संस्कृति विश्वविद्यालय के छात्रों ने कृषि पैदावार बढ़ाने पर की मंत्रणा

मथुरा। संस्कृति विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने गत दिवस कृषि विशेषज्ञों से कृषि पैदावार बढ़ाने, उन्नत कृषि तकनीक और पशुधन आदि पर विस्तार से जानकारी हासिल की। छात्र-छात्राओं ने अपने इस शैक्षणिक भ्रमण को मील का पत्थर निरूपित करते हुए बताया कि कृषि उन्नति मेले में उन्होंने जो कुछ देखा और समझा वह अपने आपमें एक अलग अनुभव है।

संस्कृति विश्वविद्यालय के कृषि संकाय के डीन प्रो. अरविन्द राजपुरोहित के मार्गदर्शन तथा गौरव कुमार और संजय सिंह के नेतृत्व में छात्र-छात्राओं ने कृषि उन्नति मेले के विभिन्न स्टालों को देखने के साथ ही समृद्ध खेती भूमि की अवस्था और उपलब्ध उपकरणों पर अपनी जिज्ञासा शांत की। छात्र-छात्राओं ने विशेषज्ञों से बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण, रसायन और सिंचाई तंत्र की संतुलित एवं आधुनिक विधियों के बारे में भी जानकारी हासिल की। छात्र आलोक प्रकाश का कहना है कि नेटाफेम एरीगेशन इंडिया लिमिटेड के नरेन्द्र कुमार ने उन्नत कृषि तकनीक और सिंचाई के बारे में बताया।

उन्होंने कहा कि अच्छी पैदावार के लिए यह महत्वपूर्ण है कि बीज उन्नत किस्म का हो और उसे पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां मिलें। उन्होंने सलाह दी कि फसलों, फलों और सब्जियों के उत्पादन में प्रमाणित उत्तम बीजों का उपयोग करना चाहिए जिनमें अधिक पैदावार देने की क्षमता, सिंचित एवं सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पनपने की प्रवृत्ति और रोगों के प्रतिरोधन की गुणवत्ता हो।
छात्रा अलीशा विवियन पाल ने बताया कि कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि हरित क्रांति के बाद रासायनिक खादों के अधिकाधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरकता धीरे-धीरे कम हो रही है जिससे उत्पादन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। किसानों को जैविक खाद की तरफ रुझान करना चाहिए। जैव उर्वरक जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट या केंचुआ खाद आदि का प्रयोग भूमि के लिए लाभदायक है। जैव उर्वरक कम लागत के आदान हैं व तुलनात्मक रूप से इनसे अधिक लाभ प्राप्त होता है।

जान्हवी वाजपेई का कहना है कि विशेषज्ञ नरेन्द्र कुमार ने बताया कि उन्नत सिंचाई साधनों के इस्तेमाल से किसान समय, श्रम व पानी की बचत कर सकते हैं। इससे पौधों का विकास भी बेहतर होता है। कतार सिंचाई (अलटरनेट), फुहार सिंचाई (स्प्रिंकलर), टपक सिंचाई (ड्रिप) आदि सिंचाई विधियां काफी लाभदायक हैं। यद्यपि टपक एवं फुहार सिंचाई तकनीक महंगी है परन्तु फलों एवं सब्जियों के लिए यह उपयुक्त है क्योंकि इनमें उपज के दाम बेहतर मिलते हैं।

जागृति सार्वा, छात्रा माद्री बताती हैं कि उन्होंने समेकित नाशीजीव प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) पर जानकारी हासिल की। यह पौध संरक्षण की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें जैविक, यांत्रिक और रासायनिक पद्धतियों से कीटों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। इसमें कीटों का सम्पूर्ण उन्मूलन करने का प्रयास नहीं किया जाता अपितु उन्हें इस स्तर पर रखा जाता है कि वे नुकसान के न्यूनतम स्तर को पार न कर पायें। इस प्रणाली से कृषि पर खर्च भी कम होता है और पर्यावरण भी तुलनात्मक रूप से सुरक्षित रहता है।

छात्र रामेश्वर उपाध्याय बताते हैं कि उन्होंने कृषि उत्पादन के साथ-साथ पशु पालन, मछली पालन, वानिकी, रेशम उत्पादन इत्यादि के बारे में जानकारी हासिल की। छात्रा विनीता कौशिक बताती हैं कि राष्ट्रीय बीज निगम, नई दिल्ली के अनुपुर मित्तल ने बताया कि संकर बीज से हम अपनी कृषि उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं।

छात्रा मानसी खण्डेलवाल ने बताया कि नेशनल हार्टीकल्चर बोर्ड के विशेषज्ञों ने आम और अमरूद की ग्राफ्टिंग तकनीक से अवगत कराया। उनका कहना है कि ग्राफ्टिंग तकनीक से हम कम से कम समय में फूल और फलों की उपज प्राप्त कर सकते हैं। इस कृषि  तकनीक के माध्यम से जो फल हमें प्राप्त होते हैं उनमें बीज कम होते हैं।