कलम की पैनी धार के ल‍िए जाने जाते थे कन्‍हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक समाचार-पत्रों व ज्ञानोदय साह‍ित्य‍िक पत्र‍िका के संपादक रहे न‍िबंधकार श्री कन्‍हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का आज जन्‍मदिन है। राष्‍ट्रवादी तथा मानवतावादी विचारधारा से ओतप्रात ‘प्रभाकर’ का ये रूप उनकी रचनाओं में देखने को मिलते है। आज 29 मई को प्रभाकर जी की जयंती है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में इन्‍होंने निहित स्‍वार्थों को छोड़कर समाज में उच्‍च आदर्शों को स्‍थापित किया है। उन्‍होंने हिन्‍दी को नवीन शैली-शिल्‍प से सुशोभित किया। इन्‍होंने संस्‍मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तान्‍त, रिजोर्ताज आदि लिखकर साहित्‍य-संवर्द्धन किया है। ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक समाचार-पत्रों के माध्‍यम से तत्‍कालीन राजनीतिक, सामाजिक, तथा शैक्षिक समस्‍याओं पर इनके निर्भीक एवं आशावादी विचारों का परिचय प्राप्‍त होता है। 9 मई 1995 ई. को इनका देहान्‍त हो गया।

सहारनपुर जनपद के देवबन्‍द में जन्मे कन्‍हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’जी की प्रमुख कृतियॉं है।

धरती के फूल
आकाश के तारे
जिन्‍दगी मुस्‍कुराई
भूले-बिसरे चेहरे
दीप जले शंख बजे
माटी हो गयी सोना
मह‍के ऑंगन चहके द्वार
बाजे पयालियाके घूँघरू
क्षण बोले कण मुस्‍काये
रॉबर्ट नर्सिंग होम में

हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता के माथे पर सांस लेते चंदन शब्दों का तिलक लगाने वाले पद्मश्री कन्हैया लाल मिश्र ’प्रभाकर’ के पास जरूर किसी तांत्रिक-जोगी का दिया हुआ सिद्ध नमक था। तभी तो साधारण बोल-चाल के शब्दों में उस अद्भुत नमक से वे ऐसा स्वाद पैदा कर देते कि पाठक की आंखें और मन कुंभ में गंगास्नान के बाद गंगाघाट पर बैठ प्रसाद ग्रहण करने का सुख पाते। दर असल, प्रभाकर जी ज़िन्दगी लिखते थे – कभी निबंध के नाम से, कभी लघुकथा तो कभी अग्रलेख के नाम से। और लिखते भी कहां थे ! सीधे जादू टोना करते थे – विचारों पर, जीवन शैली पर। उनका साहित्य ज़िन्दगी से उठता और ज़िन्दगी बांटता था। क बानगी प्रस्तुत है –

पटना का रेलवे स्टेशन। जीवन से तंग आये एक सज्जन रेलगाड़ी से कट कर मर जाने के लिये स्टेशन पर टहल रहे हैं। गाड़ी के आने में देर है। पता नहीं क्या सोच कर सामने बुक स्टाल से जेब में पड़ी आखिरी अठन्नी देकर ’नया जीवन’ पत्र खरीद लेते हैं। प्रभाकर जी का लेख ’धीरे-धीरे जियो’ जैसे उन्हें ही ढूंढ रहा था। पढ़ते ही उनकी दुनिया बदल जाती है। उनकी गाड़ी फिर से आशा – उत्साह की पटरी पर आ जाती है। वे घर लौट पड़ते हैं – सफलता के शिखर छूने का संकल्प लेकर।

यह प्रभाव था ’प्रभाकर’ जी की लेखनी से निकले शब्दों का। लेखन ’प्रभाकर’ जी के लिये लोक रंजन का माध्यम नहीं था। वे तो लिखते ही थे – नागरिकता के गुणों का विकास करने के लिये !

वे कहते थे – “हमारा काम यह नहीं कि हम विशाल देश में बसे चंद दिमागी अय्याशों का फालतू समय चैन और खुमारी में बिताने के लिये मनोरंजक साहित्य का मयखाना हर समय खुला रखें। हमारा काम तो यह है कि इस विशाल और महान देश के कोने-कोने में फैले जन साधारण के मन में विश्रंखलित वर्तमान के प्रति विद्रोह और भव्य भविष्य के निर्माण की श्रमशील भूख जगायें।”

ऐसे उदात्त आदर्श को सामने रख कर साहित्य रचने वाले साहित्यकार की कलम ओछे समझौते नहीं कर सकती। उसे तो सूली पर लटकते हुए भी अपनी कलम की धार और पैनी करनी होती है – और यही प्रभाकर जी ने किया भी। उन्होंने अपनी मिशनरी पत्रकारिता के बारे में बड़ी मार्मिक बात कही है –

