रूस और चीन के बिना UNSC में भारत को मिली बड़ी कामयाबी

अफगानिस्‍तान पर तालिबान के कब्‍जे के बाद अपने हितों की रक्षा करने की दिशा में भारत को बड़ी कामयाबी मिली है। उसकी अध्‍यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद UNSC ने तालिबान पर प्रस्‍ताव पारित किया है। प्रस्‍ताव कहता है कि अफगानिस्‍तान की जमीन का इस्‍तेमाल आतंकियों को शरण देने के लिए नहीं होगा। यह इसलिए अहम है क्‍योंकि तालिबान के उभरने पर पाकिस्‍तान समर्थ‍ित आतंकी समूहों के और मजबूत होने का खतरा है, जो भारत के लिए चिंता की बात है।
लश्‍कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्‍मद की गतिविधियां तेज होने के खुफिया इनपुट्स के बीच तालिबान पर एक तरह से पूरी दुनिया का दबाव बना दिया गया है। UNSC प्रस्‍ताव के जरिए अफगानिस्‍तान में फंसे भारतीयों को सकुशल वापस लाने से जुड़ी चिंताओं को भी दूर करने की कोशिश हुई है। अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय चाहता है कि तालिबान ने शांति और सुरक्षा से जुड़े जो वादे किए हैं, उन पर वह खरा उतरे।
भारत ने साफ रख दी अपनी बात
न्‍यूज़ एजेंसी PTI ने मामले से जुड़े भारतीय सूत्रों के हवाले से कहा कि UNSC प्रस्‍ताव को पारित कराने में भारत की अहम भूमिका रही। ‘इस वक्‍त’ अफगानिस्‍तान को लेकर भारत की जो भी चिंताए हैं, उन्‍हें इस प्रस्‍ताव में एड्रेस किया गया है। एक सूत्र ने कहा कि “बतौर UNSC अध्‍यक्ष, भारत ने महसूस किया कि हालात की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षा परिषद को एक प्रस्‍ताव पारित करना चाहिए।” भारतीय डिप्‍लोमेट्स पिछले कुछ दिनों से UNSC के प्रमुख सदस्‍यों के लगातार संपर्क में रहे हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी समकक्ष एंटनी ब्लिंकन की बातचीत में भी यह मसला उठा था।
UNSC में वोटिंग से रूस और चीन ने बनाई दूरी
सुरक्षा परिषद ने अफगानिस्‍तान में तालिबान के शासन को मान्‍यता दे दी है। फ्रांस, यूके और अमेरिका की तरफ से पेश प्रस्‍ताव का भारत समेत कुल 13 देशों ने समर्थन किया। विपक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा। हालांकि वीटो पावर रखने वाले रूस और चीन ने वोटिंग में हिस्‍सा नहीं लिया। इन दोनों देशों का तालिबान के साथ मजबूत गठजोड़ बनता दिख रहा है। चीन और तालिबान के बीच तो काबुल में राजनयिक स्‍तर की बातचीत भी हो चुकी है।
अमेरिका के खिलाफ चीन और रूस की गोलबंदी!
UN में रूस की राजदूत वैसिली नेबेंजिया ने कहा कि उनका देश वोटिंग से दूर रहने पर ‘मजबूर’ हो गया क्‍योंकि ‘ड्राफ्ट तैयार करने वालों ने हमारी मूल चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया था।’ उन्‍होंने कहा कि प्रस्‍ताव में आतंकी खतरे को लेकर पर्याप्‍त स्‍पष्‍टता नहीं थी। इसके अलावा अफगानों को निकालने से वहां होने वाले ‘ब्रेन ड्रेन’ पर कोई बात नहीं की गई। इसके अलावा तालिबानी नियंत्रण के बाद अमेरिका के अफगान सरकार के खातों को बंद करने के आर्थिक और मानवीय प्रभावों पर भी प्रस्‍ताव में कुछ नहीं है।
चीन ने भी रूस जैसी ही चिंताएं सामने रखीं। चीन ने एक ड्रोन हमले में कुछ नागरिकों के मारे जाने को लेकर अमेरिका की निंदा की जिसे लेकर अमेरिका ने कहा था कि हमला इस्‍लामिक स्‍टेट के लड़ाकों को उड़ाने के लिए था। बीजिंग ने कहा कि अभी जो अफरातरफरी मची है वह पश्चिमी देशों के ‘जल्‍दबाजी में निकलने’ की वजह से है।
तालिबान से क्‍या चाहती है दुनिया?
पारित प्रस्‍ताव में मांग की गई है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकी देने या आतंकवादियों को पनाह देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। प्रस्ताव में उम्मीद जताई गई है कि तालिबान अफगानों और सभी विदेशी नागरिकों के देश से सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से जाने देने के संबंध में अपने वादों पर खरा उतरेगा।
वादे तोड़े तो क्‍या सजा मिलेगी, नहीं पता
सुरक्षा परिषद के प्रस्‍ताव में पांच बार तालिबान का जिक्र हुआ मगर उसकी निंदा नहीं की गई। प्रस्‍ताव में तालिबान को उसके ‘वादे’ याद दिलाए गए जिनमें उसने ‘अफगानिस्‍तान से अफगान और सभी विदेशी नागरिकों के सुरक्षित और समयबद्ध निकासी’ की बात कही थी। सुरक्षा परिषद ने इंसानी मदद, मानवाधिकारों, राजनीतिक स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर भी तालिबान से अपनी अपेक्षाएं बता दी हैं। हालांकि प्रस्‍ताव में यह नहीं बताया गया है कि अगर तालिबान अपने वादों से मुकरा तो क्‍या सजा दी जाएगी।
-एजेंसियां

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