मुफ़्त के माल पर कई विभाग कर रहे हैं हाथ साफ, 4 की जगह 14 यूनिट… फर्जी राशन कार्ड… रबर के अंगूठे और डिजिटल हेराफेरी

महामारी के दौर में सरकार द्वारा गरीबों की भलाई के लिए शुरू की गई मुफ़्त राशन बांटने की योजना न केवल राशन माफिया के लिए वरदान साबित हो रही है बल्‍कि इससे कई विभागों की तो जैसे लॉटरी निकल पड़ी है और इन विभागों में बेठे भ्रष्‍टाचारियों के वारे-न्‍यारे हो चुके हैं।
यही कारण है कि आए दिन मुफ़्त के इस माल का बीच सड़क पर बंटरबांट होने के बावजूद किसी के कानों पर जूं नहीं  रेंग रही और सब-कुछ बड़े इत्‍मीनान से चल रहा है।
यूं तो सरकारी राशन में घपला और घोटाला किया जाना कोई नई बात नहीं है किंतु कोरोना काल में जब से सरकार ने मुफ़्त राशन बांटने की योजना शुरू की है, तब से राशन माफिया की चांदी ही चांदी हो रही है।
मुफ़्त के इस सरकारी माल पर हाथ साफ करने का कारनामा जाहिर है कि जिला आपूर्ति विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता इसलिए राशन माफिया सर्वाधिक सक्रिय यहीं रहता है।
फर्जी राशन कार्ड से प्रारंभ होने वाला यह खेल यूनिट बढ़ाने तथा रबर के अंगूठे इस्‍तेमाल करने के कारनामे से होता हुआ डिजिटल हेराफेरी पर जाकर भ्रष्‍टाचार की ऐसी ठोस बुनियाद बनाता है जिसके जरिए पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में का मुहावरा चरितार्थ होते देर नहीं लगती।
विभागीय सूत्र बताते हैं 4 यूनिट के राशन पर 14 यूनिट का माल हड़पने के लिए एक ओर जहां रबर के अगूंठों का इस्‍तेमाल किया जाता है वहीं दूसरी ओर कंप्यूटर के डेटा में भी हेराफेरी की जाती है।
इस पूरे खेल की तह में जाने पर मिली जानकारियां इतनी चौंकाने वाली हैं कि किसी को भी आसानी से भरोसा नहीं हो सकता।
चूंकि राशन हड़पने की सारी प्रक्रिया जिला आपूर्ति विभाग से शुरू होकर यहीं खत्‍म होती है इसलिए बात चाहे ‘मुखबिरी’ की हो या बंटवारे की, इस विभाग की संलिप्‍तता के बिना संभव नहीं।
जिला आपूर्ति कार्यालय से सर्वप्रथम कुछ खास तत्‍वों को ये सूचना लीक की जाती है कि किस गोदाम से कितना फर्जी राशन किस जिले पहुंचाया जा रहा है। फिर वो तत्‍व पुलिस के सहयोग से बीच सड़क पर घेराबंदी करके माल ले जाने वाले से सौदेबाजी करते हैं।
बताया जाता है कि हर महीने इस तरह लाखों रुपए की अतिरिक्‍त कमाई की जाती है और सारे ”मौसेरे भाई” अपना-अपना किरदार बड़ी चालाकी से निभाते हुए सरकार को बेखौफ होकर चूना लगा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे भ्रष्‍टाचार का सबसे बड़ा हिस्‍सा जिला आपूर्ति कार्यालय हड़पता है। उसके बाद नंबर आता है माल की घेराबंदी करने वालों का और इलाका पुलिस का। कहीं-कहीं इस बंदरबांट में उच्‍च पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होते हैं क्‍योंकि पकड़े जाने पर लीपापोती करने में उनकी भूमिका अहम साबित होती है।
विभागीय सूत्र ही बताते हैं कि मुफ़्त के राशन में हो रहे भारी भ्रष्‍टाचार का आलम यह है कि इसे पकड़ने के लिए किसी ‘रॉकेट साइंस’ की जरूरत नहीं है। सरकार चाहे तो सिर्फ किसी भी राशन डीलर के क्षेत्र से कुल यूनिट्स और जिला आपूर्ति कार्यालय में दर्ज उसके टोटल यूनिट्स का मिलान करा ले।
सूत्रों का दावा है कि मात्र इतने भर से राशन माफिया का पूरा काला चिठ्ठा जांच एजेंसी के सामने होगा, और सामने होंगे वो सभी सफेदपोश अधिकारी जो यदा-कदा इसकी अवैध बिक्री में लिप्‍त प्‍यादों को पकड़कर वजीर को बचाने का काम करते हैं ताकि मुफ़्त के माल पर हाथ साफ करने की प्रक्रिया अनवरत जारी रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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