रानी लक्ष्मी बाई का तिथि अनुसार बलिदान दिवस आज

रानी लक्ष्मी बाई का तिथि अनुसार बलिदान दिवस इस वर्ष 17 जून 2021 को है। 1857 के स्वाधीनता संग्राम के कालखंड में झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई ऐसी अनुपम महिला थी जिसका जीवनी, आचरण व कौशल संपूर्ण समाज की प्रेरणा का स्रोत है। प्रतिभा, पुरुषार्थ व प्रखर राष्ट्रभक्ति में वह अद्वितीय उदाहरण हैं।

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे व माँ का नाम भागीरथी था। बचपन में इस बालिका का नाम मणीकर्णिका रखा गया था। परन्तु स्नेह से लोग इन्हें मनुबाई कहकर पुकारते थे। चार वर्ष की अवस्था में रानी लक्ष्मी बाई की माँ का निधन हो गया। पिता पर ही उनके लालन-पोषण का भार आ गया, उसी कालखंड में मोरोपंत ताम्बे अपने परिवार को लेकर काशी पहुंच गये तथा बाजीराव के आश्रय में रहने लगे।

वहाँ उन्हें छबीली कहकर पुकारा जाने लगा, बचपन से ही रानी लक्ष्मी बाई का नाना साहब पेशवा के साथ अत्यंत आत्मीयता पूर्ण व पवित्रतायुक्त सम्बन्ध था।

वहीं से तात्या टोपे के साथ उनका सम्पर्क बन गया। नाना साहब के साथ-साथ रानी लक्ष्मी बाई के पराक्रम का परीक्षण प्रारम्भ हो गया था। वे दोनों घोड़े पर चढ़कर अभ्यास करते थे एवं शस्त्र चलाना सीखते थे। रानी लक्ष्मी बाई का अभ्यास इतना उत्तम था कि उसका कौशल नाना साहब से अच्छा होने लगा। जैसे-जैसे आयु बढ़ने लगी, पिता के मन में रानी लक्ष्मी बाई का विवाह करने का विचार आया।

उन दिनों विवाह अल्पायु में हुआ करते थे वर्ष 1842 में रानी लक्ष्मी बाई का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ सम्पन्न हो गया। उसी समय वह झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई कहलाने लगी. दरबार में वह जनप्रिय हो गईं ।
झांसी की रानी की जीवनी

रानी लक्ष्मी बाई के जीवन में समाज हित के भाव के कारण जन-जन में उनके प्रति भक्ति पनप उठी। अत: उनको भी अस्त्र – शस्त्र चलाने का अभ्यास करवाया जाने लगा। कुछ दिनों के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, परन्तु शैशव में ही उसकी मृत्यु हो गई ।

इसके परिणामस्वरूप महाराजा गंगाधर के मन में असीम वेदना पैदा हो गई । इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वे भी 21 नवम्बर 1853 को दिवंगत हो गए।

गंगाधर के आकस्मिक निधन के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने एक बच्चे दामोदर को गोद ले लिया। पति के दिवंगत होने के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने राज्य के शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। अपने आभूषण उतारकर पुरुष वेश में लक्ष्मीबाई ने दरबार में जाना शुरू किया। कभी-कभी नगर के विभिन्न क्षेत्र में जाकर प्रजा के कष्टों व समाज की समस्याओं की पूरी जानकारी प्राप्त करके उनका निदान करती थी।

इस घटना के उपरांत अंग्रेजी शासकों ने षड्यंत्रपूर्वक रानी लक्ष्मी बाई का न तो झाँसी का आधिपत्य स्वीकार किया और ना ही उनके दत्तक पुत्र दामोदर को उनकी सन्तान के रूप में स्वीकार किया।

भारतीय परम्परा के अनुसार दामोदर ही भावी राजा था परन्तु उनकी आयु बहुत कम होने के कारण उसकी माँ रानी लक्ष्मी बाई ही सत्ता का दायित्व सम्भाल रही थी। अंग्रेजी शासकों ने इसी श्रेणी के उन अनेक लोगों की मान्यता स्वीकार की थी जो अंग्रेजी सत्ता के सहयोगी और समर्थक थे परन्तु रानी लक्ष्मी बाई और नाना साहब पेशवा के साथ यह व्यवहार नही किया था।

अंग्रेजो का यह व्यवहार रानी को बहुत बुरा लगा। अंग्रेजी शासकों की सूचना व निर्देश पाकर रानी लक्ष्मी बाई बोल उठी ” क्या मै झाँसी छोड़ दूँगी, जिनमे साहस हो वो आगे आए” उन्होंने अंग्रेजो को ललकारा।

झाँसी का अधिकार छिनना
16 मार्च 1854 को अंग्रेजो ने रानी का राज्य हडप लिया. रानी लक्ष्मी बाई के मन में अंग्रेजो के प्रति घोर असंतोष और घृणा पनप गई । तात्या टोपे ने आकर उन्हें स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने का सुझाव दिया।

