को रो ना ‘कोरोना’… मतलब कौन नहीं रो रहा?

को-रो-ना अर्थात् ‘कोरोना’… मतलब कौन नहीं रो रहा? निठल्‍ला चिंतन आदिकाल से बड़े काम की चीज रहा है। इसी निठल्‍ले चिंतन से उपजी है ‘कोरोना’ की ये नहीं परिभाषा। मतलब कौन नहीं रो रहा? इसे सवाल समझने की भूल मत कर बैठना, क्‍योंकि ये पूछा नहीं जा रहा बल्‍कि बताया जा रहा है।
आशिक इसलिए रो रहे हैं कि माशूका उन्‍हें इन दिनों कतई मुंह नहीं लगा रही। सबके मुंह पर ‘मुछीका’ बंधा है। पड़ोसी इसलिए रो रहे हैं कि ‘भाभीजी ने घर पर’ होते हुए उनके लिए नो एंट्री का बोर्ड टांग रखा है।
जिन्‍हें चिलमन से झांक कर अपने आने-जाने का मुहूर्त निकालते थे ताकि दर से निकलते ही दीदार हो जाएं, वो अब बाहर खड़े देखकर भी ऐसे मुंह फेर लेती हैं जैसे साक्षात कोरोना देख लिया हो।
पतियों का तो पूछिए ही मत। उन्‍होंने ‘लॉकअप’ के बारे में तो सुन या देख रखा था। इस बाबत उन्‍हें ये भी पता था कि लॉकअप में पुलिस ‘तशरीफ़’ को ताली-थाली की तरह बेझिझक बजाती है परंतु ये इल्‍म किसी को नहीं था कि वह ‘लॉकडाउन’ में तश्‍तरी बंधी हुई ‘तशरीफ़’ को भी इतना बजाएगी कि उठने-बैठने लायक नहीं रहेगी, लिहाजा वो मन मसोसकर पत्नियों के आदेश-निर्देशों का पालन कर रहे हैं।
उन्‍हें आजकल ‘कामवाली बाइयों’ की भी बहुत याद सता रही है। पत्‍नियों से सहानुभूति की आड़ में वो ‘जुगाड़’ की अनुपस्‍थिति को बहुत मिस कर रहे हैं।
पत्‍नियों का हाल और भी बुरा है। उन्‍हें अब समझ में नहीं आ रहा क्‍यों वो पतियों से घर जल्‍दी आने या कुछ समय निकालकर बच्‍चों के बीच बैठने की जिद किया करती थीं।
21 दिन के लॉकडाउन ने कितने पतियों की ‘केंचुली’ उतारकर रख दी है। काम धेले का करके नहीं देते और वाट्सएप-फेसबुक की आभासी दुनिया को यह दिखाते रहते हैं जैसे लॉकडाउन का पहाड़ उन्‍हीं के सिर पर टूट पड़ा हो।
वो इस चिंता में भी दुबली हुई जा रही हैं कि ‘वर्क फ्रॉम होम’ की अस्‍थाई बीमारी यदि घर कर गई तो बहुत भारी पड़ेगी। कैसे झेलेंगी उन्‍हें दिन-रात।
सुबह-शाम हाय-बाय करने वालों की ऐसी-ऐसी आदतें पत्‍नियों को अब जाकर पता लगी हैं, जिनके बारे में पहले पता होता तो कब की बाय-बाय कहकर निकल ली होतीं।
मुंह से लेकर हाथों तक को कवर करके चलने वाली हर उम्र की कमसिनें इन दिनों लॉकडाउन हैं। पड़ोसी उनके बारे में पूछने लगे हैं कि ऐसे में भी कोई मेहमान आ गया है या मोहतरमा किराएदार हुआ करती हैं।
जो शोहदे कल तक उनके मुंह पर लपेटे हुए दुपट्टे का रंग-डिजाइन और स्‍कूटी का नंबर देखकर गंतव्‍य तक पीछा करते थे, वो इस दौर में दूर से राम-राम करके कट लेते हैं।
आदमी तो आदमी जानवरों को भी कोरोना ने रोने पर मजबूर कर दिया है। कुत्ते ये सोच-सोचकर हूकरी भर रहे हैं कि अच्‍छे-भले इंसानों को अचानक ये हो क्‍या गया है। सड़कों पर अब जबकि उन्‍हें गाड़ियां तो दूर, आदमी तक दिखाई नहीं दे रहे तो वो मकानों के अंदर ताक-झांक करके पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
बंदरों की भी समझ में नहीं आ रहा कि पिछले महीने बंदर सफारी बनवाकर शहर से बाहर करने की मांग करने वाला इंसान अब कैसे बंदरों को न केवल ढूंढ-ढूंढकर केले खिला रहा है बल्‍कि खुद सफारी की सैर करने निकल पड़ा है। शहर के बंदर उसे अब कम लगने लगे हैं। बंदरों की भूख-प्‍यास उनकी प्राथमिक चिंता बन गई है।
बिल्‍लियों को इंतजार रहता है कि कोई आदमी सा दिखने वाला जीव उनका रास्‍ता काटे तो कुछ भला हो। वो सड़क क्रॉस करने से पहले इसके लिए बाकायदा एक बार बाएं, फिर एकबार दाएं देखती हैं।
कुल मिलाकर हर कोई रो रहा है। जो किसी कारण रो नहीं पा रहा उसे उसके परिवार के लोग रुलाने पर आमादा हैं। उन्‍हें लग रहा है कि यदि ये नहीं रो रहा तो कुछ कैमिकल लोचा है। कहीं खिसक तो नहीं गया। अन्‍यथा ऐसा कैसे हो सकता है कि ये रो नहीं रहा।
कोरोना ने रोने को फिलहाल तो इतना शाश्वत बना दिया है कि लोग मुंह का मुछीका फट न जाए, इसलिए हंसने से परहेज करने लगे हैं।
अब शायद आपको भी समझ में आ गया होगा कि सरकार क्‍यों कभी ताली-थाली-घंटे-घड़ियाल बजवा रही है तो कभी लाइट ऑन-ऑफ करा रही है। रोतुड़ू लोगों को मुस्‍कुराने का भी कूपन देना होता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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