मुल्‍ला नसरुद्दीन ने ली धर्म उपदेशक से सीख

जब भी मैं धर्म उपदेशकों को दान-पुण्‍य, स्‍वर्ग-नर्क, जन्‍नत-दोजख आदि की बात करते देखता हूं तो मुझे मुल्‍ला नसरुद्दीन की सीख याद आ जाती है।
बड़ी मेहनत से अपने और परिवार के लिए धनोपार्जन करने वाला मुल्‍ला थोड़ा मितव्‍ययी था।
मुल्‍ला की बेगम उसके मितव्‍ययी होने से काफी परेशान थी और जब-तब उसे इसके लिए ताने मारा करती थी।
एक बार शहर में कोई धर्म उपदेशक आया हुआ था जो दान-पुण्‍य से इस जन्‍म और अगले कई जन्‍मों के सुधरने की बात कहता था। उसकी बातों से प्रभावित होकर लोग उसे दिल खोलकर दान दे रहे थे।
एक दिन मुल्‍ला की बेगम उसे उस धर्म उपदेशक के कार्यक्रम में इस उद्देश्‍य से लगभग खींचकर ले गई कि मुल्‍ला पर धर्म उपदेशक के दान-पुण्‍य वाले प्रवचनों का असर पड़ेगा और वह खर्च करने में उदार प्रवृत्ति अपना लेगा।
प्रवचन सुनकर लौटते समय मुल्‍ला से उसकी बेगम ने जानना चाहा कि उसे प्रवचन कैसे लगे।
इस पर मुल्‍ला ने कहा- नि:संदेह, मैं धर्मगुरू के प्रवचनों से बेहद प्रभावित हुआ हूं। मुझे समझ में आ चुका है कि दान-पुण्‍य से श्रेष्‍ठ इस दुनिया में कुछ भी नहीं है।
मैंने प्रण कर लिया है कि कल सुबह से ही मैं इस कार्य में पूरी सिद्दत के साथ लग जाऊंगा और दान के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित करते हुए उससे पुण्‍य कमाने पर प्रवचन दूंगा।