सूर्य ग्रहण के समय कैसे करें नियमों का पालन व क्या होगा राशियों पर प्रभाव

नई द‍िल्ली। आषाढ अमावस्या, 21.6.2020, रविवार को भारत के राजस्थान, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तराखंड के कुछ प्रदेशों में सवेरे लगभग 10 बजे कंकणा कृति सूर्य ग्रहण दिखाई देगा तथा शेष संपूर्ण भारत में यह सूर्य ग्रहण खंडग्रास दिखाई देगा । सूर्य व पृथ्वी के मध्य भाग में चंद्रमा आने से चंद्र की छाया पृथ्वी पर पडती है । वह जिस भाग में पडती है, वहां से उतने समय तक चंद्र बिंब के कारण सूर्य बिंब ढंका हुआ दिखाई देता है। सूर्य बिंब पूर्ण रूप में ओझल होने पर खग्रास सूर्य ग्रहण तथा सूर्य बिंब आंशिक रूप से ढंक गया, तो वह खंडग्रास सूर्य ग्रहण होता है। सूर्य बिंब कंगन के (स्त्रियों के कंगन की भांति) आकार में ढंक गया, तो दिखाई देनेे वाले ग्रहण को कंकणा कृति ग्रहण कहते हैं । कंकणा कृति सूर्य ग्रहण में सूर्य पूर्ण रूप से ढंका हुआ नहीं दिखाई देता; बल्कि सूर्य के बाहर का भाग कंगन की भांति चमकता है । सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या को ही पडता है । महर्षि अत्रि मुनि ग्रहण के संबंध में ज्ञान देने वाले पहले शिक्षक थे ।

भारत में सर्वत्र दिखाई देनेवाले सूर्य ग्रहण के समय

यह ग्रहण भारत सहित संपूर्ण एशिया उप महाद्वीप, दक्षिणी यूरोप के कुछ प्रदेश तथा ऑस्ट्रेलिया के उत्तर के प्रदेशों में दिखेगा । साथ में दिए गए भारत के मानचित्र में समाहित छायांकित किए राजस्थान, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तराखंड के कुछ प्रदेशों में कंकणाकृति स्थिति देखने को मिलेगी । शेष संपूर्ण भारत में यह ग्रहण खंडग्रास ग्रहण दिखाई देगा। यह ग्रहण 21.6.2020 के सवेरे 10.01 से लेकर दोपहर 1.28 बजे तक है ।

सूर्यग्रहण के समय

1. स्पर्श(आरंभ) : 21.6.2020 को सवेरे 10.01 बजे

2. मध्य : 21.6.2020 को सवेरे 11.38 बजे

3. मोक्ष(अंत) : 21.6.2020 को दोपहर 1.28 बजे

4. ग्रहण पर्व(ग्रहण आरंभ से अंत तक की अवधि) : 3 घंटे 27 मिनट

पर्व का अर्थ

पुण्य काल है । ग्रहण स्पर्श से ग्रहण मोक्ष तक का काल पुण्य काल है । शास्त्रों में बताया गया है कि इस समय ईश्‍वर के आंतरिक सान्निध्य में रहने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है ।

ग्रहण का सूतक लगना

अवधि : यह सूर्यग्रहण दिखाई देने के समय दूसरा प्रहर होने से शनिवार 20.6.2020 को रात के 10 बजे से ग्रहण मोक्ष तक अर्थात 21.6.2020 को दोपहर 1.28 बजे तक सूतक का पालन करें । (एकप प्रहर 3 घंटे का होता है । दिन के 4 और रात के 4 प्रहर मिलकर दिन में कुल 8 प्रहर होते हैं ।)

सूर्यग्रहण की अवधि में पालन करने हेतु नियम

सूतककाल में स्नान, देवता पूजन, नित्यकर्म, जप एवं श्राद्ध कर्म किए जा सकेंगे । सूतककाल में भोजन करना निषिद्ध है; इसलिए अन्नपदार्थ न खाएं; परंतु आवश्यक कृतियाँ जैसे पानी पीना, मल-मूत्रोत्सर्ग एवं विश्राम करना जैसे कर्म किए जा सकते हैं । ग्रहण पर्व काल में (सवेरे 10.01 से दोपहर 1.28 की अवधि में) पानी पीना, मल-मूत्रोत्सर्ग तथा सोना, ये कर्म निषिद्ध होने से वह न करें । बच्चे, निर्बल और बीमार व्यक्ति, तथा गर्भवती महिलाएं 21.6.2020 को प्रातः 4.45 बजे से लेकर ग्रहणमोक्ष तक सूतक का पालन करें ।

