मुलायम सिंह से मिलने पहुंचे राजा भैया, अटकलों का दौर शुरू

गुरुवार को लखनऊ से बड़ी खबर तब आई, जब सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव से मिलने जनसत्ता दल के प्रमुख रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया पहुंचे।
मुलाकात के बाद रघुराज ने कहा, “वह मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन के मौके पर हमेशा आते रहे हैं। उनसे आशीर्वाद लेते रहे हैं, शुभकामनाएं देते रहे हैं। इस बार वह जन्मदिन पर बाहर थे इसलिए नहीं आ सके थे। आज इसीलिए वह आए थे। इसके और कोई निहितार्थ न निकाले जाएं।” वहीं सपा से गठबंधन की गुंजाइश को लेकर पूछे गए सवाल पर राजा भैया ने कुछ नहीं कहा।
बता दें कुछ समय पहले राजा भैया ने एलान किया था कि उनकी पार्टी जनसत्ता दल ने अभी 100 सीटों को चिन्हित किया है। वहां से लड़ने की तैयारी है। हालांकि उन्होंने साथ ही ये भी कहा था कि यह संख्या अभी और बढ़ भी सकती है। सपा या किसी और दल के साथ गठबंधन को लेकर उन्होंने कहा था कि अभी उनकी किसी से भी बात नहीं हुई है।
अब रघुराज की मुलायम से इस मुलाकात को लेकर कयासबाजियों का दौर शुरू हो गया है। चर्चाएं तेज हैं कि जनसत्ता दल के सपा से गठबंधन होने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसा होगा? जवाब तो समय ही देगा। लेकिन पिछले कुछ सालों के घटनाक्रम देखें तो इशारा कुछ और ही मिलता है। दरअसल रघुराज के मुलायम परिवार से हमेशा मधुर संबंध रहे हैं। पर पिछले कुछ समय से अखिलेश से उनके संबंधों में खटास भी आई है। उनकी दूरी बन गई है।
कुंडा के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया यूपी के उन चुनिंदा नेताओं में से एक माने जाते रहे हैं, जिनके बीजेपी के साथ समाजवादी पार्टी में भी अच्छे संबंध रहे हैं। यूपी की सपा सरकारों में रघुराज मंत्री भी रहे। यही नहीं मुलायम सिंह यादव ने कई बार संकट के समय में राजा भैया का साथ भी दिया। यही कारण है कि राजा भैया हमेशा कहते रहे हैं कि यादव परिवार से उनका करीबी रिश्ता रहा है। लेकिन 2019 के एक घटनाक्रम ने अखिलेश यादव को राजा भैया से दूर कर दिया।
2019 के राज्यसभा चुनावों में राजा भैया अप्रत्यक्ष तौर पर सपा के साथ ही माने जा रहे थे। यही नहीं वोटिंग से एन पहले रघुराज से मुलाकात की एक तस्वीर अखिलेश यादव ने ट्वीट भी की थी। लेकिन इस चुनाव में सपा और बसपा के बीच गठबंधन के कारण प्रत्याशी उतारा गया था और मायावती से पुराना विरोध होने के कारण राजा भैया ने ऐन वक्त समर्थन नहीं दिया। राजा भैया के इस कदम के पीछे उनकी मायावती से पुरानी राजनीतिक रंजिश को कारण माना गया। बसपा शासनकाल में राजा भैया पर पोटा भी लगा और पिता उदय प्रताप सिंह व भाई अक्षय प्रताप सिंह पर केस दर्ज हुए। बाद में अखिलेश सरकार में ही राजा भैया पर से पोटा हटाया भी गया था।
लेकिन राज्यसभा चुनाव में राजा भैया के इस कदम से अखिलेश खासे नाराज हुए थे। यहीं से संबंधों में खटास पैदा हो गई थी। इसके बाद दोनों के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हुए। खटास इतनी बढ़ी कि अखिलेश यादव ने एक चुनावी रैली में कहा था कि क्षत्रियों के लिए एक पुरानी कहावत है कि रघुकुल रीति सदा चल आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई। उन्होंने राजा भैया का नाम तो नहीं लिया लेकिन इशारों-इशारों में कहा कि उनका वचन ही चला गया, कैसे लोग हैं? जिनका वचन ही चला गया। उन्होंने वादा किया था कि वोट देंगे, पता नहीं उनका वो वचन कहां ध्वस्त हो गया, कहां उड़ गया?
अखिलेश यादव ने कहा था कि जब उनका वचन ही नहीं रहा तो हमने भी मन बना लिया है कि वो जहां जाना चाहें जाएं, लेकिन अब समाजवादी पार्टी उनके लिए दोबारा दरवाजे नहीं खोलेगी। ये नई समाजवादी पार्टी है, उनके लिए दरवाजे बंद हो गए हैं।
अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले सभी राजनीतिक दलों और नेताओं ने अपने जनाधार और सियासी गणित को ध्यान में रखते हुए गठबंधन, दल-बदल पर काम करना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इसी रणनीति के क्रम में प्रदेश की छोटी-छोटी पार्टियों से गठबंधन की कवायद में जुटे हैं। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा से वह गठबंधन का एलान कर चुके हैं, राष्ट्रीय लोकदल से भी गठबंधन की चर्चा है, वहीं कृष्णा पटेल की अपना दल भी अब सपा के साथ खड़ी दिख रही है। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह की भी अखिलेश से कई मुलाकात हो चुकी है।
-एजेंसियां

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