C. A. मुकुल शर्मा की एक दोस्‍त को काव्‍यात्‍मक श्रद्धांजलि

Mukul-Sharma-Chartered-accountant

खबर नहीं थी ऐसे चले जाओगे,
उम्मीद थी शुभ रात्रि, शब्बा-खैर तो कह कर जाओगे।

अभी तो कितने अधूरे किस्से थे सुनने-सुनाने,
कितने हंसी ठहाके थे लगाने।
कुछ बातें रह गयीं अधूरी जो सुनानी थीं,
कुछ महफ़िलें रह गयीं अधूरी जो जमानी थीं।

एक बार तो दिल खोला होता,
एक बार तो हालेद‍िल बयाँ किया होता।
इस तरह हमको ना बेगाना समझा होता,
दोस्त ना सही, जान पहचान वाला समझ लिया होता।

जब साथ थे तो क़द्र ना की,
अब साथ नहीं तो क़द्र महसूस की।

यह वक्त भी गुजर जाता, यह दर्द भी मिट जाते,
तूफ़ान भी थम जाता, हरि‍याली लौट आती।
इतनी भी क्या थी जल्दी जाने की,
थोड़ा तो इन्तज़ार किया होता।

तुमने तो वो राह पकड़ ली ए दोस्त,
जिस पर ना महफ़िलें मिलेंगी ना दोस्त।
बस अकेले ही चलते जाना है,
खबर ना थी ऐसे चले जाओगे।

– मुकुल शर्मा, C. A.
मथुरा

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