मोदी-1 में असहिष्‍णुता तो मोदी-2 में लिंचिंग: फिर लामबंद हुआ एक तबका, पीएम को चिठ्ठी लिखी

नई दिल्‍ली। 2014 में जब नरेन्‍द्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभाली थी तब देखते ही देखते असहिष्‍णुता को मुद्दा बनाकर देश के एक खास तबके ने न सिर्फ अवार्ड वापसी की मुहिम शुरू कर दी थी बल्‍कि यह भी कहा जाने लगा था कि भारत में अब कोई सुरक्षित नहीं है।
हालांकि कुछ समय बाद अवार्ड वापसी की मुहिम और असहिष्‍णुता दोनों ठंडे बस्‍ते में समा गए।
2019 में मोदी सरकार की जबर्दस्‍त वापसी हुई है तो अब लिंचिंग को मुद्दा बनाया जा रहा है।
इसी मुद्दे के तहत मॉब लिंचिंग की घटनाओं और जय श्रीराम नारे के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए अलग-अलग क्षेत्रों से जुडे़ 49 नामचीन लोगों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी है। चिट्ठी में अपर्णा सेन, कोंकणा सेन शर्मा, रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप, शुभा मुद्गल जैसों के हस्ताक्षर हैं। इन लोगों ने पीएम को संबोधित करते हुए चिट्ठी में लिखा है कि देश भर में लोगों को जय श्रीराम नारे के आधार पर उकसाने का काम किया जा रहा है लिहाजा दलित, मुस्लिम और दूसरे कमजोर तबकों की मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की गई है।
‘लिंचिंग की घटनाओं में वृद्धि से दुखी हैं’
चिट्ठी में लिखा गया, ‘आदरणीय प्रधानमंत्री… मुस्लिम, दलित और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की लिंचिंग तत्काल प्रभाव से बंद होनी चाहिए। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देख हम हैरान हैं। एनसीआरबी के डेटा के अनुसार दलितों के साथ 2016 में 840 हिंसक घटनाएं हुईं। इन अपराध में शामिल लोगों को दोषी करार देने के आंकड़े में भी कमी आई है।’
‘लिंचिंग रोकने के लिए आपकी निंदा करना पर्याप्त नहीं’
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कानून की मांग पत्र में की गई। पत्र में लिखा गया, ‘आपने संसद में लिंचिंग की घटना की निंदा की थी लेकिन वह काफी नहीं है। हम सभी को ऐसा मजबूती से लगता है कि इस तरह के अपराधों को गैर-जमानती बनाया जाए।’ झारखंड में 24 साल के शख्स की लिंचिंग की प्रधानमंत्री मोदी ने जून में निंदा की थी।
जय श्री राम नारे का इस्तेमाल लिंचिंग के लिए हो रहा
पत्र में जय श्रीराम के नारे के दुरुपयोग पर भी चिंता जाहिर की गई है। पत्र के अनुसार, ‘बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन दिनों जय श्रीराम का नारा युद्ध उन्माद जैसा बनता जा रहा है। कानून और व्यवस्था तोड़ने के लिए और बहुत बार लिंचिंग के वक्त भी इसी नारे का प्रयोग किया जा रहा है। यह देखना हैरान करने वाला है कि धर्म के नाम पर ऐसा किया जा रहा है। राम के नाम पर ऐसे अपराध को अंजाम देने की घटनाएं रोकना जरूरी है।’
‘सरकार की आलोचना का अर्थ देश की आलोचना नहीं’
विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले 49 लोगों ने पत्र में लिखा कि देश की सत्ताधारी पार्टी की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। किसी भी देश की सत्ताधारी पार्टी उस राष्ट्र के समानांतर नहीं हो सकती। सत्ताधारी पार्टी देश की बहुत सी पार्टियों में से ही एक पार्टी भर होती है। सरकार के खिलाफ लिए जाने वाले कदम को राष्ट्र के खिलाफ उठाया कदम नहीं करार दिया जा सकता।’
-एजेंसियां

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