क्‍या सीएम योगी आदित्‍यनाथ को फेल करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है?

ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को किसी षड्यंत्र के तहत नौकरशाही ‘फेल’ करने पर आमादा है। चूंकि गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की प्रदेश के प्रति निष्‍ठा एवं नीयत हर संदेह से परे है इसलिए ये आशंका और बलवती हो जाती है।
पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर गौर करें तो साफ-साफ दिखाई देता है कि कहीं कुछ है जो बार-बार कानून-व्‍यवस्‍था को पटरी से उतारने में बड़ी भूमिका अदा करता है।
बात चाहे कानपुर के बिकरू कांड की हो अथवा लैब टेक्‍नीशियन को फिरौती के लिए मार डालने की। आजमगढ़ में प्रधान की हत्‍या से जुड़ी हो या फिर लखनऊ में हुए दोहरे हत्‍याकांड की।
बेशक अपराध तथा अपराधियों को पूरी तरह समाप्‍त किया जाना न कभी संभव था और न कभी होगा परंतु अपराध पर प्रभावी नियंत्रण के लिए अपराधियों के मन में भय बैठाना संभव है, इसे योगी आदित्‍यनाथ ने सत्ता संभालने के कुछ समय बाद करके दिखाया भी था किंतु अब एकबार फिर सब-कुछ पटरी से उतरता नजर आ रहा है। विशेष तौर पर कोरोना का कहर शुरू होने के बाद उपजे हालातों में कानून-व्‍यवस्‍था काफी बदहाल हुई है।
अगर बात करें प्रशासनिक स्‍तर पर हुई घटनाओं की तो नोएडा के तत्‍कालीन जिलाधिकारी की वह हिमाकत इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है जब उन्होंने महामारी की समीक्षा बैठक के दौरान तल्‍ख लहजा अपनाते हुए योगी आदित्‍यनाथ को ही न सिर्फ दोटूक जवाब दे दिया था बल्‍कि साफ तौर पर जिम्‍मेदारी निभाने से इंकार करते हुए अपने हाथ खड़े कर दिए थे।
श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी जैसे पर्व पर प्रदेश के कई हिस्‍सों का अंधेरे में डूब जाना भी अचानक प्रतीत नहीं होता। संभवत: इसीलिए ऊर्जामंत्री ने तत्‍काल दो अधिकारियों को निलंबित कर मुख्‍यमंत्री से जब इस मामले की जांच एसटीएफ को सौंपने का अनुरोध किया तो उन्‍होंने चंद घंटों में यह अनुरोध स्‍वीकार करते हुए जांच एसटीएफ के हवाले कर दी।
बिजली विभाग के पीएफ घोटाले की बात यदि यहां छोड़ भी दी जाए तो अधिकारियों का आपदाकाल में आम जनता के प्रति व्‍यवहार योगीराज की भावनाओं के उलट रहा है। ऑनलाइन बिलिंग में गड़बड़ी और ‘तथाकथित स्‍मार्ट’ मीटरों की खामियों पर पर्दा डालने की कोशिश यह बताती है कि ‘दाल’ में कुछ तो ‘काला’ है।
ऊर्जा मंत्री के गृहजनपद और चुनाव क्षेत्र मथुरा में जहां पहले लाइट कभी जाती नहीं थी वहां अब उसके जाने व आने का कोई समय तय नहीं है। यह हाल तो शहर का है, बाकी गांव-देहात तो कई-कई दिन बिजली को तरसते रहते हैं। जनता अपना गुस्‍सा कभी बिजली कर्मचारियों पर उतारती है तो कभी सड़क जाम करने को खड़ी हो जाती है जबकि कुछ महीनों पहले तक स्‍थिति काफी बेहतर थी, लोग बिजली की आपूर्ति को लेकर संतुष्‍ट थे।
इसी प्रकार इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश के सरकारी अस्‍पताल एक लंबे समय से खुद बीमार हैं और स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के कर्मचारियों की मनमानी जगजाहिर है, परंतु अब जबकि सोशल डिस्‍टेंसिंग जरूरी हो चुकी है तब भी सरकारी अस्‍पतालों में लगी लंबी-लंबी कतारें इसकी गवाह हैं कि किस प्रकार शासनादेशों की बेखौफ धज्‍जियां उड़ाई जा रही हैं।
ये कतारें किसी खास बीमारी के कारण या महामारी की वजह से नहीं लगीं, ये उस अव्‍यवस्‍था के कारण लगी हैं जो सरकारी अस्‍पतालों की पहचान बन चुकी है और जिसमें योगीराज के लगभग 3 साल भी कोई तब्‍दीली नहीं ला सके हैं।
सरकारी अमले के मन में मामूली से मामूली काम के लिए लोगों को दस लोगों के पास चक्‍कर कटवाने की प्रवृत्ति इतनी घर कर चुकी है कि उसके बिना उनके अहम की तुष्‍टि नहीं होती।
प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्‍पताल में आम नागरिक की हैसियत से जाने पर इस प्रवृत्ति को बहुत आसानी के साथ देखा व महसूस किया जा सकता है।
लंबी लाइन में लगने के बाद मरीज को एक कर्मचारी पहले कच्‍ची पर्ची हाथ में थमा देता है, उसके बाद दूसरी लाइन में पर्चा काटा जाता है। फिर एक अन्‍य कर्मचारी रजिस्‍टर में मरीज का नाम चढ़ाकर यह लिखता है कि उसे किस डॉक्‍टर के पास किस कमरे में जाना है। मरीज जब उस डॉक्‍टर के कक्ष तक पहुंचता है तब पता लगता है कि डॉक्‍टर साहब किसी मीटिंग में व्‍यस्‍त हैं अथवा सीएमएस या सीएमओ के पास गए हैं।
