फैसले की घड़ी

जीवन के विभिन्न अवसरों पर हम सब कोई न कोई फैसला लेते हैं। कोई फैसला लाभदायक सिद्ध होता है और कोई फैसला हमें सालों-साल तंग करता रहता है। कोई फैसला इतना क्रांतिकारी होता है कि हमारा जीवन ही बदल जाता है। हर कोई चाहता है कि उसका हर फैसला सही हो और उसे खुशी, सफलता और समृद्धि की ओर ले जाए, लेकिन ऐसा हर बार कहां होता है ? हमारे बहुत से फैसले हमारा बड़ा नुकसान कर देते हैं, कभी-कभार तो कुछ फैसले हमारे जीवन की फांस बन जाते हैं। हम कैसे सुनिश्चित करें कि हमारा हर फैसला लाभदायक ही हो, या कम से कम ज्यादा से ज्यादा फैसले हमारे लिए लाभदायक हों ? क्या इसकी कोई तकनीक है, कोई प्रक्रिया है, कोई तरीका है जो हमें सही फैसले तक पहुंचने में मदद कर सके ?
अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त लेखिका सूज़ी वेल्च की पुस्तक “10-10-10” का मंत्र इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करता है। उन्होंने बहुत सरल-साधारण शब्दों में हमारी इस उलझन का हल सुझाया है। सूज़ी वेल्च का कहना है कि हमें अपने हर फैसले को 10-10-10 के पैमाने पर परखना चाहिए। उनका मंत्र यह है कि हम यह देखें कि हम जो फैसला कर रहे हैं, हमारे जीवन पर उसका असर दस दिन बाद क्या होगा, दस महीने बाद क्या होगा और दस साल बाद क्या होगा। जब हम अपने फैसलों को इस पैमाने पर तौलेंगे तो हमें उनकी असलियत का पता चल जाएगा कि वे हमारे लिए, हमारे परिवार के लिए, हमारी कंपनी के लिए, हमारे समाज के लिए और हमारे देश के लिए कितने लाभदायक हैं, लाभदायक हैं भी या नहीं ? इस तरह हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि क्या हमारा फैसला समाज के मान्य मापदंडों के अनुरूप है, क्या यह लंबे समय के बाद भी हमारे लिए और हमारे परिवार के लिए हितकर रहेगा ? क्या हमें जवाब “हां” में मिल रहा है ?
फैसला लेने की एक और तकनीक भी हमारे लिए बहुत लाभदायक हो सकती है। बहुत से लोग डायरी लिखते हैं, ब्लॉग लिखते हैं, संस्मरण लिखते हैं। मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरू हमें सिखाते हैं कि रात को सोने से पहले हम दिन भर की घटनाओं को याद कर लें और भविष्य के लिए उनसे सीख लें। इसी विधि को अगर हम वैज्ञानिक तरीके से और ज्यादा विस्तार में अपनायें तो यह हमारे लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकती है।
हमारा मस्तिष्क एक सुपर कंप्यूटर है, लेकिन इसकी एक खासियत यह भी है कि यह बहुत सी जरूरी और गैरजरूरी बातों को या तो मिटा डालता है या फिर अपने उन हिस्सों में सहेज लेता है जहां से कभी-कभार अनायास ही वे हमारे सामने आ जाती हैं। इसका लाभ यह है कि हम अनावश्यक यादों के बोझ तले दबने से बचे रहते हैं और दिमाग की सफाई होती चलती है, लेकिन नुकसान यह है कि हम बहुत सी काम की बातें भी भूल जाते हैं या उनकी उपेक्षा कर देते हैं। खूबी कहें या खामी, पर मस्तिष्क के इसी गुण के कारण हम अपने बहुत से गलत फैसलों से कोई सीख नहीं लेते या सीख नहीं ले पाते।
