकृति और मानवता की सेवा के लिए सजग हो तो विगतज्वर: होना ही पड़ेगा। किसी महापुरुष ने कहा है कि ज़िंदगी में बहुत शोरगुल और दिखावा ही बचा है।जीवन का सिनेमा चालू है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक वही शोरगुल, वही बखान और घोषणाएँ कि जैसे अब कुछ बड़ा होने जा रहा है- अब कुछ बड़ा होगा। बड़ी लम्बी कहानी है, परंतु बिना किसी निष्कर्ष- बिना किसी निष्पत्ति के। एक दिन खबर मिलेगी कि फ़लाँ आदमी मर गया और कहानी हमेशा की तरह बीच में ही टूट जाती है। अंतःकरण में छिपे शत्रुओं को पहचानना भी तो नहीं चाहते। कोई व्यंग से भी पूछ ले कि हाथ में प्लास्टर कैसे लगा? हितैषी समझोगे और प्रेम से बता दोगे। यदि कोई प्रेम से पूछ ले भैया इतने क्रोधी और लोभी कैसे हो? सत्य पूछ रहा है परंतु मरने मारने पर उतर आओगे। यही भ्रम है, यह तो अंत: ज्वर हैं, इनको तो अपनी पूँजी मान बैठे हो। यदि जीवन में आनंद को प्राप्त करना है तो आंतरिक ज्वर से मुक्त होना ही होगा। यह जो आनंद है वह बंधन में नहीं है अपितु जैसे नदी में में बाढ़ आ जाए, तो किनारों को तोड़ कर बहती है। ऐसे ही यह जो आनंद है वह तुमको तो अभिभूत करेगा ही, तुम्हारे चारों ओर अन्य को भी आनंदित करेगा।

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– कप‍िल शर्मा,
सच‍िव श्रीकृष्ण जन्मस्थान,
मथुरा

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