कोरोना एक सीख: स्वदेशी उत्पाद अपनाकर ही विजयपथ का मार्ग होगा प्रशस्‍त

कोरोना के क़हर ने आज सम्पूर्ण विश्व को आत्मचिन्तन को विवश कर दिया है। किसी एक देश की कुटिलता सम्पूर्ण विश्व पर जिस तरह भारी पड़ रही है, उसने विभिन्न देशों के परस्पर राजनीतिक और आर्थिक सम्बंधों की नींव को हिला कर रख दिया है। भविष्य में भी इस प्रकार के खतरों की सम्भावनाओं एवं व्यापार-व्यवहार में एक दूसरे पर निर्भरता से आसन्न खतरों से विश्व चिन्तित है।

एक विषाणु के प्रलयंकारी ताण्डव ने विभिन्न देशों के मध्य मैत्री और अन्य रिश्तों की नयी दिशा दे दी है। चिकित्सा आदि के क्षेत्र में जिन देशों के बारे में सामान्यतः उत्कृष्ट धारणा बनी थी, वह भी पूर्णतः बदल गयी है।

अमेरिका जैसी महाशक्ति सहित अन्य शक्ति-सामर्थ्यवान देश आज याचक बने कोरोना के क़हर से कंपकंपाने लगे हैं।
ऐसी भयावह स्थिति ने सम्पूर्ण मानवता के अन्दर असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर दी है। जीवन और रोज़गार को लेकर सम्पूर्ण विश्व आशंकित है। मानवता दोहरे संकट से जूझ रही है, एक तरफ कोरोना है- दूसरी तरफ़ रोज़ी रोटी पर आसन्न संकट। विशेषज्ञ तो भयंकर आर्थिक मंदी के संकट की सम्भावना अभी से जता रहे हैं। प्रत्येक समवेदनशील राष्ट्र आज अपने अस्तित्व को बचाने के हर सम्भव उपाय खोज रहा है।

यह सत्य है कि परिवार, समाज, राष्ट्र सभी परस्पर सहयोग से ही चलते हैं एवं इस परस्पर निर्भरता को पूर्णत: समाप्त भी नहीं किया जाना चाहिए परन्तु भोजन-चिकित्सा-रक्षा के क्षेत्र में तो प्रत्येक स्वाभिमानी राष्ट्र को आत्मनिर्भर होना ही चाहिए। बिना आत्मनिर्भर हुए राष्ट्र के सम्मान और देशवासियों के हित की रक्षा सम्भव नहीं है।

सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:॥

जो वस्तुएं अपने अधिकार में नहीं हैं वह सब अंतत: दु:ख ही हैं एवं जो चीज अपने अधिकार में है वही सुख दे सकती हैं।
भाव यही है कि बिना आत्म निर्भरता के कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र, कभी भी अपने गौरवमय स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता।
राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रयास मात्र से इस संकल्प की पूर्ति नहीं हो सकती। अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों की बंदिशें अथवा प्रतिबद्धता के कारण राष्ट्राध्यक्ष, कभी कभी चाहते हुए भी कठोर निर्णय नहीं ले पाते। यदि देशवासियों के हृदय में स्वाभिमान और स्वदेशी की भावना का अभ्युदय सम्पूर्णता से हो जाए तो कार्य सहज हो जाएगा एवं राष्ट्र को आत्मनिर्भर-सम्पन्न बनने से कोई रोक नहीं सकता। अभी हाल में संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा में मलेशिया ने भारत का खुला विरोध किया था, प्रत्युत्तर में भारत के स्वाभिमानी व्यापारियों ने मलेशिया से पॉम आयल का आयात स्वतः रोक दिया, हमने देखा ही इस कदम से मलेशिया की बोलती बंद हो गयी और वह भारत के साथ सम्बंध सामान्य करने के लिए निरन्तर प्रयास कर रहा है।

