मांस पर प्रतिबंध का मामला बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक मुद्दा नहीं: हाई कोर्ट

नैनीताल। उत्तराखंड के हरिद्वार में बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस मामले को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। इस पर फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि देश में जहां 70 फीसदी आबादी मांसाहारी भोजन करती है, मांस पर प्रतिबंध लगाने का मामला नागरिकों के मौलिक अधिकारों से संबंधित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक मुद्दा नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की पीठ ने कहा, ‘मुद्दा अल्पसंख्यक बनाम बहुमत का नहीं है। मुद्दा बहुत आसान है। भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार क्या हैं?’
कोर्ट ने याचिका में संशोधन का दिया आदेश
अदालत ने अब याचिकाकर्ताओं से एक सप्ताह में अपनी याचिकाओं में संशोधन करने को कहा है क्योंकि उनमें से किसी ने भी यह दलील नहीं दी कि इस तरह का प्रतिबंध किसी नागरिक के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाओं को पूरे मन से तैयार नहीं किया गया है, जो मौलिक संवैधानिक मुद्दों को चुनौती देने के लिए आवश्यक है।
हरिद्वार के कुछ निवासियों ने दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि हरिद्वार में बूचड़खानों पर प्रतिबंध अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव है क्योंकि जिले के कई क्षेत्रों में अधिकांश मुस्लिम आबादी है।
कोर्ट ने खानपान के एक सर्वेक्षण का दिया हवाला
शुक्रवार को पीठ ने 2018 और 2019 से भारतीयों के भोजन की आदतों पर सर्वेक्षण का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि यह बहुत ही चौंकाने वाला डेटा है कि उत्तराखंड में 72.6 फीसदी आबादी मांसाहारी है। कुल मिलाकर 70 फीसदी भारतीय आबादी मांसाहारी है जो इस मिथक को तोड़ती है कि अधिकांश आबादी शाकाहारी है।
अपनी पिछली सुनवाई में पीठ ने कहा था कि मुद्दा यह है कि क्या किसी नागरिक को अपना आहार तय करने का अधिकार है या यह राज्य तय करेगा।
‘लोकतंत्र का मतलब सिर्फ बहुमत से शासन करना नहीं’
कोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी सभ्यता का मूल्यांकन केवल इस बात से होता है कि वह अपने अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। लोकतंत्र का मतलब केवल बहुमत से शासन नहीं है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र का मतलब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा है।
यह है मीट बैन का एक्ट
मार्च में उत्तराखंड ने हरिद्वार के सभी क्षेत्रों को बूचड़खाना मुक्त घोषित कर दिया था और बूचड़खानों को जारी किए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट में दो याचिकाओं ने इसे दो आधारों पर चुनौती दी गई थी। एक किसी भी प्रकार के मांस पर पूर्ण प्रतिबंध असंवैधानिक है। यह बैन उत्तराखंड सरकार ने यूपी नगर पालिका अधिनियम 237 ए के तहत किसी भी परिषद या नगर पंचायत को बूचड़खाने पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है।
-एजेंसियां

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