सभी एकादशी व्रतों में श्रेष्ठ है कार्तिक एकादशी, जानें इसका महत्व

इस वर्ष 25 नवम्बर को कार्तिक एकादशी है। कार्तिक एकादशी बोलने पर आँखों के सामने आती है महाराष्ट्र के पंढरपुर की यात्रा। 24 एकादशियों में इस एकादशी का एक विशेष महत्व है। ऐसा कहा जाता है क‍ि इसी दिन के व्रत में सभी देवताओं का तेज एकत्रित होता है।

चातुर्मास

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक के 4 महीनो के काल को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। चातुर्मास में भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं। इस काल में अधिक व्रत और त्यौहार होते हैं। पृथ्वी पर अलग अलग प्रकार की तरंग अर्थात waves आती रहती हैं। श्रावण, भाद्रपद, आश्विन एवं कार्तिक इन 4 महीनों में पृथ्वी पर आने वाली तरंगों में तमोगुण अधिक होता है। इन तरंगों का सामना करना संभव हो इसके लिए स्वयं में सात्विकता बढ़ाना आवश्यक होता है। त्योहारों और व्रतों के कारण सात्विकता बढ़ती है इसलिए चातुर्मास में अधिकाधिक त्यौहार और व्रत होते हैं। हिन्दू धर्म कितना वैज्ञानिक और सूक्ष्म स्तर पर विचार करनेवाला है यह इससे ध्यान में आता है।

आषाढ़ शुद्ध एकादशी को ‘शयनी एकादशी’ कहा गया है; क्योंकि ‘उस दिन देवता निद्राधीन होते हैं’, यह मान्यता है। कार्तिक शुद्धि एकादशी को देवताओं की निद्रा पूरी होकर वे जाग जाते हैं; इसलिए उसे ‘प्रबोधिनी अथवा देवोत्थानी एकादशी’ कहते हैं।

एकादशी के दिन सभी प्राणियों में सात्विकता बढ़ती है इसलिए इस दिन व्रत रखने से उसका अधिक लाभ मिलता है। श्रीविष्णु इस व्रत के देवता हैं। शैव और वैष्णव इन दोनों सम्प्रदायों में एकादशी का व्रत रखा जाता है।

एकादशी व्रत के विशेषताएं

एकादशी सभी व्रतों में से एक मूलभूत व्रत है । अन्य व्रतों की भांति इस व्रत को संकल्पपूर्वक और विधिपूर्वक करना नहीं होता। काल के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान सत्व, रज और तम इन गुणों की मात्रा बदलती रहती है। एकादशी के दिन सभी प्राणियों में सर्वाधिक सात्विकता होती है। उसके कारण इस समय साधना करने से उसका अधिक लाभ मिलता है

व्रत करने की पद्धति

हममें से अनेक लोग एकादशी को उपवास रखते हैं। एकादशी को कुछ न खाकर केवल पानी और सूखा अदरक -चीनी सेवन करना सर्वोत्तम है। यह संभव न हो , तो उपवास के पदार्थ खाएं . एकादशी को उपवास रखकर दूसरे दिन पारण करते हैं।

एकादशी के व्रत का महत्व

पुराणों में एकादशी की बड़ी महिमा वर्णित है। पद्मपुराण में कहा है की सहस्रों अश्वमेघ यज्ञ और सैंकड़ों राजसूय यज्ञों की अपेक्षा एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण है। एकादशी स्वर्ग, मोक्ष,स्वस्थ्य, अच्छी भार्या और अच्छा पुत्र प्रदान करने वाली होती है। गंगा, गया, काशी, पुष्कर और वैष्णव इन क्षेत्रों में से किसी को भी एकादशी की बराबरी करना संभव नहीं है। एकादशी को ‘हरिदिन’ अर्थात विष्णु जी का दिवस कहा जाता है। महाभारत के युद्ध में गोत्र वध होने से अर्थात समान गोत्र के व्यक्तिओं का वध होने से धर्मराज ने श्री कृष्ण से ‘गोत्रवध दोष के उन्मूलन के लिए क्या करना चाहिए ?’ ऐसा पूछा। इस पर श्री कृष्ण ने कहा, ‘एकादशी व्रत रखने से गोत्र हत्यादोष नष्ट होगा। ‘एकादशी का आचरण करने से महापातकों का नाश होकर सभी दोष नष्ट होंगे। उपवास के कारण शरीर निरोगी रहने में भी सहायता मिलती है।

हममें से अधिक लोगों को एकादशी का अर्थ ‘उपवास’ इतना ही ज्ञात होता है परन्तु उसकी महिमा और शास्त्र ज्ञात होने से हम और अच्छी पद्धति से उपासना कर सकेंगे।

– कु. कृतिका खत्री,

सनातन संस्था, दिल्ली

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