किसानों से टकराव टालने को पीएम ने की वरिष्‍ठ मंत्रियों संग मीटिंग

नई दिल्‍ली। नए कृषि कानूनों के मुद्दे पर किसानों और केंद्र सरकार में टकराव बरकरार है। पांचवें दौर की बातचीत के लिए किसान नेता विज्ञान भवन जा रहे हैं। इससे पहले आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट के वरिष्‍ठ साथियों को आवास पर बुलाया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कृषि नरेंद्र सिंह तोमर इस मीटिंग में मौजूद रहे। रेल मंत्री पीयूष गोयल भी इसका हिस्‍सा था। मीटिंग के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, ‘शनिवार को किसानों के साथ दोपहर 2 बजे मीटिंग तय है। मुझे उम्मीद है कि किसान सकारात्मक विचार करेंगे और विरोध प्रदर्शन खत्म करेंगे।’ हालांकि किसान संगठनों के नेता दो-टूक कह रहे हैं कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने से कम कुछ भी मंजूर नहीं होगा।
सरकार को उम्‍मीद, आज निकल आएगा हल
किसान आंदोलन को विपक्ष का चौतरफा समर्थन मिलने से सरकार के लिए स्थिति विकट हो गई है। लेफ्ट दलों ने किसानों की मांगों को जायज ठहराया है। दूसरी तरफ केंद्रीय कृषि राज्‍य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि आज की मीटिंग में किसानों के संदेहों को दूर किया जाएगा। उन्‍होंने कहा, “यह विपक्ष की राजनीति है। वे प्रदर्शन को और भड़का रहे हैं।’ उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि आज दोपहर होने वाली बैठक में कोई न कोई हल निकल आएगा और किसान आंदोलन वापस ले लेंगे।
नए कृषि कानून को लेकर किसानों को हैं ये 8 डर
1- किसानों का मानना है कि कृषि बाजार और कंट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून से बड़ी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा। कृषि खरीद पर कंपनियों का नियंत्रण होगा। कृषि उत्पादों की सप्लाई और मूल्यों पर भी उनका कब्जा हो जाएगा। भंडारण, कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग और फसलों के ट्रांसपोटेशन पर भी एकाधिकार की आशंका। नए कानून से मंडी सिस्टम के खत्म हो जाएगा।
2- आवश्यक वस्तु कानून में संशोधन से जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा मिलेगा। सभी शहरी और ग्राणीण गरीबों को बड़े किसानों और निजी फूड कारपोरेशन के हाथों में छोड़ देना होगा।
3- कृषि व्यापार फर्म्स, प्रोसेसर्स, होलसेलर्स, ऐक्सपोर्टर्स और बड़े रिटेलर अपने हिसाब से बाजार को चलाने की कोशिश करेंगे। इससे किसानों को नुकसान होगा।
4- कंट्रैक्ट फार्मिंग वाले कानून से जमीन के मालिकाना हक खतरे में पड़ जाएगा। इससे कंट्रैक्ट और कंपनियों के बीच कर्ज का मकड़जाल फैलेगा। कर्ज वसूलने के लिए कंपनियों का अपना मैकनिजम होता है।
5- किसान अपने हितों की रक्षा नहीं कर पाएंगे। ‘फ्रीडम ऑफ च्वाइस’ के नाम पर बड़े कारोबारी इसका लाभ उठाएंगे।
6- इस कानून में विवादों के निपटारा के लिए SDM कोर्ट को फाइनल अथॉरिटी बनाया जा रहा है। किसानों की मांग है कि उन्हें उच्च अदालतों में अपील का अधिकार मिलना चाहिए।
7- कृषि अवशेषों के जलाने पर किसानों को सजा देने को लेकर भी किसानों में रोष है। किसानों का कहना है कि नए कानून में किसानों को बिना आर्थिक तौर पर मजबूत किए नियम बना दिए गए हैं।
8- प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) कानून के कारण किसानों को निजी बिजली कंपनियों के निर्धारित दर पर बिजली बिल देने को मजबूर होना पड़ेगा।
-एजेंसियां

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