अब नगर निगम करा रहा है गंगा किनारे दबे शवों का अंतिम संस्‍कार

प्रयागराज में गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ ही पिछले दिनों रेत में दबाए गए शव बाहर दिखने लगे हैं.
नगर निगम के अधिकारी इन लावारिस शवों का हिंदू रीति-रिवाज के साथ दाह संस्कार कर रहे हैं. अब तक 150 से भी ज़्यादा शवों का दाह संस्कार किया जा चुका है.
नगर निगम के ज़ोनल अधिकारी नीरज सिंह कहते हैं, “गंगा किनारे काफी शव दफ़न कर दिए गए थे. जलस्तर बढ़ने पर बहुत ज़्यादा कटान हुआ इसलिए ये शव बाहर आ गए. बीस दिनों के अंतराल में हमने 155 शवों का अंतिम संस्कार कराया है.”
नीरज सिंह बताते हैं कि दफ़न किए गए शवों को ख़ुद बाहर नहीं निकाला गया, बल्कि कटान की वजह से जो शव बाहर आ गए थे, उन्हीं का दाह संस्कार कराया गया है.
वो बताते हैं, “हमने उन शवों का संस्कार किया जो पूरा दिख जाता था. इसके लिए हम लोगों को घंटों इंतज़ार भी करना पड़ा. हमने सावधानी बरती. हमारी जानकारी में कोई शव बहने नहीं पाया. शव या तो ज़मीन में दफ़न हैं या फिर उन्हें हमने बाहर निकाल कर उनका अंतिम संस्कार कराया.”
इस साल अप्रैल-मई के बीच में कोरोना की वजह से काफी मौतें हुईं. ग्रामीण इलाक़ों में भी कोरोना जैसे लक्षणों की वजह से मौतें हुईं. चूंकि इनका परीक्षण नहीं हुआ था, इसलिए यह पता भी नहीं चल सका कि इनकी मौत की वजह कोविड संक्रमण थी या फिर कुछ और.
प्रयागराज और आस-पास के ग्रामीण इलाक़ों में हुई इन मौतों की वजह से लोगों ने श्रृंगवेरपुर, फाफामऊ, छतनाग जैसी जगहों पर शवों को गंगा किनारे दफ़ना दिया था.
प्रयागराज में श्रृंगवेरपुर और फाफामऊ में गंगा नदी में जलस्तर बढ़ने से कछारी इलाक़ा डूबने लगा है जिसकी वजह से दफ़न किए गए शवों के ऊपर से पानी बहने लगा.
नगर निगम के अधिकारियों के मुताबिक़ पहले तो हर दिन चार या पाँच शव ही मिल रहे थे लेकिन बाद में एक-एक दिन में 30 से भी ज़्यादा शवों का दाह संस्कार कराना पड़ा. हालांकि दो दिन से शवों की संख्या फिर कम हो गई है.
उनके मुताबिक़ “हम हर एक शव की अलग-अलग चिता सजा रहे हैं. प्रत्येक शव को देसी घी का अर्पण होता है, चंदन का अर्पण होता है और कपूर से उनको मुखाग्नि दी जा रही है.”
नीरज सिंह बताते हैं कि एक शव के अंतिम संस्कार पर क़रीब चार हज़ार रुपये का ख़र्च आता है.
पर्यावरणविद और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर एनबी सिंह कहते हैं, “यह तो होना ही था. डेड बॉडी को डिकंपोज़ (नष्ट) होने में यानी उन्हें गलने में एक साल का समय लगता है. यहां डेड बॉडी के साथ कफ़न और ऐसी तमाम चीज़ें भी हैं. बरसात में ये सब चीज़ें इसी पानी में सड़ेंगी और इन सबका असर पर्यावरण पर होगा.”
प्रयागराज नगर निगम की मेयर अभिलाषा गुप्‍ता नंदी कहती हैं कि गंगा किनारे जहां भी शव दिख रहे हैं, नगर निगम की ओर से उनका अंतिम संस्कार कराया जा रहा है.
अभिलाषा गुप्ता कहती हैं, “मिट्टी में शव जल्दी डिकम्‍पोज़ हो जाते हैं, लेकिन रेत में नहीं हो पाते. कोरोना काल में बड़ी संख्या में लोग शवों को यहां दफ़ना गए. लेकिन उसके बाद हमें जो भी लावारिस शव दिखा, हम उसका अंतिम संस्‍कार करा रहे हैं.”
अप्रैल और मई के महीने में गंगा किनारे बड़ी संख्या में शवों के दफ़नाने को लेकर काफ़ी हंगामा हुआ था.
-एजेंसियां

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