अमरीका के बाद अब इसराइल भी UNESCO से हटने की तैयारी में

अमरीका के बाद अब इसराइल भी संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक संगठन UNESCO से हटने जा रहा है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि उन्होंने विदेश मंत्रालय को UNESCO से अलग होने की तैयारी करने को कहा है.
इससे पहले अमरीका ने UNESCO पर ‘इसराइल विरोधी’ रुख अपनाने का आरोप लगाया था और संगठन छोड़ दिया था.
अमरीका ने UNESCO पर पक्षपात के आरोपों के अलावा संगठन के बढ़ते हुए आर्थिक बोझ को लेकर चिंता लाते हुए इसमें सुधार करने की ज़रूरत बताई थी.
इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने एक बयान जारी करके अमरीका के इस फ़ैसले को ‘बहादुरी और नैतिकता भरा’ करार दिया है.
UNESCO को दुनिया भर में विश्व धरोहर स्थल चुनने के लिए पहचाना जाता है. इन दिनों यह संगठन अपने नए नेता के चुनाव की प्रक्रिया से गुज़र रहा है.
‘आसान निशाना था यूनेस्को’
बीबीसी के डिप्लोमैटिक संवाददाता जॉनथन मार्कस के मुताबिक अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए UNESCO आसान टारगेट है.
वह बताते हैं, “यह बहुपक्षीय संस्था है जो शिक्षा और विकास से जुड़े लक्ष्यों, जैसे कि सेक्स एजुकेशन, साक्षरता और महिलाओं की बराबरी के लिए काम करती है.”
अमरीका के यूनेस्को से हटने के कदम को बहुत से लोग ट्रंप की ‘अमरीका फ़र्स्ट’ और बहुपक्षीय संगठन विरोधी नीति के नतीजे के तौर पर भी देखेंगे.
मगर इस मामले में विवाद का असली कारण संगठन का कथित इसराइल-विरोधी रवैया है.
नाराज़गी की वजह
अमरीका और इसराइल का यह फ़ैसला UNESCO द्वारा लगातार उठाए गए कुछ क़दमों को लेकर आया है, जिनकी दोनों देश आलोचना कर चुके हैं.
हाल ही में यूनेस्को ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में गतिविधियों के लिए इसराइल की आलोचना की थी. इससे पहले इसी साल UNESCO ने पुराने हिब्रू शहर को फ़लिस्तीन के विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी थी. इसराइल का कहना था कि इस कदम से यहूदियों के इतिहास को खारिज कर दिया गया है.
नेतन्याहू ने विदेश मंत्री को यूनेस्को से अलग होने की तैयारी करने को कहा है
पिछले साल इसराइल ने यूनेस्को को सहयोग देना बंद कर दिया था क्योंकि संगठन ऐसा विवादित प्रस्ताव लाया था, जिसमें यरूशलम की एक अहम पवित्र जगह को लेकर यहूदियों का कोई ज़िक्र नहीं था. इस प्रस्ताव में यरूशलम के पवित्र स्थलों और कब्जे वाले वेस्ट बैंक पर इसराइल की गतिविधियों की भी आलोचना की गई थी.
इससे पहले 2011 में जब यूनेस्को ने फ़िलीस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने का फ़ैसला किया था, तब अमरीका ने अपनी फ़ंडिंग में 22 फ़ीसदी की कटौती की थी.
अमरीका पहले भी हो चुका है अलग
अमरीका यूनेस्को का संस्थापक सदस्य था. मगर 1984 में रीगन प्रशासन ने इस पर भ्रष्टाचार और सोवियत संघ के प्रति झुकाव रखने का आरोप लगाते हुए नाता तोड़ लिया था. अमरीका 2002 में दोबारा इस संगठन से जुड़ा था.
इससे पहले राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अमरीका की तरफ़ से संयुक्त राष्ट्र को दी जाने वाली मदद पर भी नाखुशी ज़ाहिर कर चुके हैं. उनका कहना था अमरीका का योगदान असंगत है.
अमरीका संयुक्त राष्ट्र के सामान्य बजट का 22 फ़ीसदी और पीसकीपिंग का 28 फीसदी बजट फंड करता है.
‘अमरीका का हटना क्षति’
यूनेस्को की प्रमुख इरीना बोकोवा ने अमरीका के फ़ैसले को ‘बेहद अफ़सोसनाक’ बताया था. हालांकि, उन्होंने माना था कि पिछले कुछ सालों में संगठन में ‘राजनीतिकरण’ बढ़ गया है.
यूनेस्को प्रमुख ने अमरीका के हटने को ‘संयुक्त राष्ट्र परिवार’ और बहुपक्षीयता के लिए क्षति बताया है.
अमरीका का यूनेस्को से हटने का फ़ैसला दिसंबर 2018 में प्रभाव में आएगा. तब तक वह इसका पूर्ण सदस्य बना रहेगा.
-BBC