उन्होंने क्रांति का दायित्व सम्भाल लिया। अंग्रेजो को मार भगाया और अपने राज्य झाँसी पर पुन: सत्ता स्थापित कर ली। क्रांतिकारियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजो को इतना प्रभावित किया कि सागर, नौगाँव, बांद्रा, बंदपुर, शाहगढ़ तथा कर्वी में अंग्रेजी सत्ता का कोई प्रभाव नही बचा था।
रानी की सर्वत्र जय-जयकार हो रही थी, विध्यांचल से यमुना तक के क्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त हो चुके थे। हिन्दू, मुसलमान, सैनिक, पुलिस, राजा, किसान व बहुत सी महिलाएँ व निर्धन लोग संघर्षरत थे, सभी का लक्ष्य था स्वाधीनता।
1858 के प्रारम्भ में अंग्रेजो ने हिमालय की समस्त भूमि को क्रांतिकारियों से छीनकर अपने सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई। अंग्रेजो की ओर से यमुना व विंध्याचल तक के क्षेत्र को क्रांतिकारियों से मुक्त करवाने का दायित्व सर ह्यूरोज को सौंपा गया, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित तथा वह बहुत सी तोपों के साथ निकल पड़ा। उसकी सहायता के लिए हैदराबाद, भोपाल व कई अन्य राज्यों के सैनिक मिल गये। सर ह्यूरोज महू से चलकर झाँसी होते हुए कालपी पहुचने का निश्चय कर चुका था। उसने 6 जनवरी 1858 को रायगढ़ के दुर्ग पर कब्जा कर लिया ।
क्रांतिकारियों द्वारा बंदियों को मुक्त कर दिया। उसके बाद वह 10 मार्च को दानपुर पंहुचा और चंदेरी के सुप्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर लिया, वह आगे बढ़ता गया। उसने 20 मार्च को झाँसी से चौदह मील दूर पड़ाव ड़ाल दिया।
झाँसी के पास शत्रु की सेना के आगमन का समाचार पाते ही रानी लक्ष्मी बाई अत्यंत आक्रोशित हो उठी। रानी लक्ष्मी बाई ने प्रबल संघर्ष की ठान ली।

रानी लक्ष्मीबाई युद्ध
रानी लक्ष्मी बाई के साथ बानपुर के राजा मर्दानसिंह, शाहगढ़ के नेता बहादुर ठाकुर बुन्देलखण्ड के सरदार भी कुद्ध हो उठे। सभी ने निर्णय लिया कि देश के सम्मान के लिए अंग्रेजो से युद्ध किया जाए। कठिनाई केवल यह थी, कि सैनिको में वीरता तो थी परन्तु कुछ लोग ऐसे थे जिनमे कौशल और अनुशासन का अभाव था। रानी लक्ष्मी बाई ने तोपों की व्यवस्था की, उनके कुशल संचालक जुटाए । महिलाओं ने हथियार लिए तो पुरुषों ने तोपे उठाई ।
25 मार्च को युद्ध प्रारम्भ हो गया। पहरेदारों द्वारा गोलियाँ दागी जाने लगी। तोंपे गरजने लगी। 26 मार्च को अंग्रेजों ने दक्षिणी द्वार का तोपखाना बंद करवा दिया। पश्चिमी द्वार के तोपखाने के गोलंदाज ने चारों ओर प्रहार शुरू कर दिया।
उसने अंग्रेजी तोपखाने को उड़ा दिया। अब अंग्रेजी तोपखाना बंद हो गया। पांच छ: दिन बाद फिर भयकर युद्ध हुआ। रानी लक्ष्मी बाई के तोपखाने ने अंग्रेजो को काफी नुकसान पहुंचाया।
सातवें दिन अंग्रेजों ने तोंपे चलाकर दीवार गिरा दी, परन्तु क्रांतिकारियों ने रातों-रात उन्हें पुन: खड़ा कर दिया। आठवें दिन अंग्रेजी सेना शंकर दुर्ग की ओर आगे बढ़ी। दुर्ग के भीतर गोले बरसाना शुरू कर दिया। इसमे कुछ लोग भी हताहत हुए।

क्रांतिकारियों ने पुन: पुरुषार्थ दिखाते हुए, अंग्रेजो की तोपों को फिर एक बार शांत कर दिया। रानी लक्ष्मी बाई सबकी देख-रेख कर रही थी सैनिको को प्रोत्साहन एवं दिशा निर्देश दे रही थी।