स्वास्थ्य की दृष्टि से सूतकनियम पालन का महत्त्व

1. शारीरिक एवं भौतिक स्तर : सूतककाल में जीवाणुओं के बढने से अन्न शीघ्र दूषित होता है । जिस प्रकार रात का अन्न दूसरे दिन बासी हो जाता है, उस प्रकार ग्रहण के पूर्व का अन्न ग्रहण के पश्‍चात बासी हो जाता है । केवल दूध और पानी के लिए यह नियम लागू नहीं है । ग्रहण से पूर्व के दूध और पानी का उपयोग ग्रहण समाप्त होने के उपरांत भी किया जा सकता है ।

2. मानसिक स्तर : सूतककाल में मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है । इससे कुछ व्यक्तियों में निराशा आना, तनाव बढना आदि मानसिक कष्ट होते हैं, ऐसा मनोविकार विशेषज्ञ बताते हैं । ग्रहणकाल में की गई साधना का फल हजारों गुना मिलता है । इसलिए ग्रहण काल में साधना को प्रधानता देना महत्त्वपूर्ण है । सूतकारंभ से लेकर ग्रहण समाप्त होने तक नामजप, स्तोत्रपरायन, ध्यान धारणा आदि धार्मिक कार्यों में मन को संलिप्त रखने से उसका लाभ मिलता है ।

ग्रहणकाल में वर्ज्यावर्ज्य कृत्य

वर्ज्य कृत्य : ग्रहणकाल में (पर्वकाल में) नींद लेना, मल-मूत्रविसर्जन, साभ्यंग (संपूर्ण शरीर को गुनगुना तेल लगाकर शरीर में उसके रमने तक मर्दन करना), भोजन, खाना-पीना और काम संबंधी सेवन जैसे कर्म नहीं करने चाहिए ।

कौन से कर्म करने चाहिए

1. ग्रहण स्पर्श होते ही स्नान करना चाहिए ।

2. पर्वकाल में देवतापूजन, तर्पण, श्राद्ध, जाप, होम एवं दान दें ।

3. पहले कुछ कारणवश खंडित हुए मंत्र के पुरश्‍चरण का आरंभ इस अवधि में करने से उसका अनंत गुना लाभ मिलता है ।

4. ग्रहण मोक्ष के पश्‍चात स्नान करना चाहिए । किसी व्यक्ति के लिए अशौच हो, तो ग्रहणकाल में ग्रहण से संबंधित स्नान एवं दान देने तक शुद्धि होती है ।

