Guru Gobind Singh जयंती पर जानिए देश के सबसे बड़े पांच गुरुद्वारों के बारे में

नई दिल्‍ली। Guru Gobind Singh का एक वाक्य जो सैकड़ों साल बाद आज भी हमें अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत देता है,वह है- ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं तां गोविंद सिंह नाम धराऊं’। सिखों के दसवें Guru Gobind Singh की आज जयंती है , इस अवसर पर जानिए कि देश के वो पांच प्रमुख गुरुद्वारे कौन कौन से हैं जहां आज दुनियाभर के सिख यहां जुटेंगे।

पटना साहिब: सिखों का दूसरा सबसे बड़ा तख्त

तख्त श्री हरिमंदिरजी विश्व में सिखों का दूसरा बड़ा तख्त है। यह दसवें गुरु गोविन्द सिंह की जन्मस्थली है। राजा फतेहचंद मैनी ने 1772 में यहां इमारत बनवाई। बाद में महाराजा रंजीत सिंह ने 1837 में भव्य गुरुद्वारा बनवाया।1934 में बिहार में आए भूकंप में इमारत को क्षति पहुंची । इसके बाद 1954 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर ने पांच मंजिला भवन का निर्माण शुरू कराया। तीन साल बाद गुरुजी के प्रकाशोत्सव पर गुरुद्वारा का निर्माण कार्य पूरा हुआ।

पोंटा साहिब : यहां रुक गया था गुरु गोविंद जी का घोड़ा
पोंटा शब्द का अर्थ होता है – ‘पांव’। कहा जाता है कि गुरु गोविंद सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर हिमाचल प्रदेश से गुजर रहे थे। इसी जगह पर उनका घोड़ा आपने आप आकर रुक गया।तभी से इस जगह को पवित्र माना जाने लगा। गुरु गोविंद सिंह ने यहां अपने जीवन के चार साल बिताए और इसी जगह पर दशम ग्रंथ की रचना की। यहां उनके हथियार और कलम भी रखी हुई है।

आनंदपुर साहिब : मुगलों को धूल चटाई
हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे पंजाब स्थित आनंदपुर साहिब में मुगलों से संघर्ष और गुरु गोविंद सिंह की वीरता का इतिहास बिखरा पड़ा है। मुगल शासक औरंगजेब की भारी-भरकम सेना को यहां एक नहीं बल्कि दो-दो बार धूल चाटनी पड़ी। 1700 में सिख जांबाजों के सामने 10 हजार से ज्यादा मुगल सैनिकों को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। 1704 में मुगलों के अलावा उनका साथ दे रहे पहाड़ी हिंदू शासकों को भी हार मिली। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में यहां पंज प्यारे चुनकर खालसा पंथ की शुरुआत की थी।

दमदमा साहिब: यहां तैयार हुआ गुरुग्रंथ
पंजाब के भठिंडा में स्थित दमदमा साहिब पांच प्रमुख तख्तों में से एक है। यह वही जगह है, जहां गुरु गोविंद सिंह ने 1705 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम रूप दिया था।गुरु गोविंद सिंह ने इस जगह को गुरु की काशी नाम भी दिया था। हालांकि अब इसे दमदमा साहिब के नाम से जाना जाता है।

हुजूर साहिब: गुरु ग्रंथ साहिब ही गुरु
महाराष्ट्र के नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे बसे हुजूर साहिब में Guru Gobind Singh ने अंतिम सांस ली। दो हमलावरों से लड़ते वक्त वह चोटिल हो गए थे, और 41 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। 1708 में उन्होंने यहां शिविर लगाया था। जब उन्हें लगा कि अब जाने का वक्त आ गया है, तो उन्होंने संगतों को आदेश दिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही आपके गुरु हैं। गुरु जी ने पांच पैसे और नारियल गुरु ग्रंथ साहिब के सामने रख माथा टेका। इसके बाद से गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु मान लिया गया।

-एजेंसी

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