सुनो सरकार! Eichhornia (जलकुम्भी) हटाकर भी की जा सकती है मोटी कमाई

देश भर की नदियों, नालों व तालाबों में पानी के आतंक के रूप में फैली Eichhornia (जलकुम्भी) ने लाखों नाले व तालाबों को बर्बाद कर दिया है। पानी का जो भी स्त्रोत इसकी चपेट में आया वो इसके चंगुल से शायद ही मुक्त हो पाया हो। पानी के प्रदूषण मुक्त करने के मामले में इसका कोई सानी नहीं है, तमाम फायदों से भरी Eichhornia को आज भी तमाम देश जलीय आतंक के रूप में ही देखते हैं, लेकिन इसकी कामर्शियल वैल्यू के बारे में अभी जागरुकता नहीं आई है। अगर सरकार और पढ़े-लिखे नौजवान इसके बारे में थोड़ी रिसर्च और जानकारी हासिल करें तो तय है कि इससे करोड़ों रुपये की कमाई कर सकते हैं। अभी तक की रिसर्च तो यही बताती है कि तमाम बीमारियों में लाभकारी दवाई व घरेलू उपयोग की तमाम वस्तुओं का निर्माण इसके विभिन्न स्वरूपों से किया जा सकता है।

देश भर में पानी के नेचुरल स्त्रोतों को खतम करने में नागिरकों के साथ-साथ Eichhornia का भी काफी योगदान रहा है। कभी अंग्रेज इसे बंगाल में सजावटी पौधे के रूप में लेकर आए थे। उसके बाद पहले बंगाल और अब पूरे देश के लाखों तालाबों, नदियों व नालों पर इसका राज कायम हो चुका है। अमेरिका, अफ्रीका से लेकर तमाम विकसित देश इससे छुटकारा पाने की तरकीबें खोजने में लगे हैं, लेकिन पूर्ण सफलता कहीं पर किसी को हासिल नहीं हो सकी है। जहां भी इसे लेकर कोई प्रोजेक्ट तैयार किया गया वो इसके खात्मे से संबंधित प्रोजेक्ट ही था। अभी तक किसी भी देश ने इसके उपयोग को लेकर कोई नीति तैयार नही की है।

देश की पुरातन चिकित्सा पद्दति आयुर्वेद में इसका खासा महत्व है। आस्थमा, कफ,एंजाइमा,थाइराइड,शरीर के अंदरूनी दर्द, त्वचा संबंधी बीमारियों सहित तमाम अन्य प्रकार के उपयोग को लेकर इसका तैयार होने वाला तेल 1800 रुपये लीटर तक बिकता है। इतना ही नहीं सुखा कर पाउडर के रूप में किलो में इसकी कीमत 900 रुपये किलो से लेकर 1200 रुपये किलो तक में है। जलकुम्भी पर रिसर्च कर रहे दिल्ली के डाक्टर अर¨वद ¨सह इसके उपयोग से इस पर नियंत्रण की वकालत करते हैं।

देश का शायद ही कोई गांव या शहर का ऐसा हिस्सा बचा होगा जहां पर ठहरा पानी हो और उसमे जलकुम्भी का राज न हो। सरकार चाहे तो एक पंथ से दो काज कर सकती है। इसपर कंट्रोल को लेकर बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित करके फिजिकल तौर पर इसे खतम किया जा सकता है और दवाइयों का निर्माण करके या आयुर्वेद की दवाइयां बनाने वाली कंपनियों को सप्लाई करके युवा मोटी कमाई कर सकते हैं। इसके और भी उपयोग हैं जैसे फर्नीचर, हैंडबैग, आर्गेनिक खाद,जानवरों के चारे के साथ कागज बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

पंजाब सहित देश के लगभग राज्यों में जलकुम्भी के आतंक को खतम करके जल संरक्षण के प्राकृतिक स्त्रोतों को बचाया जा सकता है। विभिन्न प्रदेशों में इसे अलग-अलग छह नामों से पुकारा जाता है। ¨हदी में जलकुम्भी, अंग्रेजी में शेल फ्लावर,बंग्ला में ताकावाना, गुजराती में जलाशंखाला, तमिल में आकाशातम्मारी व उड़िया में बोराझांझी नाम से इसे पुकारा जाता है। इसकी सफाई फिजिकल रूप से ही संभव है। कपूरथला के पर्यावरण प्रेमी संत बलबीर ¨सह सींचेवाल ने कई किलोमीटर के काला संघिया ड्रेन को जलकुम्भी के आतंक से फिजिकली कारसेवा के जरिए मुक्त करवाया है। अब ड्रेन में साफ पानी बह रहा है। अमेरिका सहिक कई विकसित देशों में इसके खात्मे के लिए तीन तरीके निकाले हैं बायोलोजिकल, केमिकल व फिजिकल कंट्रोल। अभी तक पूर्ण रूप से फिजिकल कंट्रोल के जरिए ही इसपर नियंत्रण पाने में सफलता हासिल की जा सकी है। पानी में 1 मीटर ऊंचाई तक जाने वाली बेलाकार जलकुम्भी की 10 से 20 सेंटीमीटर चौड़ी पत्तियां विटामिन ए-बी व सी से भरी होती है। इसका भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ताइवान जैसे कुछ देशों में इसे खाने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। फिलहाल इंसानों के साथ-साथ देश के प्राकृतिक जल स्त्रोतों को खतम करने वाली जलकुम्भी के उपयोग को लेकर जागरुकता लाकर इस आतंक से छुटकारा पाया जा सकता है। हमारे लाखों जल स्त्रोत भी इसके आतंक से बच जाएंगे।

-एजेंसी

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