OSOWOG से ड्रेगन को तगड़ा झटका देगा भारत, बोरिस जॉनसन के साथ बाकी राष्‍ट्राध्‍यक्षों के सामने पीएम मोदी करेंगे लॉन्‍च

नई दिल्‍ली। भारत और यूनाइटेड किंगडम मिलकर ‘ग्रीन ग्रिड्स इनिश‍िएटिव-वन सन वन वर्ल्‍ड वन ग्रिड’ (GGI-OSOWOG) लॉन्‍च करने वाले हैं। इस पहल की घोषणा तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। लॉन्चिंग के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्‍त राष्‍ट्र जलवायु परिवर्तन कॉन्‍फ्रेंस के 26वें सत्र (COP26) में हिस्‍सा लेंगे। नवंबर के पहले हफ्ते में ग्‍लासगो में होने वाली इस कॉन्‍फ्रेंस में दुनियाभर के नेताओं का सम्‍मेलन भी होगा। पीएम मोदी अपने ब्रिटिश समकक्ष बोरिस जॉनसन के साथ बाकी राष्‍ट्राध्‍यक्षों के सामने OSOWOG लॉन्‍च करेंगे। सामने बैठे नेताओं में अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडन, ऑस्‍ट्रेलियाई पीएम स्‍कॉट मॉरिसन व अन्‍य ताकतवर नेता होंगे। कई ग्‍लोबल पॉलिसी एक्‍सपर्ट्स इसे चीन के ‘बेल्‍ट एंड रोड’ (B&R) इनिशिएटिव के भारतीय जवाब की तरह देख रहे हैं।
क्‍या है ‘वन सन, वन वर्ल्‍ड, वन ग्रिड’?
पीएम मोदी की इस पहल के पीछे मूल विचार यह है क‍ि ‘सूरज कभी अस्‍त नहीं होता।’ दुनिया के किसी न किसी कोने तक उसकी रोशनी पहुंचती ही रहती है। इसका इस्‍तेमाल विभिन्‍न इलाकों में बड़े पैमाने पर सोलर एनर्जी तैयार करने में हो सकता है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA)के अनुसार OSOWOG के जरिए एक ऐसी ग्रिड विकसित की जाएगी जो क्षेत्रीय सीमाओं के परे होगी। यह ग्रिड दुनियाभर से समेटी गई सौर ऊर्जा को अलग-अलग लोड सेंटर्स तक पहुंचाएगी।
इस पहल का नेतृत्‍व ISA, भारत सरकार और वर्ल्‍ड बैंक कर रहे हैं। तीनों के बीच एमओयू साइन हो चुका है। पीएम मोदी की इस पहल को जलवायु परिवर्तन के लक्ष्‍यों को पूरा करने की दिशा में गेमचेंजर कहा जा रहा है। न्‍यू एंड रीन्‍यूएबल एनर्जी मिनिस्‍ट्री ने जो ड्राफ्ट तैयार किया है, उसके अनुसार OSOWOG के जरिए 140 देशों को एक कॉमन ग्रिड से जोड़ा जाएगा।
तीन चरणों में लागू किया जाएगा OSOWOG
पहले चरण में भारतीय ग्रिड्स को मिडल ईस्‍ट, साउथ एशिया और साउथ-ईस्‍ट एशिया की ग्रिड्स से जोड़ा जाएगा।
दूसरे चरण में उन्‍हें अफ्रीकन पावर पूल्‍स से जोड़ा जाएगा।
तीसरे चरण में पावर ट्रांसमिशन ग्रिड को ग्‍लोबली कनेक्‍ट किया जाएगा।
ये आपस में सोलर और अन्‍य रीन्‍यूएबल एनर्जी साझा करेंगे।
मकसद होगा कि पीक डिमांड के समय बिजली की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
OSOWOG की जरूरत क्‍या है, क्‍या साकार हो सकेगा सपना?
हमारे परंपरागत ऊर्जा स्‍त्रोत तेजी से खत्‍म हो रहे हैं, ऐसे में हमें उन स्‍त्रोतों का दोहन करने की जरूरत है जो रीन्‍यूएबल हों। सूरज की रोशनी इसके लिए सबसे मुफीद है। इससे जलवायु परिवर्तन का खतरा तो कम होता ही है, अन्‍य प्राकृतिक संसाधन भी बचाए जा सकते हैं। सोलर एनर्जी का पूरा फायदा उठाने की कोशिश भारत के अलावा कई देश कर रहे हैं। ऑस्‍ट्रेलिया की एक कंपनी पहले सिंगापुर में और बाद में इंडोनेशिया में सोलर एनर्जी सप्‍लाई करने की योजना बना रही है। कंपनी दुनिया के सबसे बड़ा सोलर फार्म (4,500 किलोमीटर) में सबसे बड़ी बैटरी बना रही है। हालांकि महाद्वीपों के बीच पावर इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर खड़ा करने की यह पहली कोश‍िश है।
क्‍या चुनौतियां आ सकती हैं?
B&R की तरह OSOWOG भी बेहद खर्चीला, जटिल और धीमी रफ्तार से चलने वाला प्रोजेक्‍ट होगा। सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि अगर सदस्‍य देशों के बीच खटपट हुई तो ग्रिड के रणनीतिक फायदे खतरे में आ सकते हैं। मतलब किसी द्विपक्षीय विवाद का असर महाद्वीपों तक पहुंच सकता है, ऐसे में कई देश जुड़ने से कतरा सकते हैं। तकनीकी रूप से बड़ी दिक्‍कत यह भी है कि अलग-अलग क्षेत्रों में वोल्‍टेज, फ्रीक्‍वेंसी और ग्रिड की स्‍पेसिफिकेशंस अलग हैं। केवल रीन्‍यूएबल एनर्जी बनाकर ग्रिड को स्थिर रख पाना बड़ा मुश्किल होगा।
चीन के बढ़ते प्रभाव को कुंद कर सकता है OSOWOG!
OSOWOG का एक पहलू और है। चीन जैसे कई देशों ने दूसरे देशों में इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स शुरू किए हैं जिन्‍हें एक्‍सपर्ट्स विस्‍तारवादी रवैये की तरह देखते हैं। भारत ज्‍यादातर व्‍यापारिक संधियों का हिस्‍सा है मगर ISA और OSOWOG के जरिए वह नेतृत्‍व करने की स्थिति में आना चाहता है। भू-राजनैतिक दृष्टि से, यह रणनीति चतुर कही जा सकती है मगर तकनीक के लिहाज से अभी इसे परखना बाकी है। बैटरी और स्‍टोरेज टेक्‍नोलॉजी सस्‍ती हो रही है, ऐसे में सोलर पावर के कद्रदान बढ़ रहे हैं मगर पैनल्‍स लगाने के लिए पर्याप्‍त जमीन की कमी और सूरज की रोशन का कुछ ही घंटों तक एक जगह पर टिक पाना दिक्‍कतें पैदा कर सकता है।
सोलर पावर में भारतीय और चाइनीज कंपनियों के बीच बढ़ा टकराव
कई अफ्रीकी देशों में बिजली सप्‍लाई की ठीक व्‍यवस्‍था नहीं है और वहां पर ऐसे इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर का बाजार है। ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्‍टम्‍स ने केन्‍या जैसे कई देशों में तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। कई अफ्रीकी देशों में चीनी कंपनियां पहले से ही मौजूद हैं। भारत ने पहल तो की है मगर बड़े पैमाने पर निवेश अब भी नहीं किया है। OSOWOG के जरिए इसी कमी को पूरा करने की तैयारी है।
-एजेंसियां

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