प्रशांत भूषण फिर सुर्खियों में, रोहिंग्‍याओं की रिहाई के लिए याचिका दायर की

नई दिल्‍ली। प्रशांत भूषण फिर सुर्खियों में हैं। वकालत में तीन दशक से भी ज्‍यादा लंबा अनुभव रखने वाले प्रशांत भूषण का सत्‍ता और न्‍यायपालिका से लंबा संघर्ष रहा है। ताजा मामला रोहिंग्‍या शरणार्थियों को लेकर है। उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि जम्‍मू की जेल में हिरासत में रखे गए 150 से ज्‍यादा रोहिंग्‍या को रिहा किया जाए और उनका प्रत्‍यर्पण रोका जाए। प्रशांत भूषण की इस अर्जी पर सोशल मीडिया में उनका नाम ट्रेंड होने लगा है। ट्विटर पर शनिवार सुबह 11 बजे तक प्रशांत भूषण को लेकर 7,000 से ज्यादा ट्वीट किए जा चुके थे। अधिकतर में उन्‍हें भरा-बुला कहा जा रहा था।
भूषण के लिए यह कोई नई बात नहीं। वह पहले भी कई बार विवादों में रहे हैं। कभी अपनी जनहित याचिकाओं (PIL) की वजह से तो कभी अपने बयानों की वजह से। सत्‍ता के गलियारों से टकराव हो या न्‍यायपालिका पर टिप्‍पणी, प्रशांत भूषण अपने विवादित कार्यों के लिए जाने जाते हैं। एक नजर उनसे जुड़े कुछ विवादों पर।
2G घोटाले में PIL लगाई, मंत्री को देना पड़ा इस्‍तीफा
सितंबर 2010 में प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर 2G स्‍पेक्‍ट्रम के आवंटन में अनियमितताओं का आरोप लगाया। भूषण का आरोप था कि 2001 की कीमतों के आधार पर 2008 में स्‍पेक्‍ट्रम के आंवटन से सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह मामला इतना बड़ा था कि तत्‍कालीन टेलिकॉम मिनिस्‍टर ए. राजा को इस्‍तीफा देना पड़ा। यूपीए सरकार की खासी किरकिरी हुई और आखिरकार उसे 2014 में सत्‍ता से बाहर जाना पड़ा।
कोयला घोटाले में PIL लगाई, जांच करवा के ही माने
साल 2012 में भूषण ने कोयला ब्‍लॉक आवंटन रद्द करने को लेकर जनहित याचिका लगाई। उनका आरोप था कि कुछ कंपनियों को नेताओं ने अवैध रूप से फायदा पहुंचाया है। सुप्रीम कोर्ट ने PIL पर ऐक्‍शन लेते हुए 1993 से कोल ब्‍लॉक अलॉकेशन की स्‍क्रूटनी की। सुप्रीम कोर्ट ने मध्‍य प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्‍ट्र, छत्‍तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को उनकी आवंटन नीति स्‍पष्‍ट करने के लिए नोटिस जारी किया था। भूषण ने यहां तक कहा था कि मामले में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बचाने की कोशिशें हुईं।
जजों को करना पड़ा संपत्तियों का खुलासा
साल 2009 में ऐक्टिविस्‍ट सुभाष अग्रवाल की तरफ से प्रशांत भूषण ने केंद्रीय सूचना आयोग और दिल्‍ली हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ा। याचिका में मांग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सभी जज, यहां तक कि भारत के प्रधान न्‍यायाधीश भी, अपनी चल-अचल संपत्तियों का ब्‍योरा दें। भूषण का तर्क था कि जनता को जजों की संपत्तियों के बारे में जानने का हक है। इसके बाद सभी जजों को अपनी संपत्तियों की घोषणा करनी पड़ी और कोर्ट्स की वेबसाइट्स पर ब्‍योरा डालना पड़ा।
CVC की नियुक्ति को रद्द करवाने में रहे सफल
मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की याचिका पर ही केंद्रीय सतर्कता आयुक्‍त (CVC) के पद पर पीजे थॉमस की नियुक्ति रद्द कर दी थी। अदालत ने अपने फैसले में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की भूमिका पर खासे सवाल खड़े किए थे। थॉमस के खिलाफ पॉमोलिन घोटोल में चार्जशीट दाखिल हो जाने के बावजूद उन्‍हें CVC बनाया गया था।
जब आतंकवादी की फांसी रुकवाने को आधी रात हुई सुनवाई
शायद प्रशांत भूषण के करियर का सबसे विवादित केस। मेमन को 1993 बम धमाकों के लिए दोषी ठहराया गया था। तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उसकी दया याचिका रद्द कर दी। फांसी रुकवाने के लिए प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर जैसे वकीलों ने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रात के ढाई बजे अर्जेंट सुनवाई हुई। आखिरकार फांसी दी जाएगी, यही फैसला हुआ। एक आतंकवादी को फांसी से बचाने की पैरवी करने के लिए भूषण और ग्रोवर की खासी आलोचना हुई थी।
कई अहम केसेज के सूत्रधार रहे हैं प्रशांत भूषण
प्रशांत भूषण ने 1990 में भोपाल गैस त्रासदी मामले में आपराधिक जिम्‍मेदारी के पहलू को रीओपन करवाया। इससे यूनियन कार्बाइड के पूर्व चेयरमैन वारेन एंडरसन के खिलाफ केस फिर से खुल गया। उन्‍होंने तमिलनाडु के कुदनकुलम न्‍यूक्लियर प्‍लांट के खिलाफ भी याचिका लगाई थी। राडिया टेप्‍स की जांच के आदेश भी सुप्रीम कोर्ट ने भूषण की याचिका पर ही दिए थे।
गोवा में अवैध लौह अयस्‍क के खनन को लेकर भूषण की याचिका पर सरकार को कड़ी फटकार लगी थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने गोवा की सभी 90 खदानों में खनन रुकवा दिया था। भूषण की PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने 2004-2008 के बीच नागरिक उड्डयन मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। आरोप था कि विदेशी एयरक्राफ्ट निर्माताओं को फायदा पहुंचाने के लिए 70,000 करोड़ रुपये में 111 एयरक्राफ्ट्स खरीदे गए।
-एजेंसियां

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