अमरीका के सांसदों ने माँग की है क‍ि दवाओं एवं चिकित्सा उपकरणों के लिए चीन पर निर्भरता ख़त्म की जाए, जापान ने अपनी कम्पनियों को निर्देश जारी कर दिए हैं की चीन में अपना कारोबार समेट लें, इसके लिए जापान सरकार अपनी कम्पनियों को भारी भरकम अनुदान भी दे रही है। यूरोप, दक्षिण अमेरिका सहित विश्व भर के देशों ने चीन के विकल्प खोजने शुरू कर दिए हैं।
हिंसक प्रवृति, अमानवीय आचरण, विस्तारवादी नीति एवं क्रूरता, चीन के व्यवहार में सर्वदा से ही द्रष्टव्य है। शिशुओं के दूध में हानिकारक तत्वों का मिश्रण, दवाओं में मिलावट, चिकित्सा उपकरणों का निम्नस्तर, उपकरणों का घटिया प्रदर्शन आदि से तो विश्व अवगत था ही, कोरोना जैसी विकट महामारी के समय भी घटिया चिकित्सा सामग्री की आपूर्ति से चीन के मित्र देश भी स्तब्ध और आक्रोशित हैं। इस भीषण महामारी के समय चीन द्वारा अन्य देशों की कम्पनियों को सस्ते में ख़रीद कर उन देशों की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने के लिए जारी अनैतिक प्रयासों ने चीन की नीति और रीति को पुनः विश्व के समक्ष उजागर कर दिया है। इस कुत्सित प्रयास से बचने के लिए यूरोप आदि के देश कम्पनी अधिग्रहण के अपने नियम-क़ानूनों में संशोधन कर रहे हैं।
भारत के सम्बंध में वर्तमान परिस्थितियां एवं उससे उत्पन्न चुनौतियों पर विचार करें तो यह कहा जा सकता है कि वर्तमान सशक्त नेतृत्व एवं अनन्त प्रतिभा सम्पन्न देश भारत के सामने इस विपरीत काल से निपटने की चुनौती तो है लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति-कुशल नेतृत्व एवं जनमानस के सहयोग से इस संकट से शीघ्र मुक्ति मिलेगी, इसमें सन्देह नहीं है।
यदि हम इस विपरीत काल के अनुभव से सबक़ लेकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वदेशी उत्पाद एवं ज्ञान का समावेश कर लें तो अशेष समृद्ध परंपराओं से विभूषित भारतवर्ष पुनः अपने गौरव को तो प्राप्त करेगा ही, विश्व का समर्थ-कल्याणकारी मार्गदर्शक भी बन सकेगा।
माँ भारती के यशस्वी पुत्र माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने सत्ता सम्भालते ही मेक इन इण्डिया का मंत्र दिया था। इसके सकारात्मक परिणाम और निरंतरता से विश्व चमत्कृत है। आवश्यकता है कि हम सभी अपनी ज़िम्मेदारीयों को समझकर सम्पूर्ण सामर्थ और ईमानदारी से राष्ट्रहित में स्वदेशी उत्पादनों का प्रचार, प्रसार एवं उपयोग के लिए प्रयास करें, यह आने वाले भविष्य की आवश्यकता भी है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को तो बल मिलेगा ही, रोज़गार के नए अवसरों का भी सृजन होगा।
चीन के साथ हमारे पूर्व के अनुभवों, वर्तमान में उसके अनैतिक-अमर्यादित आचरण एवं भारतवर्ष के प्रबल शत्रु राष्ट्रों एवं आतंकियों को उसके खुले समर्थन के बाद भी, चीन पर हमारी निर्भरता कूटनीतिक-सामरिक-आर्थिक-नैतिक आदि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। कम से कम अब तो चीन का तो कोई विकल्प खोजना ही चाहिए।

हमारे प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, युवाओं, स्वदेशी कम्पनियों ने बिना समय गंवाए, कोरोना से लड़ने के लिए आवश्यक सामग्रियों का निर्माण कर इस महामारी को नियंत्रित करने का जो अभिनंदनीय कार्य किया है, उससे सारा विश्व चमत्कृत है। आवश्यकता है हमारे देश की प्रतिभाओं को मात्र उचित सुविधाएँ और सम्मान देने की तो देश स्वयं आत्मनिर्भर हो जाएगा।

सौभाग्य से भारत का वर्तमान नेतृत्व समर्थ, सक्षम, मजबूत इच्छाशक्ति सम्पन्न एवं सम्पूर्ण स्वदेशी है। प्रत्यक्ष अथवा रिमोट से, किसी विदेशी ताक़त का दखल देश की रीति नीति के निर्धारण में नहीं है। सुअवसर है कि हम सभी स्वदेशी के ध्वज को स्थिरता से धारण करते हुए देश हित में अपने प्रयास सम्पूर्ण सामर्थ से करें। हम सबका एक ही लक्ष्य होना चाहिए की महान भारतवर्ष पुनः सोने की चिड़ियाँ और विश्वगुरु की उपाधि से सुशोभित हो।

Kapil-sharma-KJS-Mathura

 

– कपिल शर्मा,
सचिव,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

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