उसी के परिणामस्वरूप अंग्रेज 31 मार्च तक दुर्ग में प्रवेश न कर सके। रानी लक्ष्मी बाई का संदेश पाते ही तात्या टोपे उनकी सहायता करने झाँसी आ पहुचे। उन्होंने अपने सैनिकों के साथ अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया, अंग्रेजो तथा तात्या टोपे के मध्य भयकर युद्ध हुआ। अंग्रेजों की विशाल सेना के सामने तात्या टोपे के सैनिक डगमगा रहे थे।

रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान
वे भाग खड़े हुए, उनकी तोपें अंग्रेजों के हाथ लग गईं। तांत्या टोपे के 2200 में से 1400 सैनिक मारे गये। तांत्या टोपे की पराजय पर रानी लक्ष्मी बाई ने झाँसी के नागरिकों को निराश न होकर हौसला रखने का आव्हान करते हुए कहा कि –हम लोग दूसरों पर निर्भर ना रहें, अपने पराक्रम व वीरता का परिचय देने के काम में जुट जाएँ।

3 अप्रैल को अंग्रेजों का झाँसी पर अंतिम आक्रमण हुआ, उन्होंने मुख्य द्वार से प्रवेश किया। हर कोने से गोलियां चलने लगी। सीढ़ियाँ लगाकर अंग्रेजो ने दुर्ग पर चढ़ने के प्रयास शुरू कर दिए, परन्तु सफलता पाना इतना आसान नही था आगे बढ़ने वाले अंग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया जाता था ।

रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके वीर सैनिकों के सामने अंग्रेजों का वार नहीं चला और अंत में उन्हें पीछे हटना पड़ा। अंग्रेज सैनिक जान बचाकर भागे मुख्य द्वार पर स्थि‍ति तो यह थी परन्तु दक्षिणी द्वारा पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया था।

वे दुर्ग के भीतर घुस गये। राजप्रसाद में घुसकर उन्होंने रक्षकों की हत्या कर दी, रूपये लूटे और भवनों को ध्वस्त कर डाला। इससे झाँसी राज्य का पतन होने लगा, यह स्थि‍ति देखकर रानी लक्ष्मी बाई डेढ़ हजार सैनिक लेकर दुर्ग की ओर कूच किया और अंग्रेजों पर टूट पड़ी, अनेकों अंग्रेज मारे गये शेष जान-बचाकर नगर की ओर भागने लगे परन्तु वहां छिप-छिपकर गोलियाँ चलाने लगी। अंग्रेजों से लोहा लेते हुए झाँसी के अनेकों वीरो ने प्राण न्यौछावर कर दिए।

अंग्रेजों ने सैनिकों के साथ आम-नागरिकों पर वार करना शुरू कर दिया। जिससे झाँसी नगर में हा-हाकाकार मच गया. यह देख कर रानी लक्ष्मी बाई परेशान हो उठी। अपनी व्यथा प्रकट करते हुए अपना बलिदान करने को तैयार हो गईं परन्तु झाँसी के स्वामिभक्त सरदार ने उनसे आकर कहा ”हे महारानी! आपका यहाँ रहना खतरे से खाली नही हैं। अत: रात्रि को शत्रु सेना का घेरा तोड़कर आप बाहर निकल जाएं यह अत्यावश्यक हैं।

रानी लक्ष्मी बाई ने रात्रि को झाँसी छोड़ने का सकल्प ले लिया। चुनिंदा विश्वस्त अश्वरोहियों सैनिको के साथ रानी लक्ष्मी बाई ने पुरुष वेश धारण कर दुर्ग से प्रस्थान किया।

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने दत्तक पुत्र दामोदर को पीठ पर रेशम के कपड़े से बाधकर हाथों में शस्त्र उठाया। रानी लक्ष्मी बाई का शरीर लौह कवच से ढका हुआ था। द्वार पर खड़े अंग्रेज संतरी ने उनसे परिचय पूछा तो रानी लक्ष्मी बाई ने तपाक से उत्तर दिया ”तेहरी की सेना सर हयूरोज की सहायता के लिए जा रही हैं। संतरी उन्हें पहचान न सका।

उससे चकमा देकर रानी लक्ष्मी बाई दुर्ग से बाहर निकल गई वो कालपी के मार्ग चल पड़ी, रास्ते में बोकर नामक अंग्रेज अधिकारी मिल गया। रानी लक्ष्मी बाई ने तलवार से उसे घायल कर दिया व अश्वारोहियों ने अंग्रेज सैनिकों पर इतना घातक हमला किया कि वे भाग खड़े हुए।

दो दिन बाद वे कालपी पहुची। इसके लिए रानी लक्ष्मी बाई को एक सौ दो मील की यात्रा करनी पड़ी। वहां पहुच रानी लक्ष्मी बाई का घोड़ा धराशायी हो गया। उसका जीवन समाप्त होते ही एक समस्या खड़ी हो गई।