“यह अनरुके चरण, अनबुझे दीप, अनझुके ललाट और अनथके शिव संकल्प का संघर्ष था।”

लेखक की भूमिका के प्रति उनका दायित्वबोध कितना गहरा था इसका एक उदाहरण देखिये। किसी अवसर पर नेहरू जी ने उनसे पूछा – “प्रभाकर, आज कल क्या कर रहे हो ?” उन्होंने कहा – “आपके और अपने बाद का काम कर रहा हूं।” जब नेहरू जी ने चौंक कर पूछा – “क्या मतलब हुआ इसका ? ” तो प्रभाकर जी ने जवाब दिया – “पंडित जी, आज देश की शक्ति पुल, बांध, कारखाने और ऊंची – ऊंची इमारतें बनाने में लगी है। ईंट – चूना ऊंचा होता जा रहा है और आदमी नीचा होता जा रहा है। भविष्य में ऐसा समय अवश्य आयेगा, जब देश का नेतृत्व ऊंचे मनुष्यों के निर्माण में शक्ति लगायेगा। तब जिस साहित्य की जरूरत पड़ेगी, उसे लिख-लिख कर रख रहा हूं।” वस्तुतः साहित्य के माध्यम से प्रभाकर जी गुणों की खेती करना चाहते थे और अपनी पुस्तकों को शिक्षा के खेत मानते थे जिनमें जीवन का पाठ्यक्रम था। वे अपने निबंधों को विचार यात्रा मानते थे और कहा करते थे – “इनमें प्रचार की हुंकार नहीं, सन्मित्र की पुचकार है, जो पाठक का कंधा थपथपाकर उसे चिंतन की राह पर ले जाती है।”

साहित्य और पत्रकारिता को उन्होंने व्यक्ति और समाज के उत्थान का निमित्त बनाया। हर संस्मरण, हर निबंध इस उत्थान यज्ञ में समिधा है, इसलिये एक शब्द भी जाया नहीं होना चाहिये, कमजोर या फालतू न हो। उनकी पत्रकारिता और साहित्य मूलतः सामाजिक सरोकारों का लेखन है। वहां रईसी के अन्तःपुर में या मनोरंजन के चौराहे पर किसी रक्कासा का नाच – गाना नहीं है, वहां तो आठों पहर आदमी को बदलने की क्रांतिकारी योजना है। वहां अगर नाच है तो वह तांडव है – तुच्छ मानसिकता के विरुद्ध ! वहां अगर गाना है तो उच्च मूल्यों की ऋचाओं का गान है। प्रभाकर जी ने मैजिनी का यह वाक्य पढ़ा था – “गुलाम देश में बिना बोये, बिना सींचे दोषों की खेती होती है।” तभी उन्होंने संकल्प लिया आदर्श व्यक्ति और समाज का निर्माण करने वाले साहित्य के सृजन का। उनकी यह योजना इस प्रकार पूरी हुई – “ज़िन्दगी मुस्कुराई”, “बाजे पायलिया के घुंघरू”, ज़िन्दगी लहलहाई” – ’एक अनुशासित व्यक्ति के निर्माण की पुस्तकें। “महके आंगन – चहके द्वार” नामक पुस्तक व्यक्ति को परिवार से जोड़ने वाली, इस परिवार संयुक्त व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ने वाली पुस्तक – “दीप जले-शंख बजे”। अन्ततः इस राष्ट्र-संयुक्त व्यक्ति को विश्व नागरिक बनाने वाली पुस्तक “माटी हो गई सोना”।

प्रभाकर जी जिन आदर्शों का शंख फूंक रहे थे, वे आदर्श स्वयं उन्होंने अपने जीवन में अपनाये थे। 29 मई 1906 को देवबंद (जिला सहारनपुर) में जन्मे ब्राह्मण संस्कारी बालक कन्हैया ने पांच वर्ष की आयु में ही अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का विरोध करना आरंभ कर दिया था। युवावस्था में पढ़ाई छोड़, आजादी की लड़ाई में और सुधार आंदोलनों में खुद को समर्पित कर दिया। जेल यात्राएं और विदेशी शासन के हाथों यातनाएं सहीं। उनकी पुस्तक “तपती पगडंडियों पर पदयात्रा” इस सबका लेखा-जोखा है। उनकी निर्मम और योजनापूर्ण ढंग से पिटाई की गई ताकि वे पत्रकारिता के योग्य न रहें, किन्तु देखिये, अंग्रेज़ी शासन का सूर्य भारत में अस्त हुआ 15 अगस्त 1947 को और ठीक उसी दिन प्रभाकर जी द्वारा संपादित पत्र “विकास” का पुनर्जागरण (पुनः सूर्योदय) हुआ। अत्याचारी हारा, क्रांतिकारी जीता।

-Legend News

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