रामायण-श‍िक्षा: सफलता मिलने पर कुछ देर के लिए मौन हो जाना चाहिए

रामायण के सुंदरकांड में हनुमानजी ने खोज लिया था माता सीता को और वे लौटकर आ गए थे श्रीराम के पास, तब जामवंत ने बताई थी हनुमानजी की सफलता की कथा।

रामायण में कई ऐसे प्रसंग हैं जिसमें बताया गया है कि हमें सुखी और सफल जीवन के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। श्रीरामचरित मानस के सुंदरकांड में हनुमानजी ने बताया है कि जब हमें बड़ी सफलता मिले तो हमें क्या करना चाहिए।

हनुमानजी माता सीता की खोज में पहुंचे लंका

हनुमानजी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे। रास्ते में कई बाधाएं आईं। लंका पहुंचकर लंकिनी से सामना हुआ। माता सीता को श्रीराम का संदेश दिया। रावण के सैनिकों से युद्ध हुआ। उन्हें बंदी बनाकर रावण के दरबार में ले जाया गया। इसके बाद लंका जलाकर श्रीराम के पास पहुंचना हनुमानजी की सफलता की चरम सीमा थी।

हनुमानजी चाहते तो अपने इस काम को स्वयं श्रीरामजी के सामने बयान कर सकते थे। लेकिन, हनुमानजी जो करके आए, उसकी गाथा श्रीरामजी को जामवंत ने बताई।

श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि-

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।

सहसहुं मुख न जाइ सो बरनी।।

पवनतनय के चरित्र सुहाए।

जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

जामवंत श्रीराम से कहते हैं कि हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान ने जो काम किया है, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके बाद जामवंत ने हनुमानजी के सुंदर चरित्र यानी कार्य का वर्णन श्रीराम के सामने किया।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए।

पुनि हनुमान हरषि हियं लाए।।

ये सुनने के बाद श्रीराम के मन को हनुमानजी बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमानजी को हृदय से लगा लिया। हनुमानजी को उनके आराध्य श्रीराम के हृदय में स्थान मिल जाना ही उनके प्रयासों का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

यही बात हमें भी ध्यान रखनी चाहिए। जब भी कोई बड़ी सफलता मिले तो कुछ देर के लिए मौन हो जाना चाहिए। हमारी सफलता की कथा कोई और बताएगा तो उस काम का महत्व ज्यादा बढ़ जाएगा।

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