अस्‍पताल में उपचार कराने के लिए निर्धारित समय तक यदि डॉक्‍टर साहब लौट आए तो ठीक अन्‍यथा मरीज की किस्‍मत। सरकारी मुलाजिमों की ऐसी निर्दयता देखकर लगता है कि सरकार चाहे किसी की हो, उनके अंदर आमजन की पीड़ा का अहसास कराने में कोई सफल नहीं हुआ क्‍योंकि ‘योगीराज’ में भी स्‍थिति जस की तस है।
पिछले कुछ समय से ड्राइविंग लाइसेंस के रिन्‍यूअल में पचास साल से अधिक की उम्र वाले व्‍यक्‍तियों के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए शुरू किए गए इस नियम का सरकारी अस्‍पताल किस कदर दुरुपयोग कर रहे हैं, इसका पता तभी लगता है जब कोई मेडीकल कराने अस्‍पताल पहुंचता है। आधे दर्जन खिड़कियों एवं कमरों पर चक्‍कर काटने के बाद यदि सरकारी मोहर लगा पर्चा हाथ में आ जाए तो बहुत बड़ी उपलब्‍धि समझिए वर्ना आप आरटीओ व सरकारी अस्‍पताल के बीच फुटबॉल बनकर रह जाएंगे। हो सकता है कि इस सबमें आपका लाइसेंस एक्‍सपायर हो जाए और आपको लेटफीस भी जमा करनी पड़े।
हां, यही काम यदि सरकारी अस्‍पताल में रिश्‍वत देकर कराने पर राजी हैं तो दस मिनट से पहले मेडीकल सर्टिफिकेट आपके हाथ में होगा और सारी औपचारिकताएं बड़े इत्‍मीनान से पूरी हो जाएंगी।
जहां तक सवाल ‘आरटीओ’ का है तो इस विभाग में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार मिटाने के लिए हर पार्टी की सरकार ने तमाम दावे किए, बहुत सारी नई-नई व्‍यवस्‍थाएं कीं लेकिन कोई भ्रष्‍टाचार तो दूर भ्रष्‍टाचार की उस जड़ को भी नहीं मिटा कर सका जो दलालों के रूप में हर आरटीओ की पहचान बन चुकी है और जिनके माध्‍यम से यह विभाग करोड़ों रुपए अतिरिक्‍त प्रति माह कमाता है।
महामारी के दौरान व्‍याप्‍त अन्‍य समस्‍याओं का जिक्र भी जरूरी है। जिनके तहत प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से किए जा रहे करोड़ों रुपए के भ्रष्‍टाचार की कहानियां सामने आने लगी हैं।
ये बात अलग है कि संक्रमण काल में अभी उन पर गौर नहीं किया जा रहा लेकिन कोई सरकारी विभाग ऐसा नहीं है जो मौके का फायदा उठाने में पीछे हो। अपने-अपने हिस्‍से की मलाई सब खा रहे हैं और बंदरबांट कर रहे हैं।
सीएम योगी आदित्‍यनाथ तक ये बातें पहुंच रही हैं या नहीं, इसका तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर पता है कि इसके परिणाम आज नहीं तो कल भाजपा और योगी आदित्‍यनाथ के सामने आगे आने वाले समय में मुश्‍किलें जरूर खड़ी करेंगे।
कहने को योगी आदित्‍यनाथ की सरकार में दो-दो उप मुख्‍यमंत्री भी हैं और श्रीकांत शर्मा जैसे कद्दावर मंत्री भी, लेकिन लगता ऐसा है कि जैसे सारा ठीकरा योगी जी के सिर फोड़ना है या हर विभाग की जिम्‍मेदारी सिर्फ योगी जी की है क्‍योंकि जहां भी सरकार पटरी से उतरती दिखाई देती है वहां हर मोर्चा योगी जी को संभालना पड़ता है।
पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्‍टिंग भी पारदर्शी प्रतीत नहीं होती क्‍योंकि अनेक ऐसे अधिकारी जिम्‍मेदार पदों पर तैनात हैं जिनका दामन कभी साफ नहीं रहा और वो अपनी भ्रष्‍ट कार्यप्रणाली के लिए ही पहचाने जाते हैं।
जाहिर है कि योगी आदित्‍यनाथ के संज्ञान में रहते ऐसा हो पाना संभव नहीं लगता किंतु आम जनता को इन बातों से मतलब नहीं। उसे मतलब है व्‍यवस्‍था के उन अंगों से जिनकी संड़ांध उसे जगह-जगह और प्रत्‍येक मौके पर सूंघनी पड़ती है।
वो इतना जानती है कि गेरुआ वस्‍त्रधारी कोई साधु मठ से निकलकर जब मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुआ था तो उसने वादा किया था कि वह रामराज्‍य न सही लेकिन सुशासन का अहसास जरूर कराएगा।
जनता के बीच उम्‍मीद की ये किरण इतनी बलवती थी कि ‘नोटबंदी’ जैसे निर्णय के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनावों में उसने मोदी के साथ-साथ योगी पर भी पूरा भरोसा जताया और पार्टी को पूरे नंबर दिलवाए।
यूपी के विधानसभा चुनाव 2022 में प्रस्‍तावित हैं। उम्‍मीद की ये किरण पूरी तरह डूबने लगे, इससे पहले जरूरी है कि योगी आदित्‍यनाथ को वो चेहरे चिन्‍हित करने होंगे जो उनकी मंशा को मटियामेट करने में लगे हैं और जिनके कारण योगीराज पर गहरा सवालिया निशान लग जाता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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