मुल्‍ला नसरुद्दीन और उसके विद्यार्थी

दूसरों को सीख देना कितना आसान है, और खुद उस सीख पर अमल करना कितना कठिन।
मुल्‍ला नसरुद्दीन ने अपने विद्यार्थियों की नियिमत परीक्षा वाली कॉपियां जांचने के बाद उन्‍हें लौटाते हुए कहा- मैंने सभी विद्यार्थियों की कॉपियां जांच कर योग्‍यता के अनुसार नंबर दे दिए हैं। अब यदि किसी विद्यार्थी को कुछ पूछना हो, तो वह पूछ सकता है।
एक विद्यार्थी खड़ा होकर बोला- जी, मुझे कुछ पूछना है।
मुल्‍ला ने कहा- हां-हां, पूछो।
विद्यार्थी अपनी जांची हुई कॉपी मुल्‍ला के पास ले गया और कॉपी उनके सामने रखकर बोला- सर…मैं यह नहीं समझ पा रहा कि कॉपी के आखिर में आपने जो लिखा है, वह क्‍या लिखा है।
काफी देर तक मुल्‍ला कॉपी पर लिखे को गौर से देखता रहा लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आया जबकि वह उसकी अपनी लिखावट थी।
बहुत देर माथा-पच्‍ची के बाद भी जब मुल्‍ला के पल्‍ले कुछ नहीं पड़ा तो उसने हारकर कहा- नालायक कहीं का। इतना भी नहीं पढ़ सकता। यही तो लिखा है कि साफ-साफ लिखने की आदत डालो।