भारत और अमेरिका साथ आ जाएं तो चीनी चुनौतियों का सामना आसान: निकोल बर्न्स

चीन में अमेरिकी राजदूत पद के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन के नामित उम्मीदवार निकोलस बर्न्स (#NicholasBurns) ने कहा है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और अमेरिका अपने हितों को देखते हुए साथ आ जाएं तो इससे चीनी चुनौतियों को “बहुत फ़र्क़ पड़ेगा”.
ये बातें उन्होंने तब कहीं जब उनसे चीन का सामना करने की कोशिश कर रहे देशों के साथ आने से जुड़े अवसरों और चुनौतियों के बारे में एक सवाल पूछा गया.
रिपोर्ट के अनुसार निकोलस बर्न्स से बाइडन की उस बात को दुहराया जिसमें उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, थाइलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों के बीच समझौते पर आधारित साझेदारी पर ज़ोर दिया था.
बर्न्स ने कहा, “चीन की तुलना में हमारे पास जो पक्ष मज़बूत है वो यह है कि हमारे पास सहयोगी हैं. हमारे पास ऐसे सहयोगी देश हैं जिन्हें हम पर पूरा विश्वास है जबकि चीन के पास असल में ऐसे सहयोगी नहीं है.”
निकोलस बर्न्स ने यह भी कहा कि भारत अमेरिका का सहयोगी देश ही नहीं बल्कि ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ भी है.
चीन बनाम बाकी देश
निकोलस बर्न्स ने कहा, “जैसा कि आपको मालूम है और मैं भी मानता हूँ- पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के समय से हर अमेरिकी प्रशासन इस पर काम कर रहा है- हमें भारत के रूप में एक नया रक्षा सहयोगी मिला है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और अमेरिका के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क पड़ता है.”
एक राजनयिक के रूप में निकोलस बर्न्स की भारत-अमेरिकी सम्बन्धों को मज़बूत करने में अहम भूमिका रही है. उन्होंने अमेरिका और भारत के बीच हुए परमाणु समझौते में भी प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी.
निकोलस बर्न्स रिपबल्किन और डेमोक्रैट दोनों ही प्रशासनों में अहम पगों पर रहे हैं. मौजूदा समय में वो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के जॉन एफ़ कैनेडी स्कूल ऑफ़ गर्वन्मेंट में प्रोफ़ेसर हैं.
हाल के दिनों में चीन की आक्रामकता का सामना करने के लिए दुनिया के कई देश एकजुट हुए हैं. क्वाड समूह इसी का एक उदाहरण है जिसमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं.
इसके अलावा हाल ही में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा साझेदारी को लेकर ऑकस समझौता भी हुआ था.
-एजेंसियां

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