जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा: दरबार मूव का कोई औचित्‍य नहीं, व्यर्थ का खर्च है यह

जम्‍मू। जम्मू-कश्मीर में दशकों से चली आ रही दरबार मूव परंपरा को गैर-जरूरी, सरकारी खजाने के व्यर्थ खर्च और कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हुए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने गृह मंत्रालय व प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी को इस पर फैसला लेने के निर्देश दिए है।
बेंच में जम्मू-कश्मीर की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस रजनीश ओसवाल ने केंद्रीय गृह सचिव और प्रदेश चीफ सेक्रेटरी को दरबार मूव के मुद्दे को उचित योग्य मंच के सामने रखने का निर्देश दिया है ताकि इस पर फैसला लिया जा सके।
कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन के बीच दरबार मूव न करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान बेंच ने यह निर्देश दिए। इस जनहित याचिका में हालांकि सरकार की तरफ से पक्ष रखकर कहा गया था कि इस बार दरबार मूव नहीं किया जा रहा है और जो कर्मचारी जहां है, उसे वहां से काम करने की अनुमति दी गई है। सरकार के इस फैसले पर गौर करने के साथ ही बेंच ने साल में दो बार होने वाले दरबार मूव पर होने वाले खर्च की जानकारी मांगी थी। सुनवाई के दौरान बेंच ने पाया कि साल में दो बार दरबार मूव होने से 200 करोड़ रुपये का भारी भरकम खर्च होता है। इस खर्च के अलावा भी करोड़ों रुपये खर्च होते होंगे जिनका लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है। आज के इस आधुनिक दौर में जब सब कुछ डिजीटल है, ऐसे में दरबार मूव पर करोड़ों रुपये खर्च करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है।
रियासत की असुविधा की वजह से हुई थी दरबार मूव की परंपरा शुरू
बेंच ने दरबार मूव प्रथा शुरू होने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साल 1872 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक की असुविधा की वजह से दरबार मूव प्रथा शुरू हुई थी। उस समय कुछ घोड़ा गाड़ियों में दरबार मूव का रिकार्ड मूव किया जाता था लेकिन आज करीब 151 सरकारी कार्यालय और दस हजार कर्मचारी साल में दो बार इधर-उधर होते हैं। सारा रिकार्ड, कंप्यूटर और यहां तक कि दफ्तरों का फर्नीचर भी साल में दो बार 300 किलोमीटर का सफर तय करते हैं और इस सामान को ले जाने में 150 से अधिक ट्रकों का उपयोग होता है और यह साल में दो बार किया जाता है इस वजह से सरकारी खजाने पर करोड़ों रुपये का बोझ पड़ता है। यह खर्च ऐसे प्रदेश में हो रहा है जहां लोगों को बुनियादी सुविधाओं की काफी कमी है। बेंच ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यायिक ढांचा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का मौलिक अधिकार है और जो प्रदेश अपने लोगों को ये बुनियादी सुविधाएं नहीं दे पा रहा है, वो दरबार मूव जैसे गैर-जरूरी काम पर इतना खर्च कैसे कर सकता है? ऐसे में सालाना दो बार दरबार मूव का कोई प्रशासनिक, कानूनी व संवैधानिक महत्व नजर नहीं आता है।
बेंच ने दरबार मूव को कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हुए कहा कि दरबार मूव परंपरा का जम्मू-कश्मीर के खजाने पर ही प्रभाव नहीं है, बल्कि इसका कर्मचारियों की मानसिक दशा पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसे भारतीय संविधान की धारा 14 के तहत मिले अधिकारों का हनन करार देते हुए बेंच ने कहा कि हजारों कर्मचारियों को छह महीने के लिए अपने परिवार से दूर रहने पर मजबूर होना पड़ता है। इससे उनके जीवन साथी, माता-पिता, बच्चों और आश्रितों पर भी भावनात्मक दबाव पड़ता है। जब एक कर्मचारी ऐसे मानसिक दबाव से गुजर रहा होगा तो वह अपने काम में पूरी रुचि भी नहीं रख पाता जिससे उसकी कार्यक्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है।
-एजेंसियां

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