रानी लक्ष्मी बाई को उत्तम स्वामिभक्त घोड़ा चाहिए था। अंग्रेजों को रानी लक्ष्मी बाई के दुर्ग छोड़ जाने का आभास हो गया था। अंग्रेजी सेना ने व्हाट्लोंक के नेतृत्व में कालपी पर आक्रमण किया।

अब रानी लक्ष्मी बाई ने राव साहब, तांत्या टोपे तथा बांद्रा, शाहगढ़ व दानपुर के राजाओं के सैनिकों को साथ लेकर अंग्रेजों का सामना करते हुए मुहतोड़ जवाब दिया लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि इन विविध राज्यों के सैनिकों में परस्पर समन्वय और अनुशासन का अभाव था जिसके कारण वे अंग्रेजो के सामने ज्यादा टिक नहीं सके।

रानी लक्ष्मी बाई को कालपी से ग्वालियर की ओर जाना पड़ा। क्रांतिकारियों ने ग्वालियर की जनता को भी रानी की सहायता के लिए प्रेरित किया। जनता अंग्रेजों को सामने देखकर अपनी सेना के साथ उन पर टूट पड़ी। इस प्रबल आक्रमण से अंग्रेजी सेना बौखला गई।

अनेक अंग्रेज सैनिक मौत के घाट उतार दिए गए। परिस्थति क्रांतिकारियों के पक्ष में बनती देख कमांडर स्मिथ को पीछे हटना पड़ा लेकिन संघर्ष रुका नहीं, दूसरे दिन स्मिथ ने अधिक सेना लाकर पुन: चढ़ाई कर दी। रानी लक्ष्मी बाई अपने शिविर से बाहर निकलकर पूरे साहस से लड़ रही थी।

अचानक हुए इस आक्रमण से क्रांतिकारियों के अनेक सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। सैनिक संख्या कम हो जाने के कारण रानी लक्ष्मी बाई अब समस्या में पड़ गई। अंग्रेज सेना विजयी हुई।

विजयी अंग्रेज सेना चारों ओर एकत्रित होकर घेरा डालने में जुटी थी। एक अंग्रेज सैनिक ने रानी लक्ष्मी बाई की सहायक दासी को गोली मार दी, रानी ने मुड़कर उस अंग्रेज सैनिक को गोली का निशाना बनाकर वही ढेर कर दिया। अब रानी लक्ष्मी बाई तेजी से आगे बढ़ी, परन्तु वह जिस घोड़े का प्रयोग कर रही थी, वह इतना सक्षम और कुशल नही था । आगे बढ़ने पर एक नाला आ गया। रानी लक्ष्मी बाई ने प्राण बचाने के लिए इसी घोड़े पर निर्भर थी कि घोड़ा छलांग लगाकर उस नाले को पार कर जाएं परन्तु वह प्रशिक्षित नहीं था। उसने छलांग नही लगाईं। इसका फायदा उठाकर कुछ अंग्रेज सैनिकों ने रानी लक्ष्मी बाई को घेर लिया।
सोनरेखा नामक इस नाले पर चारों ओर शत्रुओं द्वारा अकेली घिरी हुई, रानी लक्ष्मी बाई भूखी शेरनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी। तलवारों से तलवार बजने लगी, रानी लक्ष्मी बाई ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों का सामना किया परन्तु मौका पाकर एक अंग्रेज सैनिक ने पीछे से रानी लक्ष्मी बाई के मस्तक पर वार कर डाला। रानी लक्ष्मी बाई घायल हो गईं, मगर प्रहार करने वाले सैनिक को वही ढेर कर दिया।

उसी समय दूसरे अंग्रेज सैनिकों ने रानी लक्ष्मी बाई पर ताबड़तोड़ प्रहार करने शुरू कर दिए। रानी लक्ष्मी बाई गिर पड़ी। अचेत महारानी को अंग्रेजों के हाथों बंदी बनने से बचाने के लिए उनके विश्वासपात्र सेवक रामचन्द्र राव देशमुख एवं रघुनाथ सिंह ने उनको उठाकर पास में बनी बाबा गंगादास की झोपडी में पंहुचा दिया।

अंग्रेजों से नजर बचाते हुए बाबा गंगादास ने घास-फूस की चिता बनाकर अपनी झोपड़ी के पास ही दुर्गा स्वरूपा देवी का दाहसंस्कार किया। बाबा सहित सब उपस्थित क्रांतिकारियों ने चिता की भस्म से तिलक किया तथा मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम एवं योगदान को बारंबार याद किया ।

झाँसी की सिहनी माँ लक्ष्मीबाई आज ही के दिन अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई थी। स्वातंत्रय समर के यज्ञ में समिधा हो कर अपने प्राणो की आहुति देने वाली वीरांगना को उनकी पुण्यतिथि पर शत शत नमन ।

  • कु. कृतिका खत्री,
    सनातन संस्था, दिल्ली

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