राशियों के अनुरूप ग्रहण का फल

1. शुभ फल : मेष, सिंह, कन्या एवं मकर

2. अशुभ फल : मिथुन, कर्क, वृश्‍चिक एवं मीन

3. मिश्र फल : वृषभ, तुला, धनु एवं कुंभ

जिन राशियों के लिए अशुभ फल है, वे और गर्भवती महिलाएं यह सूर्यग्रहण न देखें ।

सूर्यग्रहण देखते समय बरती जानेवाली आवश्यक सावधानी

कंकणा कृति एवं खंडग्रास सूर्यग्रहण देखते समय ग्रहण देखने के लिए तैयार किए गए विशेष उपनेत्र अथवा कालिख से विलेपित काले कांच तथा सूर्य की प्रखर किरण आंखों तक न पहुंचे; इसके लिए उपलब्ध साधनों का उपयोग कर ही ग्रहण देखें । किसी भी स्थिति में खुली आंखों से सूर्य की ओर न देखें । ग्रहण का छायाचित्र खींचने वाले विशिष्ट फिल्टर का उपयोग कर ही छायाचित्र खींचें, अन्यथा उससे आंखों को हानि पहुंच सकती है ।
इस ग्रहण की कंकणाकृति स्थिति 40 सेकेंड तक दिखाई देगी; इसलिए इस अवधि में आंखों पर ग्रहण देखने का उपनेत्र लगाकर ही रखें । उसके पश्‍चात पुनः 21.5.2031 को दक्षिण भारत में कंकणाकृति सूर्यग्रहण होगा । इससे पूर्व 15.1.2010 तथा 26.12.2019 को भारत के कुछ दक्षिणी प्रदेशों में कंकणा कृति सूर्यग्रहण दिखाई दिया था । इस वर्ष ज्येष्ठ अमावास्या, 21.6.2020, रविवार को सवेरे लगभग 10 बजे भारत के उत्तरी प्रदेशों में कंकणा कृति सूर्यग्रहण दिखाई देगा तथा शेष संपूर्ण भारत में यह सूर्यग्रहण खंडग्रास दिखाई देगा । जिन नगरों में कंकणाकृति सूर्य ग्रहण दिखाई देने वाला है, उनकी सूची स्वतंत्ररूप से दी गई है तथा जहां खंड ग्रास ग्रहण दिखाई देने वाला है, ऐसे नगरों की सूची अलग से दी गई है ।

ग्रहण में स्नान के संदर्भ में जानकारी

ग्रहण में समस्त जल गंगा समान है परंतु तब भी उष्णोदक की अपेक्षा शीतोदक पुण्यकारक, पानी ऊपर निकालकर किए गए स्नान की अपेक्षा बहता पानी, सरोवर, नदी, महानदी, गंगा एवं समुद्र का स्नान उत्तरोत्तण श्रेष्ठ एवं पुण्य कारक है । सूर्य ग्रहण में नर्मदा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। स्नान संभव नहीं हो तो नर्मदास्मरण करें।

सूर्य ग्रहण का आध्यात्मिक महत्त्व

ग्रहण काल के विशेष वातावरण का परिणाम प्रत्येक सजीव पर होता है । चंद्रग्रहण की अपेक्षा सूर्य ग्रहण का काल साधना के लिए अधिक पोषक होता है । ज्योतिषीय, धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण काल महत्त्वपूर्ण माना गया है । ग्रहण काल संधिकाल होने से इस काल में की जानेवाली साधना का परिणाम तुरंत प्रतीत होता है । ग्रहणकाल में जप और दान का महत्त्व अनंत गुना है । इसके लिए ग्रहण मोक्ष के पश्‍चात अपनी क्षमता के अनुसार दान करें । सूर्य ग्रहण में नया मंत्र लेने तथा मंत्र का पुरश्‍चरण करने के लिए सूर्य ग्रहण एक मुख्य काल है । पहले लिए गए मंत्र का पुरश्‍चरण ग्रहण पर्वकाल में करने से मंत्र सिद्ध होता है । सूर्य ग्रहण में अनन्य भाव से गुरु का स्मरण कर संपूर्ण श्रद्धा एवं एकाग्र मन से किए जप से शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक कष्ट नष्ट हो जाते हैं । सभी कार्यों में सफलता मिलती है । ग्रहण काल में जप करने हेतु माला की आवश्यकता नहीं पडती । ग्रहण स्पर्श से लेकर मोक्ष तक का संपूर्ण समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है ।

कंकणाकृति सूर्य ग्रहण दिखाई देने वाले स्थान

सूरतगढ (राजस्थान), हरियाणा के सिरसा, कुरुक्षेत्र, यमुना नगर और उत्तराखंड का जोशी मठ

खंडग्रास ग्रहण दिखने वाले स्थान

नगर, अकोला, अमरावती, नागपूर, संभाजीनगर, धुळे, जळगाव, कोल्हापूर, सोलापूर, पुणे, रत्नागिरी, सांगली, सातारा, सावंतवाडी, ठाणे, पणजीके साथ ही महाराष्ट्र और देश के 133 स्थानों पर खंडग्रास ग्रहण दिखाई देगा ।

– श्रीमती प्राजक्ता जोशी, ज्योतिष फलित विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय

 

– कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली

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