जब हम खाली होते हैं, तभी जीवन की सुंदरता जान पाते हैं

आप जो चीज़ें इकट्ठी करते हैं, वे चीज़ें जीवन नहीं है। उन्हें इकठ्ठा कर के आप अपने जीवन में पूर्ण होने का प्रयत्न कर रहे हैं। चीज़ें हासिल कर के, इकठ्ठा कर के आप जीवन में पूर्णता पाना चाहते हैं। आप किसी तरह ये सुनिश्चित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि आप का जीवन खाली न रहे। लेकिन आप के जीवन में सुन्दर क्षण तभी आये हैं, जब आप खाली थे। केवल खाली क्षणों में ही आप ने जाना है कि प्रेम, आनंद और शांति क्या है? लेकिन तर्क की दृष्टि से, मानसिक रूप से आप ये सोचते हैं कि आप खालीपन बिलकुल ही नहीं चाहते !

अधिकतर समय, मेरे मन में कोई भी विचार नहीं होता, मैं बस खाली रहता हूँ। जो कार्य, गतिविधि मैं कर रहा हूँ, उसमें जितना ज़रूरी है, उससे ज्यादा शायद ही कभी कुछ मैं बोलता हूं। मेरा मन इतना ज्यादा खाली होता है कि कुछ भी विचार करने के लिये या बोलने के लिये मुझे प्रयत्न करने पड़ते हैं। मैं, अगर, बस बैठ जाऊं तो मेरे पास न कोई विचार होता है न बोलने के लिये शब्द। मैं पूर्णतः खाली होता हूँ।

बिलकुल खाली होने से पूरा अस्तित्व आपके अन्दर समा जाएगा

अगर आप पूर्णतः खाली हों तो आप देखेंगे कि सारा अस्तित्व आप में समा जाता है। अगर आप के पास कुछ योजनायें, विचार हैं तो कहीं, कहीं कुछ विचार अस्तित्व के साथ तालमेल में आ जाएंगे, लेकिन अगर आप में ऐसा कुछ नहीं है जिसे आप अपना कह सकें, अगर आप बस एक खाली स्थान हैं तो सारा अस्तित्व एकदम सही ढंग से आपका हिस्सा बन जाता है।

अगर आप बिलकुल ही, पूर्णतः खाली हो जाते हैं, तो आप कोई भी चीज़ इसलिए इकठ्ठा नहीं करेंगे, क्योंकि आप बस इकठ्ठा करना चाहते हैं। आप के पास जो भी है उसका आप पूरा, पूरा आनंद लेंगे और यदि वो सब नहीं है तो उसके न होने का भी आनंद लेंगे।

मानव की इकठ्ठा करने की आदत

उस समय से, जब मानव गुफाओं में रहता था, लोग सामान इकठ्ठा कर रहे हैं। आप बच्चे थे तो चमकदार पत्थरों के टुकड़े एकत्रित करते थे। तब से अब तक कुछ नहीं बदला है। बात बस इतनी है कि पत्थर अब ज्यादा महंगे हो गये हैं। एक बच्चे के तौर पर आप उन्हें नदियों या समुद्र तट से लाते थे। अब आप को बड़ी रकम खर्च कर के खरीदना पड़ता है। लेकिन कुछ भी बदला नहीं है, अब अभी भी इकठ्ठा करने में ही लगे हुए हैं।

लोग इतनी ज्यादा मात्रा में ये सब सजावटें इकट्ठी कर लेते हैं, और उनसे बंधकर उनके आधार पर अपनी पहचान बना लेते हैं, कि वे उस जीवन का कभी अनुभव नहीं कर पाते जो वे स्वयं हैं।

आप जो कुछ भी इकठ्ठा करते हैं — रिश्ते, नाते, परिवार, संपत्ति, ज़मीन – जायदाद, ज्ञान, विचार और वो सब कुछ जो आप के पास है — ये सब जीवन सजाने के लिये अतिरिक्त सजावटें हैं। लोग इतनी ज्यादा मात्रा में ये सब सजावटें इकट्ठी कर लेते हैं, और उनसे बंधकर उनके आधार पर अपनी पहचान बना लेते हैं, कि वे उस जीवन का कभी अनुभव नहीं कर पाते जो वे स्वयं हैं।

Source: Sadguru Jaggi vasudev

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