मस्तिष्क के इसी फीचर के इलाज में हमारी समस्या का हल छिपा है। यदि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि हम आवश्यक बातों को न भूलें, समय पड़ने पर उनसे लाभ ले सकें या कुछ सीख सकें, तो हानिकारक फैसले लेने की गलती से बच सकेंगे, लाभदायक और सही फैसले ले सकेंगे और अपने जीवन को खुशहाल बना सकेंगे। यह तकनीक थोड़ी सी श्रमसाध्य पर बहुत आसान है। तकनीक यह है कि हम किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले सभी उपलब्ध विकल्पों पर विचार करें, विकल्प लिख लें। मैं ज़ोर देकर कहना चाहूंगा कि विकल्प लिख लें, इस एक आवश्यक घटक की उपेक्षा कदापि न करें वरना इस तकनीक का लाभ नहीं मिल पायेगा। किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले उपलब्ध विकल्पों को लिखने की प्रक्रिया शुरू होते ही हमारा दिमाग सोचना शुरू कर देता है, इससे ही कुछ और नये विकल्प भी सूझ जाते हैं और हमारे दिमाग के न्यूरॉन नये तरीकों से जुड़कर मस्तिष्क के विकास में सहायक होते हैं। अब जब हम सभी विकल्प लिख लें तो फिर एक-एक विकल्प का विश्लेषण करते चलें कि उस विकल्प को अपनाने से क्या संभावित लाभ और हानियां होंगे। यहां यह भी अवश्यक लिखें कि लाभ क्यों होंगे या हानि क्यों होगी। इस प्रक्रिया की संपूर्णता इसी में है कि हम सिर्फ लाभ या हानियों का ज़िक्र करके ही खत्म न कर दें बल्कि यह भी देखें कि वह लाभ क्यों होगा या हानि क्यों होगी। इन कारणों को भी लिख लें। जब एक-एक विकल्प को इस तरह से परख लें तो सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प को अपना लें। यह सारी प्रक्रिया लिखित में होना जरूरी है, चाहे आप इसे किसी डायरी में लिखें, व्यक्तिगत ब्लॉग में लिखें, कंप्यूटर की अपनी किसी व्यक्तिगत फाइल में टाइप करें, पर इस प्रक्रिया का लिखित में होना आवश्यक है। इसमें यह भी लिखें कि फलां विकल्प के अब आपको जो भी विकल्प सर्वाधिक उपयुक्त लगे उस विकल्प को अपना लें।
सही फैसला लेने की प्रक्रिया का यह आरंभिक चरण मात्र है। एक साल बीत जाने पर उस फैसले की समीक्षा करें और यह देखें कि फैसला लेते समय आपने जिन विकल्पों का ज़िक्र किया था और लाभ और हानि के लिहाज से उनका जो विश्लेषण किया था क्या यह समय बीत जाने पर भी वह विश्लेषण सटीक प्रतीत होता है या नहीं ? क्या उसमें कुछ और जोड़ा जा सकता था, क्या आपका विश्लेषण तथ्यों पर आधारित था या यह मात्र एक भावनात्मक विश्लेषण था। पांच साल बाद फिर इसी फैसले की समीक्षा करें और दस साल बाद फिर से इसी फैसले की समीक्षा करें। कुछ समय बीत जाने के बाद किसी पूर्व के फैसले की समीक्षा हमेशा ही बहुत लाभकारी होती है क्योंकि तब हम ऐसे बहुत से तथ्यों को नई दृष्टि से देख पाते हैं जिन्हें हम पहले नहीं देख पा रहे थे। जब हम अपने फैसलों की ऐसी समीक्षा करेंगे तो हम बहुत सी नई बातें सीखेंगे, अपने गुरू स्वयं बनेंगे और भविष्य के लिए सही फैसले लेने में समर्थ हो सकेंगे।
किसी भी फैसले के विकल्पों को और हर विकल्प के लाभ-हानियों के लिखित विश्लेषण का लाभ यह है कि एक साल बाद, पांच साल बाद, दस साल बाद या भविष्य में कभी भी जब हम उस फैसले की समीक्षा दोबारा करते हैं तो हम कोई विवरण भूलते नहीं, बल्कि उस फैसले पर समग्रता में विचार कर सकते हैं और देख सकते हैं कि सारे विश्लेषण के बावजूद उस समय हमने जिस फैसले को सही माना था वह वास्तव में सही और लाभदायक था या नहीं। इस प्रक्रिया को अपनाने से हमें शेष फैसले लेने में सुविधा होगी और उनके सही व लाभदायक होने की आशा बढ़ जाएगी। इस तरह यह सुनिश्चत हो सकेगा कि फैसले की घड़ी हमारे लिए उलझनपूर्ण न हो, चिंताजनक न हो और हमारे जीवन के लिए लाभदायक ही हो।

PK Khurana

– पी. के. खुराना
हैपीनेस गुरू, मोटिवेशनल स्पीकर

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