लेह में शहीद हुए SFF के तिब्बती जवान को अंतिम विदाई देने पहुंचे राम माधव

लेह। भारत के लिए लेह में शहीद हुए तिब्बती जवान नीमा तेंजिन के अंतिम संस्कार में बीजेपी नेता राम माधव भी शामिल हुए। नीमा तेंजिन को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई गई। उनके पार्थिव शरीर पर भारत और स्वतंत्र तिब्बत का ध्वज लपेटा गया था। नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई में बीजेपी नेता राम माधव का पहुंचना चीन के लिए कड़ा संदेश है।
दरअसल, दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ऐसे में तिब्बती जवान की अंतिम विदाई में पहुंचकर बीजेपी नेता ने चीन को संदेश दिया है कि भारत को तिब्बती कमांडो की शहादत पर गर्व है। बीजेपी नेता ने अंतिम संस्कार की तस्वीरें अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट भी की थीं, हालांकि बाद में इसे डिलीट कर दिया गया।
अंतिम विदाई में लगे ‘भारत माता की जय’ के नारे
नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई के दौरान तिब्बत और भारत के झंडे नजर आए। साथ ही भारत माता की जय और तिब्बत की आजादी के नारे भी गूंजे। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के शहीद नीमा तेंजिन के अंतिम संस्कार में विकास रेजिमेंट की जय, SFF जिंदाबाद, सैल्यूट इंडियन आर्मी के नारे लगे। लोगों के हाथों में कई बैनर और पोस्टर भी थे। बैनर पर लिखा था China Lie, People Die।
लैंड माइन की चपेट में आ गए थे नीमा तेंजिन
बता दें कि नीमा तेंजिन भारत की सुपर सीक्रेट विकास रेजिमेंट के कमांडो थे जो विकास रेजिमेंट स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का हिस्सा है। यह फोर्स भारतीय सेना के आदेश पर काम करती है। 29-30 अगस्त की रात को लद्दाख के पैंगोंग लेक के दक्षिणी किनारे पर चीनी सेना की घुसपैठ को नाकाम करने के दौरान नीमा तेंजिन एक लैंड माइन की चपेट में आ गए थे।
पैंगोंग लेक के पास चीनी घुसपैठ की कोशिश
भारत सरकार ने 31 अगस्त को बताया था कि चीन पूर्वी लद्दाख इलाके के साथ पैंगोंग झील के आसपास अपनी गतिविधियां बढ़ाना चाह रहा था। पैंगोंग झील के पास चीनी सेना घुसपैठ करने के इरादे से आई थी जहां पर दोनों सेनाओं के बीच भिड़ंत हो गई। रिपोर्ट्स की मानें तो भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया। इस संघर्ष में SSF के नीमा तेंजिन शहीद हो गए।
क्या है स्पेशल फ्रंटियर फोर्स?
स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के सैनिक दलाई लामा, तिब्बत और भारत के ध्वज के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं। ये माउंटेन युद्ध विशेषज्ञ माने जाते हैं। तिब्बती जवान की शहादत से यह फोर्स भी चर्चा में आई है जिसमें अधिकतर तिब्बती रिफ्यूजियों को भर्ती किया जाता है। इनमें से हजारों ने भारत को तबसे अपना घर माना हुआ है जब वे 1959 में तिब्बत में चीन के असफल विद्रोह के दौरान दलाई लामा के साथ भागकर आए थे। कुछ भारतीय नागरिक भी इस फोर्स का हिस्सा होते हैं। यह फोर्स 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध के तुरंत बाद गठित की गई थी। इसमें कुल 3,500 जवान शामिल हैं।
-एजेंसियां

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *