चीन के वन बेल्ट वन रोड का जवाब है भारत की वन वर्ल्ड वन सन वन ग्रिड परियोजना

नई दिल्‍ली। ग्लोबल इलेक्टिसिटी ग्रिड के रूप में एक परियोजना का मुख्य विचार यह है कि दुनिया भर में सौर ऊर्जा केंद्रित एक कॉमन ट्रांसमिशन सिस्टम का विकास किया जाए। भारत सरकार ने इस विषय पर सलाहकारी फर्मों के प्रस्तावों को हाल ही में आमंत्रित किया है ताकि एक दीर्घकालिक वैश्विक इलेक्टिसिटी ग्रिड का रोडमैप समावेशी तरीके से तैयार किया जा सके। ऐसी सीमापारीय ऊर्जा परियोजनाओं को दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों, मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर शुरू कर भारत वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की मंशा रखता है। विश्लेषक मानते हैं कि वन वर्ल्ड वन सन वन ग्रिड का विचार भारत ने चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल के तर्ज पर कर चीन को अपनी वैश्विक भूमिका की पहचान कराने के लिए की है।
चीन की वन बेल्ट वन रोड: एक तरफ जहां चीन की वन बेल्ट वन रोड पहल विश्व भर के देशों में अवसंरचनात्मक विकास परियोजनाओं पर केंद्रित है, वहीं भारत की यह योजना सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया भर के देशों के साथ सहयोग पर केंद्रित है। भारत को अपनी क्षमता और सीमाएं पता हैं कि वह किस स्तर तक किसी वैश्विक परियोजना को आगे ले जा सकता है और किस स्तर तक निवेश, कर्ज और अनुदान दे सकता है। यही बात उसे विश्व राजनीति में एक विशेष स्थान भी देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रॉस बॉर्डर सोलर कनेक्टिविटी का विचार अक्टूबर 2019 में दिया था। इस वर्ष भारत ने ग्लोबल इलेक्टिसिटी ग्रिड को मूर्त स्वरूप देने के लिए विश्व बैंक के अधिकारियों के साथ भी वार्ता शुरू कर दी है।
भारत द्वारा वर्ल्ड सोलर बैंक के गठन का प्रस्ताव: भारत ने इसके अलावा एक वर्ल्ड सोलर बैंक के गठन का प्रस्ताव भी किया है जिससे अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के मिशन को पूरा करने के लिए वित्त और प्रौद्योगिकी की लागत में कमी लाई जा सके। यह बैंक कुल 10 बिलियन डॉलर का हो सकता है जिसकी चुकता पूंजी दो बिलियन डॉलर हो सकती है। इस प्रस्तावित सोलर बैंक में भारत की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक हो सकती है। दरअसल, भारत की मंशा है कि ऐसे बैंक का मुख्यालय भारत में ही स्थित हो जिससे इस दिशा में उसे एक प्रभावी बढ़त मिल सके। चीन में ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक के साथ ही एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक का मुख्यालय है। इन बैंकों के काम-काज पर चीन ने निगाह लगा रखी है जिसका उसे फायदा भी मिला है।
चीन विशेषकर अपने लाभों के लिए सोचता है: यदि वर्ल्ड सोलर बैंक का मुख्यालय भारत में स्थापित करने में सफलता प्राप्त हो जाती है तो भारत नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित कर सकेगा और वह भी स्वतंत्र तरीके से। ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक ने हाल ही में घोषणा की है कि उसके कोष का 50 प्रतिशत या उससे भी अधिक नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया जाएगा लेकिन इस संदर्भ में ब्रिक्स के सदस्यों चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की भी भूमिकाएं इस बैंक में निर्धारित हैं और चूंकि चीन विशेषकर अपने लाभों के लिए सोचता है, ऐसे में भारत इंटरनेशनल सोलर अलायंस और वर्ल्ड सोलर बैंक के जरिये तीसरी दुनिया के देशों में ऊर्जा सुरक्षा प्रदाता की अपनी भूमिका स्वतंत्र तरीके से बिना किसी हस्तक्षेप के निभा सकता है।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस ने 2030 तक सौर ऊर्जा संसाधनों और प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए एक हजार बिलियन डॉलर के निवेश को आकर्षति करने का लक्ष्य तय कर रखा है। इस दृष्टिकोण से वल्र्ड सोलर बैंक के गठन में सफलता मिलना भारत के लिए लाभदायक है। इससे ग्लोबल इलेक्टिसिटी ग्रिड की योजना में सहायता मिलेगी और इसलिए यह विचार किया गया है कि इस बैंक से म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम जैसे देशों को भारतीय उपमहाद्वीप से जोड़ा जाए और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे को भारतीय राजनय को प्रभावी बनाने के उपकरण के रूप में देखा जा सके।
प्रस्तावित इलेक्टिसिटी ग्रिड और सोलर बैंक के जरिये सधता भारतीय हित: दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत की कई अवसंरचनात्मक विकास और ऊर्जा परियोजनाएं चल रही हैं। भारत, म्यांमार और थाईलैंड के बीच बनने वाले त्रिपक्षीय राजमार्ग को वियतनाम, लाओस और कंबोडिया तक विस्तारित करने का निर्णय लिया जा चुका है। वहीं म्यांमार के साथ भारत का कलादान मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है, और मेकोंग गंगा पहल के जरिये भी भारत और आसियान देशों के मध्य संबंधों को मजबूती दी जा रही है। इन स्थितियों में भारत अपनी प्रस्तावित ऊर्जा कूटनीति के जरिये आसियान के साथ अधिक मजबूत संबंधों की नींव रखते हुए अपनी नवोदित एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकता है। एशिया प्रशांत क्षेत्र में अबाधित व्यापारिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण राष्ट्रों को अपने पक्ष में जोड़ने के उपाय भारत को करने होंगे। वैसे भी दक्षिण पूर्वी एशियाई देश चीन की अतिक्रमण राजनीति से परेशान है अत: सौर ऊर्जा परियोजनाओं से आसियान देशों को जोड़ने का विचार भारत के लिए कई मायनों में सार्थक साबित हो सकता है।
इसी प्रकार भारत ने सौर ऊर्जा के मुद्दे पर अफ्रीकी देशों को भी लामबंद करने की कोशिश शुरू कर दी है। कई अफ्रीकी देश भारत के नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस के सदस्य हैं, वहीं दूसरी तरफ चीन ने अफ्रीकी देशों को अपने एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक के साथ जोड़ने में हाल में सक्रियता दिखाई है। पिछले वर्ष ही बेनिन, रवांडा और जिबूती को चीन के नेतृत्व वाले इस बैंक का सदस्य बनाया गया है। वर्तमान विश्व व्यवस्था में अपने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के लिए कोई भी तरीका राष्ट्रों द्वारा अपनाया जा सकता है। चाहे ऊर्जा कूटनीति हो, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या अन्य निवेश हो, ऋण और अनुदान देकर राष्ट्रों को कृपा पात्र बनाना हो, ऐसे तरीकों से राष्ट्र अपने हितों को सिद्ध करने में लगे रहते हैं। भारत ने भी इन तरीकों पर अमल कर विश्व और क्षेत्रीय राजनीति में अपने व्यापक उद्देश्यों को प्राप्त करने की कवायद शुरू कर दी है। चीन ने अपनी वन बेल्ट वन रोड पहल के तहत विश्व के देशों में पावर ग्रिड का नेटवर्क बिछाने, तेल और प्राकृतिक गैसों के लिए गहरे समुद्री बंदरगाहों का नेटवर्क बनाने पर जोर देना शुरू किया है। ऐसे में भारत के लिए भी यह जरूरी था कि वह इस दिशा में कार्य करे। भारत ने जापान के साथ मिलकर अफ्रीकी महाद्वीप में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का गठन इसी उद्देश्य के साथ किया है।
भारत ने हाल ही में वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड की संकल्पना को मजबूती देते हुए एक ग्लोबल इलेक्टिसिटी ग्रिड के निर्माण का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रलय ने पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया समेत दुनिया के 140 से अधिक देशों के मध्य सौर ऊर्जा संसाधनों के साझा करने के मुद्दे पर वैश्विक सर्वसम्मति बनाने की योजना तैयार की है। इस परियोजना के जरिये निश्चित तौर पर भारत ऊर्जा कूटनीति की नई पहल करता दिख रहा है। भारत ने पड़ोसी देशों के साथ भी सीमापारीय ऊर्जा गलियारों के निर्माण पर