सिर्फ अंबानी-अडाणी नहीं, 100 यूनिकॉर्न भारत को ले जा रहे हैं आगे: क्रेडिट सुईस

नई दिल्‍ली। क्रेडिट सुईस के नीलकंठ मिश्रा के एक रिसर्च पेपर से ये बात साफ हुई है कि भारत की अर्थव्यवस्था को एक-दो नहीं, बल्कि 100 यूनिकॉर्न कंपनियां मिलकर खींच रही हैं। इन यूनिकॉर्न कंपनियों ने ग्लोबल इनवेस्टर्स से पैसों का इंतजाम किया है और नए आइडिया के साथ बाजार में आए हैं, जो 21वीं सदी में अपना लोहा मनवाने का दम रखते हैं।
दरअसल, विपक्षी पार्टियों सहित कुछ लेफ्टिस्ट पत्रकारों के दावों पर बहुत से लोग यह भरोसा करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ दो कारोबारी चला रहे हैं, जिनकी पीएम मोदी से बहुत करीबी है।
क्रेडिट सुईस के नीलकंठ मिश्रा के एक रिसर्च पेपर से ये बात साफ हुई है कि भारत की अर्थव्यवस्था को एक-दो नहीं, बल्कि 100 यूनिकॉर्न कंपनियां मिलकर खींच रही हैं। ये कंपनियां जो नई हैं, मार्केट में लिस्ट भी नहीं हैं और इनकी वैल्यू भी अरबों डॉलर में है।
इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है कि इतनी बड़ी संख्या में नए बिजनेस शुरू हुए हों, जिनके पास पहले से ना तो दौलत है, ना ही राजनीतिक संबंध और ना ही उन्होंने पब्लिक सेक्टर बैंकों के साथ जुगाड़ लगाकर कोई डील की है। इन यूनिकॉर्न कंपनियों ने ग्लोबल इनवेस्टर्स से पैसों का इंतजाम किया है और नए आइडिया के साथ बाजार में आए हैं, जो 21वीं सदी में अपना लोहा मनवाने का दम रखते हैं। निवेशक ये जानते हैं कि बहुत से यूनिकॉर्न फेल हो जाएंगे लेकिन उन्हें ये भी पता है कि पर्याप्त मात्रा में ये यूनिकॉर्न कंपनियां सफलता की सीढ़ी चढ़ जाएंगी।
पहले वित्तीय जानकारों ने अनुमान लगाया था कि देश में करीब 30-50 यूनिकॉर्न हैं, लेकिन क्रेडिट सुईस की रिपोर्ट में कई पैमानों के आधार पर इनकी संख्या करीब 100 बताई गई है। क्रेडिट सुईस ने उन कंपनियों को भी इसमें नहीं रखा है, जो किसी कंपनी की सब्सिडियरी कंपनी हैं और एक बार ऊपर चढ़कर वापस गिर गई हैं। कुछ यूनिकॉर्न तो फेमस हैं, जैसे सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन प्रोड्यूसर है। फ्लिपकार्ट ने अपना बिजनेस 16 अरब डॉलर में वॉलमार्ट को बेचा लेकिन कुछ के नाम तो लोगों को पता भी नहीं हैं जैसे वंडर सीमेंट, जीआरटी ज्वैलर्स, ग्रीनको, डिजिट या चार्जबी।
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इनमें से करीब दो तिहाई यूनिकॉर्न तो 2005 के बाद शुरू हुए हैं। इनमें आईटी, ई-कॉमर्स, सॉफ्टवेयर, गेमिंग, मॉडर्न ट्रेड, बायो टेक, फार्मास्युटिकल्स और कंज्यूमर गुड्स कंपनियां शामिल हैं। यूनिकॉर्न तो 80 हजार से भी अधिक स्टार्टअप के पिरामिड की टिप भर हैं। अब ओला कैब को ही ले लीजिए जो ट्रांसपोर्ट का बहुत ही शानदार जरिया है और वह अब दुनिया की सबसे बड़ी 1 करोड़ इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर फैक्ट्री लगाने जा रहा है। वह फेल हो सकता है, लेकिन जरा देखिए कि उसका सपना कितना बड़ा है।
भारत में सेबी के नियम बहुत ही पुराने और बेकार हो चुके हैं। आईपीओ के जरिए कंपनियां शेयर बाजार में लिस्ट होती हैं। इसके लिए सेबी के कई नियम हैं, जिसमें से एक ये भी है कि कंपनी ने पिछले 5 सालों में 3 साल फायदा कमाया हो। ऐमजॉन और फेसबुक कोई फायदा नहीं कमा पा रही हैं लेकिन अपनी क्षमता की वजह से वह लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे ही बहुत सारे यूनिकॉर्न हैं, जिन्होंने कभी फायदा नहीं कमाया और इस वजह से वह सेबी के नियमों के अनुसार शेयर बाजार में लिस्ट नहीं हो सकते हैं। सेबी सिर्फ भारतीय निवेशकों को धोखेबाजों से बचाने पर ध्यान देती है, ना कि यूनिकॉर्न को प्रोत्साहन देने या बढ़ाने पर। अगर भारत सिर्फ स्थानीय पैसों और सेबी पर निर्भर रहता तो 100 यूनिकॉर्न नहीं मिलते। विदेशी निवेशकों से इन यूनिकॉर्न को फंडिंग हुई, जिससे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिली।
-एजेंसियां

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