संसदीय समिति की रिपोर्ट: वास्तविक शिक्षा नहीं है ऑनलाइन एजुकेशन

नई दिल्‍ली। संसद की एक समिति ने एक वर्ष से भी अधिक समय से स्कूलों के बंद होने के कारण छात्रों के स्वास्थ्य खासकर मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ने का जिक्र करते हुए कहा कि कोरोना नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए संतुलित व तर्कपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए स्कूल खोले जाएं।
शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने कहा है कि ऑनलाइन एजुकेशन वास्तविक शिक्षा नहीं है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऐसे दौर में कई ऐसे माता-पिता हैं जिन्‍हें डिजिटल माध्यमों की जानकारी नहीं है और कई जगहों पर सुविधाएं भी नहीं हैं, ऐसे में छात्रों को नुकसान हुआ है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन एजुकेशन में फर्क
संसदीय समिति ने सभी स्टूडेंट्स, शिक्षक और दूसरे स्टाफ के लिए टीका कार्यक्रम में तेजी लाने, दो पालियों में क्लास कराने, नियमित थर्मल जांच, प्रत्येक स्कूल में प्रशिक्षित कर्मियों सहित दो ऑक्सीजन सिलेंडर जैसी व्यवस्था करने की सिफारिश की है ताकि स्कूल जल्द से जल्द सामान्य रूप से काम करना शुरू कर सकें। लॉकडाउन के कारण पैदा हालात के बीच समस्याओं को कम करने ऑनलाइन और ऑफलाइन एजुकेशन, परीक्षाओं की समीक्षा और स्कूलों को फिर से खोलने के विषय पर शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल संबंधी संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। यह रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एक वर्ष से भी अधिक समय से स्कूलों के बंद रहने के कारण छात्रों के स्वास्थ्य विशेष रूप से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसमें कहा गया है स्कूलों को न खोलने के खतरे इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। छोटे बच्चों के घर की चाहरदीवारी के अंदर बंद रहने, स्कूल नहीं जा पाने के कारण अभिभावकों और बच्चों के बीच का रिश्ता प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।
ग्रामीण इलाकों के बच्चों पर बुरा असर, ऐसे खोलें स्कूल
एक साल के भीतर छात्रों के मूलभूत ज्ञान को विशेष रूप से स्कूल स्तर पर गणित, विज्ञान और भाषाओं के विषयों में कमजोर कर दिया है। समाज के कमजोर वर्गों जैसे गरीब और ग्रामीण छात्रों पर इसका ज्यादा असर हुआ है क्योंकि वो इस महामारी के वक्त डिजिटल शिक्षा से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाए। प्लान टू ब्रिज द लर्निंग गैप … एंड प्लान्स फॉर री-ओपनिंग ऑफ स्कूल्स’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में सभी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों, वैकल्पिक दिनों में फिजिकल क्लास और वैक्सीनेशन पर जोर दिया गया है।
अपनी रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डालते हुए कि 32 करोड़ बच्चों की पढ़ाई महामारी से प्रभावित हुई है, समिति ने यह भी देखा कि अधिकांश ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में डिजिटल सुविधाओं की कमी है जिसके कारण एक बड़ा डिजिटल विभाजन हुआ है। इसमें कहा गया है कि हालांकि शिक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि लगभग 85% छात्र ऑनलाइन कक्षाओं से जुड़े थे और शेष छात्रों से अन्य तरीकों से संपर्क किया जा रहा था, जमीनी वास्तविकता पूरी तरह से अलग है।
-एजेंसियां

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