इस ‘झाड़ू’ को देखा तो ऐसा लगा, जैसे मथुरा का ख्‍वाब…जैसे यमुना की आस…

कल संसद परिसर में अपनी सांसद परम आदरणीय, प्रात: स्‍मरणीय हे-मा-जी को ‘झाड़ू’ लगाते देखा। यकीन मानो…कलेजा मुंह को आ गया।
मन में एक हूक से उठी, लेकिन यह सोचकर बैठ गई कि क्‍या-क्‍या न किया इश्‍क में क्‍या-क्‍या न करेंगे। बुढ़ापे का इश्‍क वाकई बहुत शिद्दत से निभाया जाता है।
यदि आप ये इश्‍क-मुश्‍क या प्‍यार-मोहब्‍बत वाला ”साक्षी मिश्रा टाइप” कुछ समझ रहे हैं तो गलत समझ रहे हैं। ये साक्षी भाव वाला इश्‍क है।
यहां उस राजनीति से इश्‍क की बात हो रही है जो ”लगाए न लगे और बुझाए न बुझे” जैसा होता है। राजनीति से इश्‍क की लगन जब लग जाती है तो लोग झाड़ू क्‍या, झंडू बाम भी उठाने से परहेज नहीं करते।
माफ कीजिए यदि अब आप ऐसा समझ बैठे हैं कि हे-मा-जी की तरह किसी प्रोडक्‍ट का विज्ञापन किया जा रहा है तो एकबार फिर गलत समझ रहे हैं।
यह तो उस बात को समझाने की कोशिश भर है जैसे मलाइका अरोड़ा ने यह बताकर समझायी थी कि ”मैं झंडू बाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए”। कहने का आशय है कि झंडू बाम मतलब ”मरहम”, दर्द की दवा।
हे-मा-जी तो राजनीति से इश्‍क की खातिर पहले भी गेहूं की फसल काटकर वोटों की फसल सफलता पूर्वक काट चुकी हैं और ट्रैक्‍टर चलाकर ब्रजवासियों को “चलता” कर चुकी हैं।
खैर, हम पुन: संसद परिसर की झाड़ू पर लौटते हैं जिसे हे-मा-जी ने इतने कलात्‍मक अंदाज में लगाया कि देखने वाले देखते रह गए। कुछ तो अपने आपको त्‍वरित टिप्‍पणी करने से रोक नहीं पाए।
दरअसल, हे-मा-जी के झाड़ू लगाने का अंदाज ही कुछ ऐसा था कि उसकी लय लोगों को बहाकर स्‍वत: ही टि्वटर तक खींच ले गई और उन्‍होंने वहां हे-मा-जी के सम्मान में यथासंभव अपने उद्-गार परोस दिए।
खुदा कसम, झाड़ू लगाने का इतना कलात्‍मक अंदाज शायद ही कभी किसी ने देखा हो। क्‍या मजाल की करीने के साथ लंबे से डंडे में लिपटी उस झाड़ू की एक भी सींक जमीन को छू गई हो। हवा में तैर रही थी हे-मा-जी की झाड़ू। आश्‍चर्य ये कि हवा में तैरते-तैरते ही उसने ”अदृश्‍य कूड़ा” पूरी तरह साफ कर दिया।
हे-मा-जी के पड़ोस में झाड़ू लगा रहे एक युवा केंद्रीय मंत्री की झाड़ू के पास तो कभी-कभी एक कागज का गोला फुदक-फुदक कर दृश्‍यमान हो रहा था किंतु हे-मा-जी की झाड़ू के नीचे का पत्‍थर ‘शर्म’ से ‘लाल’ पड़ा था।
आंखों पर गहरे काले शीशों वाला गॉगल चढ़ाकर और कंधे पर क्रॉस करके टांगे गए ग्रे कलर के हैंड बैग के साथ जिस रुतबे के साथ हे-मा-जी झाड़ू को हवा दे रही थीं, वो काबिल-ए-तारीफ था।
हे-मा-जी की अदा पर फिदा मथुरा की जनता को कल निश्‍चित ही अपने इस निर्णय पर गौरव महसूस हुआ होगा कि उन्‍होंने लगातार दूसरी बार हे-मा-जी को संसद पहुंचाया और संसद परिसर को झाड़ने का जो काम पिछले कार्यकाल में उनसे अधूरा रह गया था, वह करने का अवसर दिया।
सुना है कि संसद परिसर में आयोजित इस झाड़ू प्रतियोगिता के तहत हे-मा-जी द्वारा प्रस्‍तुत झाड़ू लगाने की इस अभिनव कला से प्रभावित होकर मथुरा की जनता ने ठान लिया है कि वो मथुरा से हे-मा-जी की हैट्रिक लगवाकर रहेंगे।
बेशक हे-मा-जी 2019 के लोकसभा चुनाव को अपना अंतिम चुनाव घोषित कर चुकी हैं किंतु जनता को यकीन है कि वो अधूरे काम पूरे करने की खातिर जनता जनार्दन की मांग सहर्ष स्‍वीकार करेंगी।
हे-मा-जी भी जानती हैं संसद परिसर तो उनकी कलात्‍मक और चमत्‍कारिक झाड़ू से साफ हो गया किंतु कृष्‍ण की कालिंदी अब तक वो कला देखने को तरस रही है जिससे उसका कलुष धुल सके।
ब्रज की रज भी उनके ”कर कमलों” की प्रतीक्षा कर रही है ताकि वो साफ होकर उड़ सके और लोग फिर से दोहरा सकें कि-
मुक्‍ति कहे गोपाल से मेरी मुक्‍ति बताय।
ब्रज रज उड़ मस्‍तक लगे तो मुक्‍ति मुक्‍त है जाए।।
बहरहाल, अब शायद ही किसी को इस बात में कोई शक रह गया हो कि हे-मा-जी झाड़ू लगाने की कला में न सिर्फ पारंगत हैं बल्‍कि झाड़ू फेरने में भी माहिर हैं।
तभी तो मथुरा से कोई बाहरी प्रत्‍याशी दो बार लोकसभा चुनाव जीतने का जो काम 2014 तक नहीं कर पाया था, वो हे-मा-जी ने 2019 में करके दिखा दिया।
वोटों की ऐसी झाड़ू फेरी कि पहली बार रालोद के युवराज को कहीं का नहीं छोड़ा और दूसरी बार ”महागठबंधन” के कुंवर साहब को धूल चटा दी।
चमत्‍कार को नमस्‍कार करना दुनिया का दस्‍तूर है इसलिए हे-मा-जी को भी नमस्‍कार करना बनता है।
वैसे हे-मा-जी, आपके लिए क्‍या दिल्‍ली और क्‍या मथुरा। ‘सबै भूमि गोपाल की यामे अटक कहां। जाके मन में अटक है सोई अटक रहा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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