जोर दिया है। बांग्लादेश में मैत्री सुपर थर्मल पावर प्लांट, रामपाल पावर प्लांट, नेपाल और भारत के बीच मोतिहारी से अमलेखगंज तक सीमापारीय तेल पाइपलाइन की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई है। भारत ने ग्लोबल इलेक्टिसिटी ग्रिड के समान ही पड़ोसी देशों के साथ मिलकर एक रीजनल पॉवर ग्रिड पर भी योजना बनाई है ताकि इसके जरिये भूटान, नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ श्रीलंका जैसे देशों को भी ऊर्जा आपूर्ति की जा सके। क्रॉस बॉर्डर इलेक्टिसिटी ट्रेड भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान पा चुका है।
नवंबर 2014 में भारत ने सार्क देशों के साथ इस संदर्भ में एक समझौते पर हस्ताक्षर भी किया था और अगस्त 2018 में बिम्सटेक देशों के साथ ऐसे ही इलेक्टिक ग्रिड के लिए ज्ञापन समझौते पर हस्ताक्षर किया गया था। इसके अलावा अपनी सौर ऊर्जा कूटनीति को बढ़ाते हुए भारत सरकार ने अफ्रीका में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए रियायती ब्याज दरों पर दस अरब डॉलर की कर्ज सुविधा का भी प्रावधान किया है। भारत का आयात निर्यात बैंक आइएसए के सदस्य देशों के साथ मिलकर इस कर्ज सुविधा को लागू कर रहा है। भारत ने 24 सितंबर, 2019 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक सत्र के दौरान प्रशांत द्वीपीय क्षेत्र के विकासशील देशों को उनके यहां सौर ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु से संबधित परियोजनाओं के लिए 12 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अनुदान तथा रियायती दरों पर 150 मिलियन डॉलर कर्ज सुविधा की घोषणा की थी।
सौर ऊर्जा में भारत की राहें: भारत सरकार ने 2022 के आखिर तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें से 60 गीगावॉट पवन ऊर्जा से, 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा से, 10 गीगावॉट बायोमास ऊर्जा से तथा पांच गीगावॉट लघु पनबिजली से शामिल है। इस विजन को गति देने के लिए इस क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल देना भारत की ताíकक सोच को दर्शाता है। ग्रिड कनेक्टेड नवीकरणीय ऊर्जा के तहत पिछले साढ़े तीन वर्षो के दौरान 27 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा का क्षमता संवर्धन किया गया है जिसमें सौर ऊर्जा से 12.8 गीगावॉट, पवन ऊर्जा से 11.7 गीगावॉट, लघु पनबिजली से 0.59 गीगावॉट तथा जैव ऊर्जा से 0.79 गीगावॉट शामिल है। स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की वृद्धि दर से उत्साहित होकर भारत सरकार ने लक्षित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान पर संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संरचना सम्मेलन को प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में कहा है कि भारत प्रौद्योगिकी के अंतरण एवं हरित जलवायु निधि समेत निम्न लागत अंतर्राष्ट्रीय वित्त की सहायता से 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों से 40 प्रतिशत संचयी बिजली ऊर्जा क्षमता अर्जति करेगा।
इस प्रकार भारत ने विश्व समुदाय को संदेश दिया है कि वह सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े-बड़े दावे और वादे करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावी स्तर पर जीवाश्म ईंधन से लड़ाई लड़ते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनी ऊर्जा सुरक्षा का वास्तविक आधार बनाने के लिए सक्रिय भी है। अब भारत को यह देखना है कि सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा के जिन बड़े लक्ष्यों को उसने तय किया है उसके मार्ग की वास्तविक बाधाओं जैसे वित्तीय व्यवस्था समेत तकनीक हस्तांतरण के लिए भी उपयुक्त रणनीति बनानी होगी, साथ ही स्वदेशी सौर प्रौद्योगिकी के विकास पर बल देना होगा।
-एजेंसियां

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