ब्रज के तीर्थस्थलों का विभाजन अतार्किक आधार पर हुआ: भाटिया

मथुरा। ब्रज के तीर्थ स्थलों के “विभाजन” पर पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने हार्दिक वेदना प्रगट करते हुए कहा कि‍
भारत की समृद्ध परम्पराओं में ऋष‍ि – मुनि, सन्त प्रवर, धार्मिक, आध्यात्मिक आचार्यगण, साहित्यकार, कवि तथा तेजस्वी पत्रकारों ने देश और समाज के उत्कर्ष हेतु मार्ग दर्शन करने के साथ अपनी आत्मिक शक्ति से भविष्‍य के लिए भी मार्गदर्शन किया है। इसी परिप्रेक्ष्य में लगभग 500 वर्ष पूर्व महाकवि सूर ने भविष्‍यवाणी की थी- ‘सूरदास अब डूबत है ब्रज! काहे न लेत उबार!!

ब्रज क्षेत्र की अनेकानेक समस्याएँ रहीं हैं। गोपाल की भूमि में अस्थिपंजर गायें दीखती हैं। दूध-दही माखन की नगरी में पैकबन्द दूध-दही मक्खन है। दूरदर्शन पर भी कभी-कभी ही राधा-कृष्‍ण के दूर-दर्शन हो पाते हैं। यमुना सदियों से प्रदूष‍ित है। न बारह वन हैं, न 24 उपवन, न अधिवन न प्रतिवन। वृन्दावन में न वृन्दा का वन है और महावन में विशाल वन तो दूर लघु वन भी नहीं है। सूर की कुटी सूनी पड़ी है, बेचारे आँधरे सूर की।

ब्रज के केन्द्र स्थल – हृदय स्थल – भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्मभूमि मथुरा पर हाल ही में एक ऐसा क्रूर प्रहार हुआ है जिसकी पृष्‍ठभूमि में न कोई सैद्धान्तिक आधार है और न तार्किक आधार। भगवान् श्रीकृष्‍ण की जन्म भूमि – राधा कृष्‍ण की लीला भूमि मथुरा आदिकालीन तीर्थ है। यह तीर्थ था, तीर्थ है और तीर्थ रहेगा। इसका विभाजन धर्म, संस्कृति, इतिहास के विरुद्ध है।
उत्तर प्रदेश में ही नहीं भारत में भी जो तीर्थस्थल हैं वे तीर्थस्थल हैं। तीर्थस्थलों की घोषणा नहीं की जाती है, घोषणा की जाती है, तीर्थस्थलों को प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की। यथा ब्रज के प्रमुख जन्माष्‍टमी – होली आदि अवसरों पर दूर – दूर से लाखों तीर्थ यात्रियों के आवागमन साधनों, दर्शनों हेतु व्यवस्थाओं, सड़क सहारे लेटने के स्थान पर आवश्‍यक प्रवास – व्यवस्थाओं, पेय – जल, जन सुविधाओं आदि की किन्तु योगी सरकार के प्रकाण्ड विद्वान अधिकारियों ने न जाने किस उद्देश्‍य से ‘तीर्थस्थल मथुरा को 22 वार्डों में सीमित – संकुचित कर दिया है। माँस – मदिरा की बिक्री रोकने का यदि उद्देश्‍य था तो वह 22 वार्डों का नहीं सम्पूर्ण ब्रज के लिए होना चाहिए था।’
माननीय मुख्यमंत्री जी ने इस सम्बन्ध में अपनी ही सरकार के दो मंत्रियों, दो विधायकों तथा सांसद महोदया से भी चर्चा करना उचित नहीं समझा और ये सभी पार्टी – अनुशासन की मर्यादा में मौन हैं और एक भी सशक्त भाजपा नेता तथा कार्यकर्ताओं ने मथुरावासी होने का कर्त्तव्य निभाया है।
पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने इस प्रकरण में वेदना के साथ मात्र एक छोटा सा प्रश्‍न किया है कि क्या अयोध्या, काशी या उत्तर प्रदेश के अन्य तीर्थों को कुछ वार्डों तक सीमित – विभाजित – संकुचित किया जा सकता है ?
ब्रज के ‘सहज सूधरे लोग’ अन्याय – अनाचार सहते रहे हैं और यही सोच कर पाँच सौ वर्ष पूर्व महाकवि सूरदास ने कृष्‍ण से याचना की थी – ‘सूरदास अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबार !

आज मथुरा को भगवान् श्रीकृष्‍ण के भक्त धार्मिक आचार्यों, समाज में अपने साहित्य काव्य से क्रान्ति के उद्घोषक रहे, अपनी जननी – जन्मभूमि के प्रति संकल्पित – समर्पित रहे मात्र क्रान्तिकारी विचारधारा के सहयोगियों की आवश्‍यकता है जो भगवान श्रीकृष्‍ण जन्मभूमि की मर्यादा, संस्कृति तथा इतिहास पर हो रहे क्रूर प्रहार के प्रति अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें जिससे प्रदेश के अन्य तीर्थस्थलों का वार्डों में विभाजन मथुरा का उदाहरण देकर न किया जाये।

सत्तारुढ़ दल के सांस्कृतिक संगठन संस्कार भारती को भी संस्कार के आधार पर, सिद्धान्त के आधार पर अपना स्वर मुखरित करना चाहिए और यदि यह संगठन किसी सिद्धान्त के आधार पर तीर्थों के विभाजन को न्याय संगत मानता है तो वह पक्ष भी व्यक्त किया जाना चाहिए।

– Legend News

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